भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की यात्राओं और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की राजनीतिक रथयात्रा से पहले ही एक यात्रा शुरू हो चुकी थी। यह यात्रा भारतीय एकता परिषद् के श्री पी वी राजगोपाल ने शुरू की थी, वर्तमान व प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून के विरोध में। भट्ठा पारसौल और बाद में नौएडा में चल रहे किसानों के विरोध प्रदर्शन के बाद से ही यह कानून बहस के दायरे में आ गया था। हालाँकि अनेक विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून का एक संशोधित प्रारूप तैयार किया है और शीघ्र ही उसे संसद में प्रस्तुत भी किया जाने वाला है, परंतु अभी से ही उन संशोधनों की भी आलोचना शुरू हो गई है। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2011 नामक इस संशोधित प्रारूप को यदि हम केवल सरसरी निगाहों से भी पढें तो एक बात साफ हो जाती है। कम से कम यह कानून भारत और उसके किसानों व कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के हित के लिए बिल्कुल ही नहीं बनाया गया है।
इस कानून में कई विसंगतियां थीं, जिनका निराकरण प्रस्तावित प्रारूप में किया गया है। इसके बाद भी इस पर पर्याप्त सवाल खडे किये जा सकते हैं और किए जा भी रहे हैं। हालाँकि संशोधित प्रारूप में ऐसे अनेक सवालों का समाधान प्रस्तुत किया गया है। जैसे सिंचाई वाली भूमि के बारे में प्रस्ताव है कि एक जिले में अधिकतम 5 प्रतिशत सिंचाई वाली भूमि का ही अधिग्रहण किया जा सकता है। साथ ही उतनी ही बंजर भूमि को खेती योग्य बनाने का भी प्रस्ताव है। इसी प्रकार संशोधित प्रारूप में विशेष परिस्थितियों में लाभ का कुछ भाग भूमि के मालिक को देने का भी प्रस्ताव रखा गया है। कुल मिला कर देखा जाए तो एक अत्यंत आकर्षक और लुभावना प्रस्ताव तैयार किया गया है। बहरहाल, यदि ध्यान से देखें तो इस पूर्ण कानून की मंशा पर ही प्रश्न चिह्न खडा हो जाता है। पहला और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर इस कानून की आवश्यकता क्यों है और किसको है?
मौलिक रूप से भूमि अधिग्रहण कानून 1894 का है यानी कि इसका निर्माण अंग्रेजों ने 1894 में किया था। ध्यान देने की बात यह है कि 1894 से कुछ ही वर्ष पूर्व 1876 में भारत में कंपनी राज समाप्त हुआ था और ब्रिटिश राज शुरू हुआ था। इस कानून के मूल प्रारूप में भूमि अधिग्रहण करने के उद्देश्यों में साफ साफ लिखा हुआ है कि जनहित और कंपनियों के लिए भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा। अब यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि 1894 में भारत में कितनी कंपनियां थीं। यह तो इतिहास का एक सामान्य विद्यार्थी भी जानता है कि उस समय भारत में केवल एक ही कंपनी थी, ईस्ट इंडिया कंपनी। इस कानून का निर्माण केवल उसे फायदा पहुँचाने के लिए किया गया था। दिखावे के लिए जनहित शब्द भी जोड दिया गया था। स्वाधीनता मिलने के बाद इस कानून की कोई आवश्यकता नहीं थी और न ही इसका कोई उपयोग था। परंतु स्वाधीन भारत के नए शासक या तो अत्यंत मूर्ख थे या फिर एकदम धूर्त। उन्होंने इस कानून को यथारूप बनाए रखा ताकि भविष्य में इसका फायदा उठाया जा सके।
यह एक तथ्य है कि भूमि अधिग्रहण का यह एक शानदार कानून होने के बावजूद स्वाधीनता से पहले और बाद में भी अन्यान्य विभिन्न कारणों से भूमि अधिग्रहण करने के कई कानून और बनाए गए। कई कानून पहले से भी थे। जैसे, भूमि अधिग्रहण (खनन) अधिनियम, 1885, भारतीय ट्रामवे अधिनियम, 1886। बाद में 1903 में ‘द वर्क्स ऑफ डिफेंस एक्ट’ बनाया गया। स्वाधीनता के बाद तो भूमि अधिग्रहण के कानूनों की बाढ आ गई। विभिन्न कारणों से भूमि अधिग्रहण करने के कुल 13 कानून बनाए गए। जैसे, रेल सेवा के लिए, मेट्रो रेल के लिए, राजमार्गों के लिए, विद्युतिकरण के लिए, विस्थापितों के पुनर्वास के लिए, आदि आदि। सवाल यह है कि क्या ये 13 कारण जनहित में नहीं थे? यदि नहीं थे तो सरकार को इन कारणों से भूमि अधिग्रहण करने का क्या अधिकार है? और यदि थे तो इन कानूनों की अलग से क्या आवश्यकता थी? ये सवाल ही भूमि अधिग्रहण कानून की मंशा को संदेह के घेरे में ला देते हैं।
भारतीय परंपरा में प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य का स्वामित्व कभी भी नहीं माना गया। प्राकृतिक संसाधन सामुदायिक संपत्ति माने जाते थे। राज्य की भूमिका केवल नियामक की हुआ करती थी और यही जनता के हित में भी था। प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के स्वामित्व की अवधारणा पाश्चात्य अवधारणा है और इस अवधारणा ने वहाँ भी पर्याप्त अनाचार और हिंसा फैलाया है। अमरीकी विद्वान कार्ल पोलान्यी अपनी पुस्तक “द ग्रेट ट्रांसफार्मेशन: द पोल्ट्कल एंड इकोनॉमिक ओरिजिन्स ऑफ ऑवर टाइम” के पंद्रहवें अध्याय ‘मार्केट एंड नेचर’ में लिखते हैं: “इंग्लैण्ड में टयूडर्स के साथ कृषिपरक पूंजीवाद विकसित हुआ। भूमि को किसानों के कुलों और गावों के साझे स्वामित्व से मुक्त कर उसे व्यक्तियों की निजी वस्तु बना डाला गया। एनक्लोजर्स तथा कन्वर्जन्स की प्रक्रिया द्वारा यह काम हुआ ।
एनक्लोजर का अर्थ था सैकडों या दर्जनों किसानों की भूमि को किसी सम्पन्न व्यक्ति द्वारा बाडे में घेर लेना तथा सभी किसानों को उजाड कर भगा देना। कन्वर्जन का अर्थ था – क्षेत्र के सभी किसानों को बलपूर्वक किसी कारखानेदार के नियंत्रण में ले लेना और उनकी भूमि उस कारखानेदार की घोषित कर उस पर कब्जा कर लेना। मिल के लिये और मिल-मजदूरों की बस्तियों के लिए उस जमीन को किसानों से छीन लेना। 18वीं शताब्दी के आरम्भ में इंग्लैण्ड और फ्रांस दोनों में ये दोनो काम बडे पैमाने पर हुआ। उन्नीसवीं शदी में औद्योगिक कस्बों की वृद्धि हुयी तो इलाके के इलाके घेर लिये गये ताकि खाद्यान्न और कच्चा माल की पूर्ति हो सके। पहले किसानों को जमीन देते समय यह ब्यवस्था होती थी कि वे उस भूमि को रेहन नहीं रख सकते या उसका व्यापारिक उपयोग नहीं कर सकते। अब यह व्यवस्था खत्म। यह प्रक्रिया बहुत वर्षो चली। इस प्रक्रिया को कहीं निजी बल एवं हिंसा से सम्पन्न किया गया, कहीं ऊपर या नीचे से हुई क्रांति द्वारा, कहीं युद्ध एवं विजय से, कहीं कानून बनाकर, कहीं प्रशासन का दबाव डालकर, कहीं तत्काल जो सूझ जाये, वह उपाय अपनाकर।“ इसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों का विस्थापन, बेरोजगारों का संख्या में अपरिमित वृद्धि और भारी अनाचार पैदा हुआ। लाखों लोग असमय और अकारण विकास की भेंट चढ गए या चढा दिए गए।
पिछले दिनों जो कुछ भी देश के विभिन्न भागों में हो रहा है, वह उपरोक्त कथन को ही फिर से प्रमाणित कर रहा है। यह साफ है कि स्थानीय समाज की आवश्यकता का ध्यान रखे बगैर और बिना उसकी सहमति के भूमि अधिग्रहण का कोई भी कानून देश में बेरोजगारी, अराजकता और हिंसा ही बढाएगा। सुरक्षा व राष्ट्रीय महत्व के कुछेक विषयों के अलावा राज्य द्वारा भूमि का अधिग्रहण समस्या के अतिरिक्त और कुछ नहीं बढाने वाला है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि भूमि अधिग्रहण के सभी कानूनों पर समग्रता से विचार करके कोई एक कानून बनाया जाए जिसमें कंपनियों की बजाय जनता का हित सर्वोपरि हो।



