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इस्लाम और कट्टरता व हिसंक व्यवहार

Posted by bhartiyapaksha on January 27, 2010

कुछ समय पहले मेरी एक ‘सेकुलर’ पत्रकार मित्र ने मुझे कहा कि गुजरात दंगों के बाद उनकी एक मुसलमान मित्र ने एक सामान्य व हिन्दूबहुल इलाके में मकान लेने का विचार त्याग दिया। मेरी मित्र ने कहा कि वह अपनी उस मित्र की इस बात से अंदर तक हिल गई कि उसे अब हिन्दूबहुल इलाके में घर लेने से डर लगने लगा है। मैंने अपनी मित्र को पूछा कि उनका मन इस बात पर क्यों नहीं हिलता है कि देश के किसी भी मुस्लिमबहुल इलाके में ही नहीं, बल्कि उसके आस-पास भी एक भी हिन्दू घर लेने से डरता है और यदि किसी ने ले लिया है तो उसका जीवन नरक से भी बदतर है। उसके पास इसका कोई उत्तर नहीं था। वास्तव में यह समस्या किन्हीं दो छोटे व स्थानीय समूहों की नहीं है। यह समस्या इस्लाम के मूल सिध्दांतों, उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और घोर पांथिक असहिष्णुता से जुड़ा हुआ है।

कोई माने या नहीं, परंतु आज भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में इस्लाम एक बहस का मुद्दा है। बहस का कारण भी एक ही है और वह कारण है, मुसलमानों की कट्टरता व हिसंक व्यवहार। सामान्यत: यह दलील दी जाती है कि कट्टरता इस्लाम का हिस्सा नहीं है और कोई भी ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ लेकिन यह भी एक सचाई है कि इस्लाम के इतिहास के साथ काफी खून-खराबा जुडा हुआ है। इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि इस्लाम केवल एक उपासना से जुड़ा हुआ मत नहीं है। इस्लाम की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं, और वे काफी प्रारंभ से ही रही हैं। प्रारंभ से ही उसने शासन सत्ता का उपयोग अपने मत के प्रचार प्रसार करने में किया है। अधिकांश स्थानों में इस्लाम के फैलने में सिध्दांत से कहीं अधिक बड़ा कारण तलवार का जोर रहा है। हालांकि आज के कुछेक सेकुलर इतिहासकार और नवबौध्दिक लोग इसे सही नहीं मानते हैं, परंतु इस्लाम और तलवार के संबंध इतने पुख्ता हैं कि आंख बंद करने के बाद भी दिखते हैं।

यह कहना बड़ा सरल व आसान है कि इस्लाम का कट्टरता से कोई लेना देना नहीं है लेकिन अभी तक इस्लाम की उदारता के तर्क केवल गैर इस्लामी लोगों द्वारा ही दिए जाते हैं, या फिर एकाध कोई मुसलमान उदारता की बात करता है तो वह मुस्लिम जगत द्वारा पूर्णत: उपेक्षित होता है। ऐसे लोगों के तर्कों का कोई विशेष महत्व नहीं है। हम देख सकते हैं कि आज भी इस्लामी देशों में शासन द्वारा दूसरे मतावलम्बियों के साथ भेदभाव बरता जाता है। उन देशों में इस्लामेतर मतों के प्रचार व उनके सार्वजनिक प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध है। इसे वे अपने ढंग से उचित भी ठहराते हैं। नीचे दिए गए लिंक द्वारा आप एक विडीयो डाउनलोड करें और देखें कि इस्लाम के झंडाबरदारों के अपने तर्क क्या हैं? यह भी बताएं कि क्या उनका तर्क सही है? तमाम सेकुलर नवबौध्दिकों से मेरा विशेष आग्रह है कि वे इस विडीयो को देख कर बताएं कि इसके बाद इस्लाम के प्रति अब उनकी धारणा क्या है? क्या इसे देखने के बाद यह कहना उचित प्रतीत नहीं होता है कि भारत यदि ‘सेकुलर’ राज्य है तो उसका कारण इसका हिन्दूबहुल होना है। यदि यहां भी मुसलमानों का बोलबाला हो जाए तो यहां भी वैसी ही स्थिति बन जाएगी।

http://rapidshare.com/files/334042409/video_JNAIK.mp4

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गणतंत्र दिवस और राष्ट्रीय उत्सव का मिथक

Posted by bhartiyapaksha on January 14, 2010

गणतंत्र दिवस आ रहा है। पूरे देश में इसे मनाने की कोशिश शुरू हो जाएगी। गणतंत्र दिवस को हमारी सरकार और उसके अनुयायी राष्ट्रीय उत्सव कहते हैं। देश के सारे विद्यालयों और सरकारी संस्थानों में इस राष्ट्रीय उत्सव को मनाने की बाध्यता है। सवाल यह है कि उत्सव क्या बाध्यता से मनाए जाते हैं? एक ऐसा समारोह जिसे बाध्य करके मनवाया जाता हो, को उत्सव कहना कितना उचित है और एक ऐसे उत्सव को राष्ट्रीय उत्सव कहना कितना उचित होगा? ये सवाल हो सकता है कि आज के सरकारी शिक्षा और नौकरी में फंसे लोगों को देशद्रोहिता से परिपूर्ण लगें, परंतु जो इस देश की सनातनता और गरिमामय इतिहास से परिचित हैं, उन्हें इस अल्पजीवी, भारीदोषयुक्त और देश की अस्मिता व पहचान से दूर संविधान की स्थापना का समारोह एक सरकारी वितंडावाद से अधिक कुछ भी नहीं प्रतीत होगा। क्या इसे हम सरकार की विफलता नहीं कहेंगे कि साठ वर्षों बाद भी उसका राष्ट्रीय उत्सव देश के आम आदमी तक नहीं पहुंच पाया है?
होना तो यह चाहिए था कि वर्ष में कभी भी एक बार बैठ कर इस संविधान पर विचार-विमर्श किया जाता कि आज के दौर में यह कितना उपयोगी रह गया है और क्या हमें एक नए संविधान की आवश्यकता नहीं है। परंतु आज के कट्टरपंथी, सांप्रदायिक व समाजतोड़क लोगों की जमात हल्ला मचाने लगेगी कि इस संविधान से परे कुछ भी नहीं सोचा जा सकता। हमें जो कुछ भी सोचना है, वह इस संविधान के दायरे में रह कर ही सोचना है। परंतु वे इस बात का जवाब देने के लिए तैयार नहीं हैं कि जब इस देश में लाखों वर्षों से चले आ रहे मनुस्मृति जैसे संविधानों को आपत्तिजनक होने पर छोड़ा जा सकता है तो इस संविधान को क्यों नहीं? वे यह बताने के लिए तैयार नहीं होते कि आखिर इस संविधान में ऐसा क्या है जिससे इस देश को कुछ फायदा हुआ हो? क्या इस संविधान के लागू होने के बाद देश में अलगाववाद घट गया, क्या इस संविधान ने शासकों की तानाशाही व निरंकुशता पर लगाम लगा दी, क्या इस संविधान ने आम आदमी को इतनी क्षमता दे दी कि वह अपने शासकों से कोई स्पष्टीकरण मांग सके, क्या इस संविधान ने हमारे देश के कानून-व्यवस्था की स्थिति को सुधार दिया? ध्यान से देखें तो इन सारे प्रश्नों का उत्तर नहीं में है। आज देश में जितने अलगाववादी आंदोलन चल रहे हैं, उतने 1950 में नहीं थे। आज कहने के लिए देश में लोकतंत्र है लेकिन वास्तव में देश की राजनीति में आम आदमी की भूमिका शून्य ही है। आम आदमी आज इतना असहाय हो गया है कि वह चाहे या न चाहे, सरकारें बन ही जाती हैं और नेतागण अपना पेट भरने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं। कानून-व्यवस्था की स्थिति तो इतनी खराब है कि उसकी चर्चा करना ही व्यर्थ है। सोचने की बात यह है कि यदि यह सब कुछ नहीं हो पाया है तो फिर इस संविधान की प्रासंगिकता क्या है?
गणतंत्र दिवस को यदि राष्ट्रीय उत्सव नहीं कहें, इसमें संविधान का अपमान नहीं है। इसे मनाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसे राष्ट्रीय उत्सव कहना राष्ट्र और उत्सव दोनों शब्दों के साथ मजाक करना है। इसे राजकीय उत्सव तो कहा जा सकता है परंतु राष्ट्रीय उत्सव कदापि नहीं। जो उत्सव देश के आम आदमी के मन को उत्साहित नहीं करता हो उसे राष्ट्रीय उत्सव कैसे कहें? वास्तव में स्वाधीनता प्रप्त करने के बाद अपने देश में एक नई संस्कृति विकसित करने और एक नया राष्ट्र गढने की कोशिश शुरू हुई थी। इसलिए इस देश के राष्ट्र से जुड़ी सभी पुरानी चीजों को दूर करने की कोशिश की गई। नए महापुरूष गढे गए, नया इतिहास लिखा गया, नए उत्सव बनाए गए। ये सारे प्रयत्न इस देश की प्राचीन अस्मिता को नष्ट करके एक नई अस्मिता गढने के लिए किए गए। यदि इस नई संस्कृति, राष्ट्र व अस्मिता में वास्तव में देश की भलाई होती तो उसे लोगों ने हाथों-हाथ लिया होता। परंतु ऐसा नहीं था। आज हम देख सकते हैं कि पुराने जीवन-मूल्यों व परंपराओं और देश की सनातनता की उपेक्षा करने से समस्याएं बढी ही हैं।
इसलिए गणतंत्र दिवस को संविधान स्थापना के समारोह के रूप में मनाया जाता है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन इसे राष्ट्रीय उत्सव कहना इस राष्ट्र का अपमान है। ऐसा नहीं है कि हमारे देश में कोई राष्ट्रीय उत्सव नहीं है। उदाहरण के लिए मकर संक्रांति एक राष्ट्रीय उत्सव ही है। इसे मनाने के लिए सरकार को कुछ भी नहीं करना होता है और यह पूरे देश में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है। कहीं पोंगल, तो कहीं बिहु, कहीं मकर संक्रांति तो कहीं टुसु के नामों से पूरा देश इसे मनाता है और सरकार द्वारा छुट्टी नहीं दिए जाने के बावजूद मनाता है। इसप्रकार के अनेक उत्सव हैं, जिन्हें राष्ट्रीय उत्सव कहा जा सकता है। इसलिए इस गणतंत्र दिवस पर आइए सोचें कि इस देश की राजनीति को इस देश की मिट्टी से कैसे जोड़ा जाए? सोचें कि आखिर क्यों बापू चाहते थे कि भारत की राजनीति धर्माधारित हो, सेकुलर नहीं?

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नववर्ष का सच

Posted by bhartiyapaksha on December 31, 2009

वर्ष 2009 समाप्त हो रहा है और वर्ष 2010 प्रारंभ होने वाला है। कहने के लिए नया वर्ष आने वाला है और देश का समृद्ध वर्ग विषेषकर मीडिया बीते वर्ष की समीक्षा व आने वाले वर्ष का स्वागत करने में जुट गए है। वर्ष में एक बार पूरे वर्ष की समीक्षा करनी ही चाहिए, यह जरूरी भी है, परंतु स्वयं को प्रगतिशील और वैज्ञानिक कहने वाले लोगों तथा देश को जाग्रत रखने का दम भरने वाले मीडिया को कम से कम यह अवश्य सोचना चाहिए था कि वह समय कौन सा हो? उसे यह अवश्य सोचना चाहिए कि क्या वास्तव में यह नया वर्ष है? क्या इसका इतना अधिक प्रचार किया जाना चाहिए?

दुर्भाग्य यह है कि पूरा देश एक भेंड़चाल में फंस गया है और एक सर्वथा अवैज्ञानिक, निरर्थक व भारत की परिस्थितियों के एकदम विपरीत कालगणना के नववर्ष को अपनाने की भोंडी सी कोशिश कर रहा है। इसके पीछे पूरे विश्व का बाजार लगा हुआ है। लेकिन यह मामला इतना भर ही नहीं है, वास्तव में इस नववर्ष के हावी होने के पीछे एक और कारण है और वह कारण है अंग्रेज व अंग्रेजियत के प्रति हमारी गुलाम मानसिकता। यह हमारी गुलाम मानसिकता ही है कि स्वयं को पढ़ा-लिखा और शिक्षित दिखाने के लिए हमें अंग्रेजी भाषा व परंपराएं अपनानी पड़ती है। इसलिए इस नववर्ष को मनाने के तरीके भी भारतीय नहीं हैं। रातभर पार्टी और शोर शराबा करना, रात के बारह बजे नए वर्ष का स्वागत करना आदि कहीं से भी हमारी परंपरा के अनुकूल नहीं हैं। भारत में हम सूर्य के उदय होने से दिन का प्रारंभ मानते हैं न कि रात के बारह बजने से।

बहरहाल, बात नववर्ष की हो रही थी। भारत में जब आधे से अधिक हिस्से में शीत लहर से लोग कांप रहे होते हैं, तब हमारे देश के अतिसाधनसंपन्न लोग पूर्णत: वातावनुकूलित पांचसितारा होटलों में शराब और सुंदरियों के साथ नववर्ष की खुशियां मना रहे होते हैं। यह वह वर्ग है जो देष की बढ़ती विकास दर का सर्वाधिक लाभ उठा रहा है और देष के आम जन से जिसका कोई वास्ता नहीं है। दुर्भाग्यवश आमजन के हित की बात उठाने की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेकर घूमने वाले पत्रकार भी आमजन के साथ नहीं होते, बल्कि वे भी ऐसी ही पार्टियों का आनंद लेते हैं। इतना होने पर भी खुशी की बात यह है कि अपनी गुलाम मानसिकता का गर्व पालने वाले कथित संभ्रांत व अंग्रेजीदां वर्ग के अतिरिक्त पूरा भारत एक जनवरी की बजाय भारतीय तिथियों के अनुसार ही नववर्ष मनाता है। इतना ही नहीं, देश का आर्थिक और शैक्षणिक नववर्ष भी उसी समय प्रारंभ होता है, जनवरी में नहीं। वास्तव में कालगणना का यह तरीका सर्वाधिक अवैज्ञानिक और मूर्खता भरा है।

एक जनवरी से प्रारम्भ होने वाली काल गणना का संबंध ईसा मसीह से माना जाता है। इसे रोम के सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वर्ष बाद प्रचलन में लाया गया। भारत में ईस्वी सम्वत् का प्रचलन अग्रेंजी शासकों ने 1752 में किया। 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से शुरू होता था। यह संवत रोमन संवत से निकला हुआ है। ईसा से 753 वर्ष पहले रोम नगर की स्थापना के समय रोमन संवत् प्रारम्भ हुआ जिसमे मात्रा दस माह व 304 दिन होते थे। इसके 53 साल बाद वहां के सम्राट नूमा पाम्पीसियस ने जनवरी और फरवरी दो माह और जोड़कर इसे 355 दिनों का बना दिया। ईसा के जन्म से 46 वर्ष पहले जूलियस सीजर ने इसे 365 दिन का बना दिया। उस समय उन्हें लीप वर्ष की जानकारी नहीं थी और दिनों की उस गड़बड़ी को ठीक करने के लिए 1582 ई. में पोप ग्रेगरी ने आदेश जारी किया कि 04 अक्टूबर को इस वर्ष का 14 अक्टूबर समझा जाये।इस विवरण से पता चलता है कि इस गणना में कितनी वैज्ञानिकता है।

इस बारे में जनता को शिक्षित करने का काम मीडिया का था, परंतु मीडिया को इससे कोई मतलब नहीं है। उसे तो पेज थ्री की पार्टियों से मतलब है और वे तो 31 दिसंबर को ही होती हैं। वह तो फिल्म अभिनेताओं व अभिनेत्रियों की पसंद-नापसंद को जानने और लोगों को बताने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ रहा है। रही बात आम आदमी की तो, वह तो समाज के उच्च वर्ग की ओर लालसा भरी नजरों से देख रहा है और उसकी नकल करने की मूर्खतापूर्ण व आत्मघाती कोशिश करने में जुटा हुआ है।

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पत्रकारिता के खोते मापदंड

Posted by bhartiyapaksha on November 21, 2009

बीसवीं सदी में सूचना क्रांति के विस्फोट के साथ-साथ पत्रकारिता का बहुविधा विकास हुआ है। लगभग 62483 पंजीकृत अखबारों और 600 से अधिक समाचार चैनलों के साथ देश के मीडिया ने पूरे विश्व में अपनी एक जगह बनाई है। आधुनिक जीवन की बढ़ती व्यस्तताओं और बदलती शैली के मद्देनजर पत्रकारिता ने अपना कलेवर भी बदला है। अब वह 24×7 यानी चौबीस घंटे, सातों दिन सजग रहती है, चीजों को लाइव यानी साक्षात् दिखाने की कोशिश करती है, स्टिंग यानी परदे के पीछे झांकने की चेष्टा करती है और स्थानीय मुद्दों से जुड़ने का प्रयत्न करती है। निश्चित ही आज देश में मीडिया का व्याप और प्रसार काफी बढ़ा है, परंतु दूसरी ओर उसका नैतिक और चारित्रिक पतन भी हुआ है। पत्रकारिता में बाजार, विज्ञापन, पैसे व सनसनी की महत्ता बढ़ी है और मानवीयता, निष्पक्षता व खबरीपने में गिरावट आई है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र कहते हैं, ”आज विचार गायब हो गए हैं और समाचार की महत्ता स्थापित की गई है।” इसका परिणाम यह हुआ है कि समाचारों में भी केवल सनसनी और चटपटेपन को ही प्रमुखता मिल रही है। समाज के उच्च वर्ग की ऐय्याशियों को खबर बनाने के लिए एक पेज थ्री नामक आयाम विकसित हो गया है। पत्रकार तो बिक ही रहे हैं, अब समाचार भी बिकने लगे हैं। खबरें छापने के लिए पैसे लिए जा रहे हैं और विज्ञापनों को खबरों के रूप में छापा जा रहा है। आज स्थिति यह हो गई है कि एक पत्रकार हनीमून पर जाता है और वहां से ली गईं तस्वीरों को दिखाकर  ‘स्वर्ग मिल गया’ की खबर चलाई जाती है। पत्रकारिता के महारथी इसका जवाब यह कह कर दिया करते हैं कि आज पत्रकारिता के मायने बदल रहे हैं। परंतु सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता के मायने बदले जा सकते हैं? क्या उसके मूल्यों को बदला जा सकता है?

यह सवाल वास्तव में एक दार्शनिक सवाल है और अध्ययन व स्वाध्याय से दूर आज के पत्रकार न केवल इसका उत्तर नहीं दे सकते, बल्कि वे इसके उत्तर को समझने की भी क्षमता नहीं रखते। यह सवाल किसी भी वस्तु के मौलिक गुणधर्मों को बदलने की गंभीर दार्शनिक समस्या से जुड़ा हुआ है। वास्तव में यह सवाल ऐसा होना चाहिए कि क्या किसी वस्तु के मौलिक गुणधर्म को बदला जा सकता है? उदाहरण के लिए सूरज का उष्मा उत्सर्जित करना, जल का ठंढा होना और आग का जलाना। क्या सूरज गर्मी देना बंद कर सकता है? हां, कर सकता है, लेकिन तब वह सूरज नहीं रह जाएगा। ब्रह्मांड में ऐसे अनेक ठंढे तारे हैं, परंतु वे सूरज नहीं कहलाते। क्या जल स्वाभाविक रूप से गर्म हो सकता है? हां, लेकिन तब वह जल नहीं रह जाएगा। क्या आग जलाना छोड़ सकती है? हां, लेकिन तब वह आग नहीं रह जाएगी। इसीप्रकार क्या पत्रकारिता अपने गुणधर्म को छोड़ सकती है? क्या वह जन सरोकारों से स्वयं को पृथक कर सकती है? हां, लेकिन तब वह पत्रकारिता नहीं रह जाएगी, जैसा कि आज हो गया है। क्या आज के अखबारों में जो खबरें या फिर खबरों के नाम पर जो कुछ छपता है, उसे पत्रकारिता कहा जा सकता है? यह एक गंभीर और बुनियादी सवाल है, जिस पर गंभीर और ठोस बहस की जरूरत है।

ध्यान देने की बात यह है कि भले ही आधुनिक पत्रकारिता का जन्म और विकास यूरोप में हुआ है, भारत में इसका एक स्वतंत्र स्वरूप विकसित हुआ। यह स्वरूप पश्चिम के स्वरूप से न केवल भिन्न था, बल्कि कई मायनों में उससे काफी बेहतर भी था। भारत में पत्रकारिता अमीरों के मनोरंजन के साधन के रूप में विकसित होने की बजाय स्वतंत्रता संग्राम के एक साधन के रूप में विकसित हुई थी। इसलिए जब 1920 के दक में यूरोप में पत्रकारिता की सामाजिक भूमिका पर बहस शुरू हो रही थी, भारत में पत्रकारिता ने इसमें प्रौढ़ता प्राप्त कर ली थी। 1827 में राजा राममोहन राय ने पत्रकारिता के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा था, ”मेरा सिर्फ यही उद्देश्य है कि मैं जनता के सामने ऐसे बौध्दिक निबंध उपस्थित करूं, जो उनके अनुभवों को बढ़ाए और सामाजिक प्रगति में सहायक सिध्द हो। मैं अपने शक्तिशाली शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूं ताकि शासक जनता को अधिक से अधिक सुविधा देने का अवसर पा सकें और जनता उन उपायों से परिचित हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पायी जा सके और उचित मांगें पूरी कराई जा सकें।” माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर रामशरण जोशी अपने एक लेख में इसकी ओर इंगित करते हुए लिखा है, ”1857 से 1947 की भारतीय भाषायी पत्रकारिता का मूल चरित्र मिशनवादी था। पत्रकारिता का यह मिशनवाद एकरूपी नहीं था, बहुरंगी था। इसकी कई उपधाराएं थीं- सामाजिक सुधारवाद, नारी उत्थान, अछूतोध्दार, स्वभाषा, राष्ट्रीय जागरण, आध्यात्मिक उत्थान, साम्राज्यवाद विरोध, संपूर्ण आजादी आदि।” सत्य एवं न्याय की प्रतिष्ठा में अखबारों की महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य भूमिका को लक्ष्य करते हुए गांधीजी ने कहा था, ”मेरा ख्याल है कि ऐसी कोई भी लड़ाई जिसका आधार आत्म-बल हो, अखबार की सहायता के बिना नहीं चलायी जा सकती।” इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत में पत्रकारिता का सामाजिक स्वरूप एकदम प्रारंभ से भी विकसित हो गया था और उसमें भारतीयता की झलक साफ दिखा करती थी। भारत की राजनीतिक स्वाधीनता के साथ-साथ भारत के सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा उसका एक प्रमुख उद्देश्य हुआ करता था। वह समाज में सुधार तो देखना चाहता था, परंतु उसे अपनी जड़ों से काटना नहीं चाहता था। समाज में सुधार के लिए यूरोप के अंधानुकरण को कभी भी पोषित नहीं किया गया और सबसे प्रमुख बात यह थी कि पत्रकारिता बाजार के हानि-लाभ के सिध्दांतों की बजाय सामाजिक मूल्यों के विकास-पतन के आधार पर की जाती थी। आज की भांति वह केवल घटनाओं की जानकारी देने तक सीमित नहीं था, बल्कि वह घटनाओं की दे और जन सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करती थी। समाचारों की बजाय विचारों को महत्व दिया जाता था। समाचारों में भी समाचार की सनसनी की बजाय समाचारों की महत्ता को वरीयता दी जाती थी। जनता क्या चाहती है, की बजाय जनता को कैसा होना चाहिए, के हिसाब से पत्रकारिता होती थी। भारत में विकसित हुआ पत्रकारिता का यह स्वरूप पश्चिम की पत्रकारिता से बिल्कुल अलग था।

स्वाधीनता के बाद परिस्थितियां बदलीं। स्वाधीनता मिलने के बाद से ही पत्रकारिता के इस भारतीय स्वरूप के सामने चुनौतियां भी बढ़ने लगीं थीं। इसकी ओर ही इंगित करते हुए 15 अगस्त, 1947 में ‘जनता’ ने लिखा था, ”भारत में पत्रकारिता के समक्ष तीन प्रकार की कठिनाइयां हैं। पहली समस्या वित्ता की है। दूसरी चुनौती है, स्वतंत्र समाचार पत्रों के पूंजीवादियों से संबंध, जो समाचार पत्रों को लाभ कमाने के साधन के रूप में विकसित करने और इसके द्वारा प्रतिक्रियावादी आर्थिक सिध्दांतों को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। प्रबंध संपादकों द्वारा पूंजिवादियों के हितों के विरुद्ध किसी भी विचार को प्रकाशन से रोका जा रहा है। तीसरी समस्या है, व्यावसायिक पत्रकार, जो अपने कैरियर की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पत्रकारिता के सिध्दांतवादी व मिशनरी भूमिका को दबा देते हैं।” वास्तव में यह तीसरी समस्या ही सबसे बड़ी समस्या है। व्यावसायिक पत्रकार और पत्र-पत्रिकाएं, दोनों की जो शृंखला विकसित हुई है, उसे पत्रकारिता के सिध्दांतों और उद्देश्यों से कोई लेना देना नहीं है। टेलीविजन चैनलों की तो बात ही करना व्यर्थ है। उनका तो जन्म ही यूरोप की नकल से हुआ है। उनसे किसी भी प्रकार की भारतीयता की अपेक्षा करना ऐसा ही है जैसे कोई बबूल का वृक्ष बोए और आम के फलने की आशा करे। ऐसी पत्र-पत्रिकाएं व टेलीविजन चैनल ”गे डे” यानी कि समलैंगिकता दिवस मनाते हैं, संस्कृति की रक्षा की बातों को मोरल पोलिसिंग कहकर बदनाम करने की कोशिशें करते हैं, भारतीय परंपराओं और जीवन मूल्यों का मजाक उड़ाते हैं, खुलकर अश्लीलता, वासनायुक्त जीवन और अमर्यादित आचरणों का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि यह सब वे ”पब्लिक डिमांड” यानी कि जनता की मांग पर कर रहे हैं। आज यदि महात्मा गांधी या राजा राममोहन राय या विष्णु हरि परांडकर या माखनलाल चतुर्वेदी जीवित होते तो क्या वे स्वयं को पत्रकार कहलाने की हिम्मत करते? क्या उन जैसे पत्रकारों की विरासत को आज के पत्रकार ठीक से स्मरण भी कर पा रहे हैं? क्या आज के पत्रकारों में उनकी उस समृध्द विरासत को संभालने की क्षमता है? ये प्रश्न ऐसे हैं, जिनके उत्तर आज की भारतीय पत्रकारिता को तलाने की जरूरत है, अन्यथा न तो वह पत्रकारिता ही रह जाएगी और न ही उसमें भारतीय कहलाने लायक कुछ होगा।

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बालमन की व्यथा

Posted by bhartiyapaksha on November 5, 2009

‘पापा, ये क्या हो रहा है?’

‘बेटा, यहां घर बन रहा है। घर बनेगा तो उसमें लोग रहेंगे। यह अच्छी बात होगी। है न?’

‘नहीं पापा, फिर वह गैया कहां रहेगी?’

‘बेटा, जिसके पास अधिक जमीन होगी, वह गाय रखेगा।‘

‘पर पापा, डागी (कुत्ता) कैसे जाएगा? उसका रास्ता बंद हो जाएगा।‘

‘बंद हो जाने दो। डागी कहीं और से चला जाएगा। वैसे भी डागी तो गंदा होता है।‘

‘नहीं पापा, डागी अच्छा होता है। उसे मैं रोटी खिलाता हूं। घर बन जाएगा तो वो कैसे आएगा?’

अपने चार वर्षीय बेटे से हुए इस संवाद ने मुझे कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। हम आज अपने आगे बढ़ने की धुन में अपने साथ के मनुष्यों के बारे में ही नहीं सोच पा रहे हैं और वह गली में आवारा घूमने वाली गैया और कुत्ते की चिंता कर रहा है। उसे यह चिंता है कि यदि हर तरफ घर बन जाएगा तो गैया कहां रहेगी और कुत्ता कहां घूमेगा? क्या यह चिंता आज के किसी पर्यावरणविद की चिंता जैसी ही नहीं है? क्या इससे यह रेखांकित नहीं होता है कि हमारा सहज स्वभाव पशु-पक्षियों और बड़े अर्थों में कहा जाए तो प्रकृति के साथ जुड़ा होता है? यह तो हमारा स्वार्थ है जो बड़े होने पर हमें प्रकृति के प्रति अनुदार और स्वयं की सुख-सुविधा के प्रति अतिसंवेदनशील बना देता है। यदि हमारा स्वभाव प्रकृति-प्रेमी नहीं होता तो गाय और कुत्ते के सामने आने पर डर से घर भाग जाने वाले मेरे बेटे को किसी खाली जमीन में घर बनने से कोई फर्क नहीं पड़ता। अपने डर के बावजूद उसके मन में गाय और कुत्ते के प्रति जो प्रेम है, वह क्या पशु-पक्षीविहीन ‘पाश’ कही जाने वाली सोसाइटियों में रहने वालों में पैदा हो सकती है? क्या गली में घूमने वाले जानवर केवल गंदगी ही फैलाते हैं? क्या गली में उनकी उपस्थिति से हमारे मन और हमारे बच्चों में मानवीयता नहीं बढ़ती है?

क्या हम और हमारे देश की सरकारें और नीति-निर्माता हमारे नौनिहालों के मन में घुमड़ने वाले इन महत्वहीन प्रश्नों पर विचार करेंगे?

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राष्ट्रपिता की उच्छ्रंखल संतानें

Posted by bhartiyapaksha on October 26, 2009

दो अक्तूबर यानी कि महात्मा गांधी का जन्म दिवस। इस सदी के संभवत: महानतम वैश्विक महापुरूष का जन्म दिवस। परंतु इसे गौरवपूर्वक मनाते हुए भी हम कहीं न कहीं उस महान आत्मा को ठग रहे होते हैं। महात्मा गांधी यानी कि राष्ट्रपिता। पिता यानी जन्मदाता और पालक। राष्ट्र का कोई जन्मदाता नहीं होता। राष्ट्र तो धीरे-धीरे विकसित होता है और इसलिए महात्मा गांधी को इस राष्ट्र का जन्मदाता कहना तो ठीक नहीं होगा क्योंकि उन्हीं के शब्दों में कहें तो यह राष्ट्र काफी प्राचीन है, अंग्रेजों के इस देश में आगमन से कई हजार वर्ष पुराना। तो उन्हें इस राष्ट्र का पालक कहा जा सकता है। परंतु सवाल यह है कि क्या वास्तव में हम महात्मा गांधी को इस राष्ट्र का पालक मानते हैं? सवाल यह भी है कि क्या हम उस राष्ट्र को ठीक से समझते भी हैं, जिसकी पालना करने की कोशिश महात्मा गांधी कर रहे थे?

वस्तु स्थिति तो यह है कि महात्मा गांधी को किसी महापुरूष ने देश का राष्ट्रपिता कहा और कांग्रेस को इसमें अपना राजनीतिक हित नजर आया। फिर क्या था उसने इसकी डुगडुगी पीटनी शुरू कर दी और आज तक पीट रही है। राष्ट्रपिता गांधी के नाम की राजनीति कर रही है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस या उसके नेता ह्रदय से गांधीजी को राष्ट्रपिता मानते थे या मानते हैं? पिता का शाब्दिक अर्थ होता है पालने वाला, परंतु इसका विस्तृत अर्थ है अपनी संतान को सभ्य व सुसंस्कृत बनाने वाला। इसलिए अपने देश में गुरू को भी पिता का ही स्थान दिया गया और शिष्य को मानसपुत्र कहा गया। एक अच्छे पुत्र व शिष्य का लक्षण यही है कि वह अपने पिता या गुरू की शिक्षाओं का पालन करे और उसके अनुसार अपना जीवन चलाए। यानी यदि गांधीजी इस राष्ट्र के पिता हैं तो इसका अर्थ हुआ कि इस देश को उनकी शिक्षाओं पर चलना चाहिए। परंतु देखा जाए तो गांधीजी के मरने की भी कांग्रेस के नेताओं ने प्रतीक्षा नहीं की। उन्होंने उनके जीवनकाल में ही घोषणा कर दी कि वे गांधीजी की शिक्षाओं पर चलना तो दूर की बात है, वे उस पर विचार करने तक के लिए तैयार नहीं हैं। (देखें गांधीजी को नेहरू का उत्तर, 9 अक्तुबर, 1945 को पंडित नेहरू द्वारा गांधीजी को लिखा पत्र।) उन्होंने लिखा था, ‘उस बात को कई साल हो गए हैं जब मैंने हिन्द स्वराजपढ़ी थी। आज मेरे दिमाग में उसकी कुछ धुंधली सी यादें हैं। लेकिन जब मैंने उसे 20 या अधिक साल पहले पढ़ा था तब भी वह मुझे अव्यवहारिक लगी थी। उसके बाद के आपके लेखों व भाषणों से मुझे लगा है कि आप भी उस समय से काफी आगे निकल चुके हैं और आधुनिक परिवेष को समझने लगे हैं। इसलिए मुझे तब आश्चर्य हुआ जब आपने कहा कि वह पुरानी तस्वीर आज भी आपके दिमाग में बसी हुई है। आपको मालूम ही है कि कांग्रेस ने उस तस्वीर पर कभी विचार ही नहीं किया। उसे स्वीकार करने की बात तो छोड़ ही दीजिए।’ पूरा पत्र इस ब्लाग पर दिया हुआ है।

क्या यही कारण नहीं है कि जब भी देश में कोई योजना बनाई जाती है, तब पंडित नेहरू के विचारों को तो याद किया जाता है परंतु गांधीजी के विचारों की चर्चा तक नहीं की जाती? गांधीजी ने कृषि व उद्योगों से लेकर शिक्षा और परिवार नियोजन तक के विषयों पर न केवल अपना सुदृढ़ विचार प्रकट किया है, बल्कि पंडित नेहरू की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट प्रारूप भी प्रस्तुत किया है। कांग्रेस से इतर विचारों के लोग तो गांधीजी पर उतनी आस्था नहीं रखते, परंतु कांग्रेस तो गांधीजी की अनुयायी या मानसपुत्र ही समझी जाती रही है और वह स्वयं भी ऐसा प्रकट करती रही है। फिर क्यों इस देश के नीति निर्माताओं ने उनके विचारों की इस कदर घोर उपेक्षा की? इसका एक सीधा और सपाट उत्तर यह है कि स्वयं को गांधी की अनुयायी कहने और उनका उत्तराधिकारी मानने वाली कांग्रेस के नेताओं को उस राष्ट्र की कल्पना तक भी नहीं थी, जिसकी आराधना महात्मा गांधी आजीवन करते रहे थे। इतना ही नहीं उस राष्ट्र की कल्पना उन अधिकांश स्वयंघोषित गांधीवादियों को भी नहीं है, जो दिखावा तो गांधीवादी होने का करते हैं, परंतु विचार, कर्म और आचरण से पूरी तरह उसके विरोधी हैं। आइए देखें, गांधी जी ने राष्ट्र को किस रूप में जाना था।

यह एक स्थापित तथ्य है कि अंग्रेजों ने अपनी ‘फूट डालो और राज्य करो’ की नीति के तहत यह प्रचार किया कि भारत कभी एक राष्ट्र नहीं रहा। उन्होंने देश में रहे अनेक राज्यों  और उनके आपसी संघर्षों को अलग-अलग राष्ट्र के रूप में प्रचारित करने का यत्न किया। उन्होंने प्रयत्नपूर्वक यह प्रचारित किया कि भारत का अपना कोई साहित्य, इतिहास, दर्शन, विज्ञान आदि कुछ नहीं रहा है। यहां केवल अंधविश्वास और निरर्थक व अवैज्ञानिक कुरितियों का प्रचार प्रसार रहा है। इस देश को वे शिक्षित और सभ्य बना रहे हैं। वे इस देश को एक राष्ट्र बना रहे हैं। उनका यह प्रचार उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में शुरू हुआ और बीसवीं सदी की शुरूआत तक काफी प्रभावी हो चुका था। 1909 में महात्मा गांधी जी ने उनके इस दुष्प्रचार का उत्तर देते हुए लिखा था, ”यह आपको अंग्रेजों ने सिखाया कि आप एक राष्ट्र नहीं थे और एक राष्ट्र बनने में आपको सैंकड़ों वर्ष लगेंगे। यह बात बिल्कुल बेबुनियाद है। जब अंग्रेज हिन्दुस्तान में नहीं थे, तब हम एक राष्ट्र थे, हमारे विचार एक थे, हमारा रहन-सहन एक था। तभी तो अंग्रेजों ने यहां एक-राज्य कायम किया। भेद तो हमारे बीच बाद में उन्होंने पैदा किए।

एक राष्ट्र का यह अर्थ नहीं कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं था, लेकिन हमारे मुख्य लोग पैदल या बैलगाड़ी पर सफर करते थे, वे एक दूसरे की भाषा सीखते थे और उनके बीच कोई अंतर नहीं था। जिन दूरदर्शी फरूषों ने सेतुबंध रामेश्वर, जगन्नाथपुरी और हरिद्वार की यात्रा ठहराई, उनका आपकी राय में क्या ख्याल होगा? वे मूर्ख नहीं थे, यह तो आप कबूल करेंगे। वे जानते थे कि ईश्वर भजन घर बैठे भी होता है। उन्हींने हमें सिखाया कि मन चंगा तो कठौती में गंगा। लेकिन उन्होंने सोचा कि कुदरत ने हिन्दुस्तान को एक देश बनाया है, इसलिए इसे एक राष्ट्र होना चाहिए। इसलिए उन्होंने अलग-अलग स्थान तय करके लोगों को एकता का विचार इस तरह दिया, जैसा कि दुनिया में और कहीं नहीं दिया गया है। दो अंग्रेज जितने एक नहीं हैं, उतने हम हिन्दुस्तानी एक थे और एक हैं। सिर्फ हम और आप जो खुद को सभ्य मानते हैं, उन्हींके मन में ऐसा आभास – भ्रम पैदा हुआ कि हिन्दुस्तान में हम अलग-अलग राष्ट्र हैं।हिन्द स्वराज, पृष्ठ 29

यह एक बुनियादी अंतर महात्मा गांधी और तत्कालीन व बाद के भी अन्य कांग्रेसी नेताओं में था। पंडित नेहरू सहित अन्य कांग्रेसी नेता अंग्रेजों के प्रचार के शिकार हो गए थे और वास्तव में यह मानने लगे थे कि भारत में शिक्षा व ज्ञान-विज्ञान आदि की अपनी कोई परंपरा नहीं रही है। वे भी यह कहने और मानने लगे थे कि भारत तो कभी एक राष्ट्र रहा ही नहीं और वे इसे एक राष्ट्र बनाएंगे। उन्होंने ही ‘ए नेशन इन दि मेकिंग’ का मुहावरा प्रचलित किया। परंतु गांधी जी ने 1909 में न केवल अंग्रेजों की इस स्थापना का खंडन किया, बल्कि यह भी कहा कि भारत राष्ट्र की परंपरा और ज्ञान-विज्ञान अंग्रेजों की परंपरा व ज्ञान-विज्ञान से कहीं अधिक श्रेष्ठ थी। वे लिखते हैं, “मैं मानता हूं कि जो सभ्यता हिन्दुस्तान ने दिखायी है उसको दुनिया में कोई नहीं पहुंच सकता। जो बीज हमारे पुरखों नें बोये हैं उनकी बराबरी कर सके, ऐसी कोई चीज देखने में नहीं आयी। रोम मिट्टी में मिल गया। ग्रीस का सिर्फ नाम ही रह गया। मिस्र की बादशाहत ही चली गई। जापान पश्चिम के शिकंजे में फंस गया और चीन का कुछ भी कहा नहीं जा सकता। लेकिन गिरा टूटा जैसा भी हो, हिन्दुस्तान आज भी अपनी बुनियाद में मजबूत है।

जो रोम और ग्रीस गिर चुके हैं, उनकी किताबों से यूरोप के लोग सीखते हैं। उनकी गलतियां वे नहीं करेंगे, ऐसा गुमान रखते हैं। ऐसी उनकी कंगाल हालत है जब कि हिन्दुस्तान अचल है, अडिग है। यही उसका भूषण है। हिन्दुस्तान पर आरोप लगाया जाता है कि वह ऐसा जंगली, ऐसा अज्ञान है कि उससे जीवन में कुछ फेरबदल कराये ही नहीं जा सकते। यह आरोप हमारा गुण है, दोष नहीं। अनुभव से जो हमें ठीक लगा है, उसे हम क्यों बदलेंगे? बहुत से अकल देनेवाले आते जाते रहते हैं पर हिन्दुस्तान अडिग रहता है। यह उसकी खूबी है, यह उसका लंगर है।

सभ्यता वह आचरण है जिससे आदमी अपना फर्ज अदा करता है। फर्ज अदा करने के मानी है नीति का पालन करना। नीति के पालन का मतलब है अपने मन और इन्द्रियों को बस में रखना। ऐसा करते हुए हम अपने को (अपनी असलियत को) पहचानते हैं। यही सभ्यता है। इससे जो उल्टा है वह बिगाड़ करनेवाला है।

हजारों साल पहले जो हल काम में लिया जाता था उससे हमने काम चलाया। हजारों साल पहले जैसे झोंपडे थे, उन्हें हमने कायम रखा। हजारों साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी वही चलती आई। हमने नाशकारक होड़ को समाज में जगह नहीं दी, सब अपना अपना धंधा करते रहे। उसमें उन्होंने दस्तूर के मुताबिक दाम लिये। ऐसा नहीं था कि हमें यंत्र वगैरा की खोज करना ही नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि लोग अगर यंत्र वगैरा की झंझट में पड़ेंगे, तो गुलाम ही बनेंगे और अपनी नीति को छोड़ देंगें। उन्होंने सोच-समझकर कहा कि हमें अपने हाथ पैरो से जो काम हो सके वही करना चाहिये। हाथ पैरों का इस्तेमाल करने में ही सच्चा सुख है, उसी में तन्दुरुस्ती है।

उन्होंने सोचा कि बड़े शहर खडे क़रना बेकार की झंझट है। उनमें लोग सुखी नहीं होंगें। उनमें धूर्तों की टोलियां और वेश्याओं की गलियां पैदा होंगी। गरीब अमीरों से लूटे जायेंगे। इसलिए उन्होंने छोटे देहातों से संतोष माना।

उन्होंने देखा कि राजाओं और उनकी तलवार के बनिस्बत नीति का बल ज्यादा बलवान है। इसलिए उन्होंने राजाओं को नीतिवान पुरुषों, ऋषियों और फकीरों से कम दर्जों का माना। ऐसी जिस राष्ट्र की गठन है वह राष्ट्र दूसरों को सिखाने लायक है। वह दूसरों से सीखने लायक नहीं है।

इस राष्ट्र में अदालतें थीं, वकील थे, डाक्टर-वैद्य थे। लेकिन वे सब ठीक ढंग से नियम के मुताबिक चलते थे। सब जानते थे कि ये धन्धे बड़े नहीं हैं और वकील डाक्टर वगैरा लोगों में लूट नहीं चलाते थे। वे तो लोगों के अश्रित थे। वे लोगों के मालिक बनकर नहीं रहते थे। इन्साफ काफी अच्छा होता था। अदालतों में न जाना यह लोगों का ध्येय था। उन्हें भरमाने वाले स्वार्थी लोग नहीं थे। इतनी सड़न भी सिर्फ राजा और राजधानी के आसपास ही थी। यों आम प्रजा तो उससे स्वतंत्र रहकर अपने खेत का मालिकी हक भोगती थी। उसके पास सच्चा स्वराज्य था और जहां यह चांडाल सभ्यता नहीं पहुंची है, वहां हिन्दुस्तान आज भी वैसा ही है।

अपने राष्ट्र के बारे में धारणा का यह बुनियादी अंतर कांग्रेस और गांधी जी में था। इसी कारण गांधी जी जहां अपने देश की समस्याओं का समाधान देश में ही ढूंढते थे, पंडित नेहरू समेत अन्य कांग्रेसी नेता यूरोप का मुंह ताका करते थे। पंडित नेहरू पर तो साम्यवाद का नशा भी हावी था, जबकि अनेक मौकों पर गांधी जी ने साम्यवाद को गलत और हानिकारक बताया था। वे राज्य को सर्वोच्च सत्ता मानने के साम्यवादी सिध्दांत को सिरे से खारिज करते थे। यदि एक वाक्य में गांधी जी के विचारों को समझना हो तो कहा जा सकता है कि गांधी जी देश की सभी समस्याओं का समाधान देश की परंपराओं और आदर्षों में ही तलाषते थे, जबकि आज देश में सड़कें भी बनानी होती हैं तो हमारे आज के नेता विदेश विषेषकर यूरोप की ओर भागा करते हैं। गांधी जी चाहते थे कि अपने देश में षिक्षा, न्याय और स्वास्थ्य आदि की व्यवस्थाएं यहां की परंपराओं के अनुकूल ही बनाई जाएं। उनका स्पष्ट मानना था कि इसके लिए हमें अपना जीवन त्यागमय और तपस्वी बनाना होगा। परंतु आम जन तो एक तरफ, स्वयं को उनका अनुयायी घोषित करने वाली कांग्रेस भी इसके लिए तैयार नहीं हो पाई।

आज महात्मा गांधी को केवल अहिंसा और हिन्दू मुस्लिम समस्या की चौखट में बांध दिया गया है। ऐसे लोगों के लिए उन्हें याद करने का एक ही अर्थ है कि वे जिसे सांप्रदायिक मानते हैं, उन्हें जी भर कर गाली दिया जाए, या फिर राम रहीम के गीत गा लिए जाएं। वास्तव में महात्मा गांधी को याद करने और याद रखने का सही तरीका तो यही है कि उन्होंने अपने राष्ट्र की जिस सनातनता को स्थापित करने का प्रयत्न किया था, उसे समझने का हम प्रयत्न करें और उसके संरक्षण का हम भी संकल्प लें। हिन्दू-मुस्लिम समस्या के अलावा भी गांधीजी ने ढेरों बातें कहीं हैं और वे इस समस्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय हैं। परंतु आज के कांग्रेस के साथ साथ गांधीवादियों की भी आदत हो गई है कि हिन्दू-मुस्लिम समस्या के समय तो गांधी जी को याद करेंगे और इसके अतिरिक्त किसी भी समस्या पर विचार करते समय उन्हें पूरी तरह उपेक्षित कर देंगे। हम भूल चुके हैं कि गांधी जी इस देश को प्राचीन व सनातन राष्ट्र मानते थे, हम भूल चुके हैं कि वे धर्म को इस देश की आत्मा मानते थे सेकुलरवाद को नहीं, हम भूल जाएंगे कि वे इस देश की सनातन परंपरा को गर्व का विषय मानते थे, शर्म का नहीं। आज महात्मा गांधी का जन्म दिवस मनाते हुए हम नाच-गाने का आयोजन तो करते हैं, परंतु उनकी शिक्षाओं और निर्देशों को याद करने की कोशिश भी नहीं करते। क्या यह पिता की अवज्ञा करने वाली उच्छ्रंखल संतानों जैसा ही व्यवहार नहीं है? यदि हम महात्मा गांधी को वास्तव में राष्ट्रपिता मानते हैं तो क्या हम उनकी संतान कहलाने की योग्यता रखते हैं? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर विचार किए बिना महात्मा गांधी जयंती मनाना कदापि सार्थक नहीं हो सकता।

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गरीबों का भोजन, गोमांस या नमक-रोटी

Posted by bhartiyapaksha on October 24, 2009

अपने देश के गरीबों का सामान्य भोजन क्या है? अभी तक तो नमक रोटी को ही गरीबों का भोजन समझा जाता रहा है। बहुत हुआ तो चना चबैना को भी जोड़ लिया जाता है। परंतु देश की राजधानी में रहने वाले सेकुलर अंग्रेजी मीडिया के झंडाबरदारों के लिए गरीबों का भोजन गोमांस है। पिछले दिनों विश्वमंगल गोग्राम यात्रा के प्रारंभ के अवसर पर यात्रा के आयोजकों से बातचीत में एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र की पत्रकार ने पूछा कि गोहत्या बंद हो जाने से गरीब लोगों को भोजन का संकट नहीं हो जाएगा क्या? यह सवाल बड़ा ही चौंकाने वाला है। आज तक किसी भी समझदार अर्थशास्त्री ने ऐसा गंभीर सवाल नहीं उठाया है। भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अंतर्गत का एक उपक्रम भरारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् ने तो गाय से अन्त्योदय पर एक पैनल बना रखा है। यानी वह गाय द्वारा गरीबों की गरीबी दूर करना चाहती है। इस विषय पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था फूड एंड एग्रीकल्चर ओर्गनाइजेशन भी विशेष रूप से जोर देने में जुटी हुई है। फिर गाय को बचाने से गरीबों को भोजन का संकट हो जाएगा, इस सोच और मानसिकता को क्या कहा जाए?

वास्तव में ये पत्रकार अपने सेकुलरपने के ढोंग में इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें मोटी-मोटी बातें भी समझ नहीं आ पातीं। उन्हें नमक का मूल्य पचास पैसे प्रति किलो से दस रूपये प्रति किलो हो जाने की कोई चिंता नहीं होती और न ही उन्हें गोधन के कम होने से कृषि लागत में हो रही वृध्दि, उसके परिणामस्वरूप किसानों पर बढ़ते कर्जे और उसके परिणामस्वरूप किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं की कोई चिंता है। उन्हें चिंता है तो केवल देश को सेकुलर बनाने की, चाहे इसके ऐवज में देश को कितनी भी बड़ी कीमत चुकानी पड़े, चाहे इसके लिए हजारों लाखों गरीबों को मरना ही क्यों न पड़े। यह हमारे देश का सेकुलर अर्थशास्त्र है।

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उदार ईसाइयत का क्रूर चेहरा

Posted by bhartiyapaksha on October 23, 2009

Crual Christinity

यह चित्र नाईजीरिया देश के इकेत नामक शहर के उन बच्चों का है, जिन्हें चर्च ने विच यानी कि चुड़ैल या जादूगर घोषित किया हुआ है जिसके कारण इन्हें मारा जाने वाला था। इन्हें एक स्वयंसेवी संस्था के प्रयासों से बचाया जा सका और इस चित्र में ये बच्चे संस्था के शिविर में भोजन मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हैरान होने की कोई आवश्यकता नहीं है, यह चित्र कोई दो-तीन सदी पुराना नहीं है, यह चित्र केवल कुछ महीने पहले 18 अगस्त, 2009 का लिया हुआ है। इस चित्र के साथ छपी खबर हमें बताती है कि हालांकि विचक्राफ्ट यानी कि जादूगरी व चुड़ैलों का विचार कोई नया नहीं है लेकिन इसे हालिया दिनों में नया जीवन अवश्य मिल गया है। इसे नया जीवन इवैजेलिकल ईसाइयत के तीव्र उभार के कारण मिला है। खबर यह है कि पिछले दशक में नाईजीरिया के 36 में से केवल दो राज्यों में 15 हजार से अधिक बच्चों को इसका दोषी ठहराया जा चुका है और उनमें से लगभग एक हजार की हत्या भी की जा चुकी है। पिछले महीने यानी कि सितम्बर, 09 में ही तीन बच्चों को इसी आरोप में मार दिया गया और अन्य तीन को जलाने की कोशिश की गई। रपट के अनुसार इस क्षेत्र में अनेक चर्च हो जाने के कारण उनमें प्रतियोगिता काफी बढ़ गई है और इस प्रतियोगिता में अपनी महत्ता सिध्द करने के लिए चर्चाें के पास्टर बच्चों को चुड़ैल होने या जादु-टोना करने का दोषी ठहराते हैं। ऐसा करके वे स्वयं को दैवीशक्तिसंपन्न सिध्द करते हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि आमतौर पर ये आरोप गरीब, अनाथ, बीमार और विक्लांग बच्चों पर ही लगाए जाते हैं। ये घटनाएं नमूना मात्र ही हैं क्योंकि पूरे अफ्रीका में ईसाई मत प्रचारकों द्वारा यही खेल खेला जा रहा है। रपट लम्बी है और जो उसे पढ़ना चाहते हैं, वे इस लिंक पर क्लिक करके उसे पूरा एलए टाइम्स की साईट पर पूरा पढ़ सकते हैं। लिंक है http://pewforum.org/news/display.php?NewsID=18898

उल्लेखनीय बात यह भी है कि अभी तक पोप या चर्च के किसी भी अधिकृत व्यक्ति ने अफ्रीका में पास्टरों द्वारा किए जा रहे इस अमानवीय कृत्य की निंदा नहीं की है और न ही उसे रोकने की कोई कोशिश की है। वहां काम कर रहे सभी चर्चाें के मुख्यालय विकसित कहे और समझे जाने वाले देशों में स्थित हैं। ये मुख्यालय उनसे अपना वार्षिक शुल्क नियमित रूप से लेते हैं, यानी कि उन्हें अच्छी तरह पता है कि वहां क्या चल रहा है, परंतु उन्हें उससे कोई मतलब नहीं है। उन्हें मतलब है तो केवल अपनी बढ़ती संख्या और धन से। यही है ईसाइत का असली स्वरूप।

बहरहाल, यह सोचा जा सकता है कि भई, नाईजीरिया में घटी इन घटनाओं से हमें क्या लेना-देना? लेना-देना इसलिए है कि अपने देश में भी ईसाई मत का प्रचार प्रसार विशेष रूप से ऐसे ही सुदूर क्षेत्रों में किया जाता है। वहां वे उनके साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं, इस पर किसी की कोई नजर नहीं होती है। प्रशासन तो वहां होता ही नहीं है, मीडिया वहां पहुंच नहीं सकता और वे बेचारे तो बोलना ही नहीं जानते, चीख कैसे पाएंगे। परंतु उन क्षेत्रों में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनों ने जब भी कभी चर्चाें द्वारा की जाने वाली जबरदस्ती, अत्याचार और लोगों के भोलेपन का नाजायज फायदा उठाने की चर्चा की, उन्हें नजरअंदाज ही नहीं किया गया, बल्कि हमारे देश के सेकुलर मीडिया ने उन्हें ही सांप्रदायिक ठहराना शुरू कर दिया। अपने देश के सेकुलर नवबौध्दिकों को ईसाइत अत्यंत समझदार, प्रगतिशील, सभ्य, वैज्ञानिक और शांतिप्रिय प्रतीत होता है और जब भी कोई इसके विपरीत कुछ कहने की कोशिश करता है, ये ऐसे चीखने चिल्लाने लगते हैं, जैसे इन पर कोई दौरा पड़ गया हो। इन नवबौध्दिकों को यह खबर विशेष रूप से पढ़नी चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि धार और कंधमाल जैसे क्षेत्रों में जहां ईसाइयों के विरूध्द हिंसा भड़की थी, वहां भी ऐसे ही कुछ कारण मौजूद थे। उसमें किन्हीं हिन्दूवादी संगठनों को हाथ नहीं था, जैसा कि वे प्रचारित करते आ रहे हैं। उनमें लंबे समय से ईसाइयों के प्रति क्रोध पल रहा था, जो किसी समय सामने आ गया। पिछले दिनों झारखंड में भी नेम्हा बाइबिल के मुद्दे पर ऐसा ही आक्रोश फैला था, लेकिन समय रहते चर्च ने माफी मांग कर स्थिति को सम्भाल लिया था। परंतु ईसाइयों की इन कारगुजारियों पर नजर रखने का नैतिक साहस हमारे देश की सरकारों या लोकतंत्र के चौथे खंभे मीडिया में नहीं है।

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कामनवेल्थ गेम्स, लोकतंत्र और मीडिया

Posted by bhartiyapaksha on October 23, 2009

एक खबर ने देश के लोकतंत्र के दो खंभों की विश्वसनीयता पर एक साथ प्रश्न चिह्न लगा दिया। खबर थी राजधानी दिल्ली में हो रहे कामनवेल्थ खेलों के बारे में। कामनवेल्थ खेलों की तैयारी की स्थिति की जांच करने के लिए विदेश से एक दल आ रहा था। उस दल को जांच हेतु घूमने के लिए दिल्ली की कुछ सड़कों को दिन भर के लिए बंद कर दिया गया था। यह एक ऐसी खबर है जो देश में लोकतंत्र होने पर ही एक बड़ा सवालिया निशान लगा देती है। सवाल यह है कि आखिर इन खेलों के आयोजन से देश और देश की जनता को क्या हासिल होने वाला है? यह सवाल भी देश की जनता का ही है, जो दिल्ली की एक आम गृहिणी ने पूछा है। उस गृहिणी का प्रश्न था कि इन खेलों से क्या हासिल होने वाला है जो आम आदमी को इतनी तकलीफ दी जा रही है और उसकी गाढ़ी कमाई के इतने पैसे बहाए जा रहे हैं? यह ठीक है कि सत्ता में बैठे राजनीतिक लोगों को जितना दिखता है और समझ आता है, उस आम गृहिणी को उतना देख व समझ नहीं आ सकता, परंतु यह भी सच है कि सत्ता में बैठे लोगों को देश के आम आदमी से जुड़ाव समाप्तप्राय सा हो गया, अन्यथा यह सवाल उस गृहिणी के मन में नहीं आता। वास्तव में यह सवाल केवल उस गृहिणी का ही नहीं है, बल्कि रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हर उस व्यक्ति का है, जो दिन-रात मेहनत कर रहा होता है और इन आयोजनों से जिसके पेट पर सीधी लात पड़ती है। सड़कों के बंद होने से उसका उस दिन का पूरा काम बंद हो जाता है। फिर अभी तो यह शुरूआत ही है, खेलों का आयोजन होना अभी बाकी है। उस समय क्या होगा, इसकी तो कल्पना भी करना मुश्किल है। बहरहाल, अभी तो सवाल यही है कि आखिर कब तक लोकतंत्र के नाम पर देश में राज कर रहे लोग देश के आम आदमी से विमुख योजनाएं बनाते रहेंगे और उसकी गरीबी और समस्याओं का मजाक उड़ाने वाले आयोजन करते रहेंगे?

इस खबर ने देश के स्वयं को राष्ट्रीय और जन सरोकारों का हिमायती घोषित करने वाले मीडिया पर भी एक बार फिर प्रश्न चिह्न लगा दिया। इस खबर को लगभग सभी प्रमुख चैनलों और अखबारों ने इस तरह से प्रस्तुत किया मानों उस दिन पूरी दिल्ली जैसे ठहर जाने वाली हो। उनकी खबरों को देखने और पढ़ने से ऐसा लग रहा था जैसे उस दिन राजधानी की सड़कों पर भारी जाम लगने वाला है और लोगों का चलना असंभव की तरह मुश्किल हो जाएगा। बहरहाल, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और आम दिनों की तरह ही लोग-बाग अपने काम में लगे रहे। अंतत: मीडिया को भी कहना भी पड़ा कि कहीं कोई जाम नहीं लगा। यदि लगा भी तो उतना जाम तो दिल्ली की सड़कों के लिए आम बात है। अब सवाल यह उठता है कि यदि कोई खबर मीडिया को प्राप्त होती है तो उसका काम क्या उस खबर को बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करके लोगों को आतंकित करना है? लगभग हर बार मीडिया की भूमिका ऐसी ही देखी गई है। चाहे दिल्ली में बारिश हो जाए या फिर कोई और आयोजन। मीडिया लोगों को सूचित करने की बजाय आतंकित करने में जुट जाता है। परंतु एक बार फिर उसकी खबरें झूठी और गलत साबित हुईं हैं और लोगों का उस पर से विश्वास हिला है।

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संघ और भाजपाः ये रिश्ता क्या कहलाता है?

Posted by bhartiyapaksha on September 18, 2009

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी। एक परिवार के दो सदस्य। एक विचारधारा के दो पहलू। एक संगठन में व्यस्त है तो एक राजनीति में। इस नाते दोनों में एक गंभीर रिश्ता है। परंतु यह रिश्ता क्या है, इस पर काफी विवाद और संभ्रम है। मातृ संगठन संघ को कहें और भाजपा को उसकी अनुषांगिक इकाई या संघ को वटवृक्ष कहें और भाजपा को उसकी एक शाखा या संघ को कारखाना कहें और भाजपा को उत्पाद? यह एक बड़ा जटिल सवाल है। इसकी जटिलता से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, यदि यह किसी संगठन का एक अंदरूनी मामला होता। इससे फर्क इसलिए पड़ता है क्योंकि भाजपा देश की क्रमांक दो की पार्टी है और संघ देश का सबसे बड़ा संगठन। फर्क इसलिए भी पड़ता है क्योंकि देशहित में काम करने वाले जो दो-चार सामाजिक व सांस्कृतिक संगठन हैं, उनमें सबसे अधिक राजनीतिक प्रभाव संघ का ही है। गायत्री परिवार और स्वाध्याय मंडल जैसे संगठन भी व्यक्ति निर्माण कर रहे हैं, परंतु उनका राजनीतिक प्रभाव शून्य है और इस कारण नीति-निर्माण तथा देश की दशा और दिशा नियत करने में उनकी भूमिका नगण्य है। इसलिए यदि रा.स्व.संघ जैसे संगठन का भटकाव होता है तो देश की आशाएं मद्धम पड़ने लगती हैं। यही कारण है कि अमर सिंह व मनमोहन सिंह जैसे संघविरोधी नेताओं और खुशवंत सिंह जैसे संघविरोधी स्तंभलेखकों को भी कहना पड़ा कि भाजपा का यह बिखराव देशहित में नहीं है। इसलिए आइए देखें, कि भाजपा और संघ में आखिर क्या रिश्ता है और इस रिश्ते से देश के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है?

पिछले कुछ दिनों से देश की क्रमांक दो की राजनीतिक पार्टी भाजपा भारी उथल पुथल के दौर से गुजर रही है। यूं तो वर्ष 2004 के आम चुनावों में मिली हार के बाद से ही भाजपा की परेशानियों का दौर शुरू हो गया था। यह एक तथ्य है कि भाजपा नेतृत्व चुनावी हार को कभी भी पचा नहीं पाया है। 1971 हो या 2004 हार से वे बुरी तरह बौखलाते रहे हैं। प्रमोद महाजन की हत्या और आडवाणी के जिन्ना संबंधी बयान के विवादों के बाद संकट और गहराया। परंतु इस समय तक भी पार्टी को 2009 के आम चुनावों से कुछ आशा थी। परंतु 2009 के आम चुनावों में हार होते ही पूरी पार्टी इस तरह बिखरने लगी है जैसे हल्की हवा चलने से ताश का महल ढहने लगता है। हार के बाद न केवल पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी उभर कर सामने आयी, बल्कि अनेक वरिष्ठ नेता बगावती तेवर अपनाने लगे। जसवंत सिंह, यशवंत सिंह, अरूण शौरी, सुधींद्र कुलकर्णी आदि अनेक नेताओं ने आक्रामक रूख अपना लिया। पार्टी नेतृत्व काफी अक्षम, निष्प्रभावी, र्किकर्तव्यविमूढ़ और दिशाहीन दिखने लगा। संकट केवल सांगनिक स्तर तक होता तो भी ठीक होता, लेकिन कोढ़ में खाज की कहावत को चरितार्थ करते हुए एन मौके पर जसवंत सिंह ने जिन्ना की प्रशंसा में अपनी किताब पूरी करके छपवा दी। अब यह संकट वैचारिक भी हो गया और इस नाटक में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को उतरना पड़ा। उल्लेखनीय है कि अरूण शौरी ने कुछ दिन पहले एक टेलीविजन चैनल को साक्षात्कार में कहा कि भाजपा की स्थिति कटी पतंग जैसी हो चुकी है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को चाहिए कि वह इसका नियंत्राण अपने हाथ में ले ले। इससे ठीक पहले संघ से सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी एक टेलीविजन चैनल पर साक्षात्कार दिया था और उसमें उन्होंने भाजपा के मामलों से संघ को पूर्णत: निर्लिप्त बताया था और भाजपा पर संघ के नियंत्रण की किसी भी संभावना सिरे से खारिज कर दिया था। ऐसे में शौरी के इस बयान पर चर्चा होनी ही थी और चूंकि इसी समय में सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा एक संवाददाता सम्मेलन में किए जाने की सूचनाएं प्रसारित होने लगी जिससे अनायास ही सबका ध्यान संघ द्वारा भाजपा की समस्या के निराकरण हेतु किए जा रहे प्रयासों की ओर चला गया। मोहन भागवत के इस संवाददाता सम्मेलन की प्रचार पूरे एक महीने से किया जा रहा था। परन्तु मोहन भागवत ने इस पत्राकार वार्ता से एक बार फिर संघ के भाजपा में हस्तक्षेप की बात को नकारते हुए न केवल उस पर कुछ भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, बल्कि यह संकेत भी दिया कि मांगे जाने पर ही संघ अपनी राय देगा अन्यथा नही।

इस दौरान विभिन्न भाजपा नेताओं की मोहन भागवत से भेंट वार्ता जारी थी। प्रकाश जावेड़कर, वरूण गांधी, वैंकैया नायडू, अनंत कुमार, अरूण जेटली, सुषमा स्वाराज, रामलाल आदि नेताओं के अलावा लालकृष्ण्ा आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की मोहन भागवत से कई बार भेंट हुई। परंतु इस पूरे घटनाक्रम के दौरान संघ के लोग भाजपा की समस्या से अपनी निर्लिप्तता भी जताते रहे। पूर्व संघ प्रवक्ता बार बार यही कहते रहे कि भाजपा नेताओं से ये मुलाकातें अनौपचारिक हैं और इनका भाजपा के वर्तमान झमेले से कुछ भी लेना देना नहीं है। स्वाभाविक ही है कि ऐसी स्थिति में कोई भी केवल अनुमान ही लगा सकता है कि वास्तव में संघ और भाजपा के बीच क्या संबंध हैं? उनके नेता जब मिल रहे हैं, तो वे आपस में क्या बातें कर रहे हैं? उनकी इन मुलाकातों और वार्ताओं के दौर से क्या परिणाम होने वाले हैं? ऐसे अनुमानों से संभ्रम और बढ़ता ही है।

बहरहाल, संघ और भाजपा के बीच संबंधों का संभ्रम केवल देश की मीडिया या फिर  संघ परिवार से बाहर के लोगों में ही व्याप्त हो, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। संघ परिवार में भी इस बारे में पर्याप्त संभ्रम विद्यमान है। जमीनी स्वयंकसेवकों, कार्यकर्ताओं और अधिकारियों के अलग अलग स्तर पर संघ और भाजपा के संबंधों के बारे में अलग अलग धारणाएं हैं। देखा जाए तो संघ की पूरी कार्यप्रणाली में एक अंतर्द्वन्द्व दिखता है जो अक्सर समाज जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों पर संघ के कार्यकर्ताओं को निर्णयात्मक भूमिका में आने में बाधा बनता है। उसका यह अंतर्द्वन्द्व राजनीतिक कार्यों को लेकर है। संघ का राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना चाहिए या नहीं? यही अंतर्द्वन्द्व है जिसके कारण अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों पर संघ अपनी भूमिका, स्थिति, सोच और नीति स्पष्ट नहीं कर पाता। इससे समाज में और स्वंय संघ के स्वंयसेवकों में भांति-भांति के भ्रम पैदा होते हैं। यह प्रश्न संघ के सामने देश के स्वाधीन होने के साथ ही खड़ा हुआ था और इस प्रश्न के उत्तर में ही संघ और भाजपा के संबंधों की वास्तविकता भी छुपी है।

हांलाकि कम्युनिस्टों के प्रचार के बाद संघ पर यह आरोप लगता रहा है कि उसका देश के स्वाधीनता संग्राम से कोई लेना-देना नहीं रहा है, लेकिन यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि संघ संस्थापक डा. हेडगेवार अपने बाल्यकाल से ही देश की स्वाधीनता के लिये प्रयत्नशील रहे थे और संघ की स्थापना के पीछे उनका प्रमुख उद्देश्य भी यही था। संघ की स्थापना से पूर्व वे क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति और बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय रहे थे। 1920 के खिलाफत आंदोलन और उसके बाद हुए मोपला विद्रोह में मुस्लिम अलगाववादियों के उत्पात और महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियों को देखने के बाद उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया। क्रांतिकारिओं के सामर्थ्य की अल्पता से भी वे परिचित थे और उनका स्पष्ट मानना था कि देश सशस्त्रा क्रांति का वातावरण ही नहीं है। इसलिए काफी चिंतन-मनन के बाद उन्होंने स्वाधीनता प्राप्त करने के लिये एक नया रास्ता तलाशने का विचार किया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। संघ की स्थापना के बाद भी वे कुछ दिनों तक कांग्रेस में सक्रिय रहे। संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य भारत की स्वाधीनता ही थी। इस तथ्य को इस बात से भी समझा जा सकता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले तक संघ की प्रतिज्ञा जो हरेक वयस्क स्वयंसेवक को लेनी होती थी, में भारत को स्वाधीन कराने का संकल्प हुआ करता था। इसलिए संघ में ‘याचि देहि याचि डोला’ का मुहावरा प्रचलित हुआ था। यानी इस देह में इन्हीं आंखों से संघ का कार्य पूर्ण करना है, यह सपना डा. हेडगेवार का था। यही कारण था कि जब 1939 में डा. हेडगेवार अस्वस्थ थे और यूरोप में महायुद्ध शुरू हो गया तो वे अत्यंत परेशान हो गए। उन्हें लग रहा था कि अंग्रेज अभी कमजोर हो रहे हैं, उन पर हमला करने का यह सर्वोत्तम समय है, परन्तु वे संघ की स्थिति उतनी मजबूत नहीं पाते थे। स्वयं भी अस्वस्थ थे। उनके सर्वाधिक अधिकृत जीवनीकार ना.ह. पालकर ने लिखा है कि उन दिनों सन्निपात की अस्वस्थ में वे अक्सर बड़बड़ाया करते थे, ”यह देखो 1940 भी जा रहा है। हम अभी कुछ नहीं कर पाए। आज हम परतंत्र हैं पर स्वतंत्र होकर ही रहेंगे।” आदि-आदि। दुर्भाग्यवश 1940 में डा. हेडगेवार की मृत्यु हो गई। उसके बाद श्रीगुरूजी सरसंघचालक बने और यहीं से संघ के अंतर्द्वन्द्व का प्रांरभ हुआ।

देवेंन्द्र स्वरूप का मानना है श्री गुरूजी के सरसंघचालक बनने के बाद संघ में सांस्कृतिक पुनरूत्थान, आजन्म कार्य करने जैसी शब्दावलियां शुरू हो गई। देवेन्द्र स्वरूप के अनुसार संघ की कार्यप्रणाली शाखा-पद्धति स्वयंसेवकों में राजनैतिक गुण व स्वभाव विकसित करती है जबकि गुरूजी ने संघ के कार्य को सांस्कृतिक दिशा में ले जाने का प्रयास शुरू किया। परन्तु संघ के स्वयंसेवकों का बड़ा वर्ग श्री गुरूजी से असहमत था। उनकी इस असहमति को और बल मिला, जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लग गया। प्रतिबंध समाप्त होने के बाद संघ के अधिकांश स्वयंसेवक अनुभव करने लगे थे कि अब संघ को पूरी तरह राजनीतिक कार्य में लग जाना चाहिए। इसी समय कांग्रेस में भी उथल-पुथल हो रही थी और कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों से असन्तुष्ट नेता हाशिये पर पहुंचा दिये जा रहे थे। इसमें से एक पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी संघ के संपर्क में थे। वे पहले डा. हेडगेवार से भी मिल चके थे। उन्होंने हिन्दुत्व की विचारधारा पर आधारित एक राजनीतिक दल बनाने को विचार किया। संघ के अनेक कार्यकर्ता उनके सपंर्क में थे। इसके लिये वे तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरूजी से भी मिले थे परन्तु श्री गुरूजी किसी राजनीतिक दल की स्थापना में संघ की कैसी भी भूमिका के लिये तैयार नहीं थे। अत: उन्होंने डा. मुखर्जी को किसी भी प्रकार की कोई सहायता देने से स्पष्ट मना कर दिया। परन्तु जैसा कि ऊपर लिखा गया है, स्वयंसेवकों का एक बड़ा वर्ग डा. मुखर्जी से सहमत था। जब स्वयंसेवकों ने देखा कि संघ नेतृत्व संगठन के स्तर पर कोई पहल करने के लिये तैयार नहीं हैं तो उन्होंंने स्वयं पहल करना प्रारंभ कर दिया ओर इस तरह जनसंघ की अनेक राज्य इकाईयों का गठन होने लगा। सबसे पहले जालंधर में पंजाब इकाई का गठन हुआ। भाजपा के विवादास्पद पार्टी डाक्युमेंट के खंड छ: ‘भारतीय जनसंघ का इतिहास’ में लिखा है ”जैसा कि पहले बताया जा चुका है, भारतीय जनसंघ का निर्माण राज्य स्तर पर शुरू हुआ था, ओर जब अनेक राज्य इकाईयां गठित हो गईं तो राष्ट्रीय पाटी का गठन किया गया। इस दिशा में सबसे पहले पंजाब-दिल्ली इकाई का गठन हुआ था। इस इकाई में संघ कार्यकर्ताओं के साथ-साथ वैसे लोग भी थे जो सीधे संघ से नहीं जुड़े थे लेकिन उसकी विचारधारा और सोच के काफी निकट थे।” यही बात वैद्य गुरूदत्त ने अपनी पुस्तक ‘भाव और भावना’ में इन शब्दों में लिखी है, ”अब जनसंघ की स्थापना होने लगी थी तो जनसंघ के जन्मदाता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख अधिकारी इसकी स्थापना के पक्ष में नहीं थे। कुछ स्वयंसेवक एवं कार्यकर्ता थे जो एक राजनीतिक दल के निर्माण के पक्ष में थे। इनमें प्रमुख थे श्री बसंत राव ओक सामान्य स्वयंसेवकों, विशेषरूप में उत्तारी भारत के स्वयंसेवकों में राजनीतिक दल स्थापित करने की उत्कट अभिलाषा थी। श्री वंसतराव ओक ने उनका नेतृत्व किया और डा. मुखर्जी से राय करने लगे।

…कुछ लोगों ने, जो डा. मुखर्जी के धड़े के विरोधी थे, जालन्धर में बिना डा. साहब को आमंत्रित किए जनसंघ की स्थापना कर दी और पंजाब के एक विख्यात नेता महात्मा हंसराज के सुपुत्र श्री बलराज भल्ला को नेता मान लिया।

परन्तु वे स्वयंसेवक जो जनसंघ की स्थापना एवं उन्नति के लिये सत्य हृदय से इच्छुक थे, इससे प्रसन्न नहीं हुए। इस कारण जालंधर की कार्यवाही को रद्द कर पुन: दिल्ली में भारतीय जनसंघ की डा. मुखर्जी के नेतृत्व में स्थापना की गई। इसके महामंत्री श्री वसन्तराव ओक बनाए गए।”

इस बात को देवेंद्र स्वरूप कुछ इन शब्दों में कहते हैं, ”भारतीय जनसंघ का जन्म 1951 में किसी एक नेता के आह्वान पर न होकर भारतीय राष्ट्रवाद के वैचारिक अधिष्ठान पर नीचे से ऊपर की ओर हुआ था। बहुत कम लोगों को पता है कि जनसंघ की इकाइयां पहले जिला स्तर पर बनीं, फिर प्रादेशिक समितियां बनीं और अंत में उन प्रादेशिक समितियों ने एकत्र होकर अखिल भारतीय इकाई का निर्माण किया और उसका अध्यक्ष चुना। मैं उस प्रक्रिया का साक्षी हूं। मैं उस समय प्रयाग नगर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूर्णकालिक कार्र्यकत्ता (प्रचारक) था।

…संघ नेतृत्व पर बाहर और अंदर दोनों ओर से दबाव पड़ा कि भारतीय राष्ट्रवाद की रक्षा के लिए उसे राजनीति में हस्तक्षेप करना चाहिए। संघ में उस समय बहुत आंतरिक बहस चली। तत्कालीन सरसंघचालक मा.स.गोलवलकर की मूल प्रवृत्ति आध्यात्मिक थी और सत्ता राजनीति से घोर वितृष्णा थी। वे संघ को राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए राष्ट्र जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में रचनात्मक कर्म के द्वारा सांस्कृतिक भूमिका निभाने के पक्ष में थे। वे संघ की प्रारंभिक शाखा पद्धति के माध्यम से मनुष्य निर्माण को ही प्रमुखता देते थे। किंतु राजनीतिक घटनाचक्र के कारण चारों ओर से दबाव पड़ने पर उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में सीमित हस्तक्षेप करना स्वीकार किया। संघ के संगठन तंत्र को राजनीति से पूर्णतया अलग रखते हुए उन्होंने नये राजनीतिक दल के निर्माण की प्रक्रिया में संघ के सहयोग की अनुमति प्रदान कर दी।”

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि अलग अलग प्रेक्षकों ने जनसंघ की स्थापना का जो वर्णन किया है, उसमें थोड़ा बहुत विरोधाभास होते हुए भी कई समानताएं हैं। पहली समानता है कि राजनीतिक दल की स्थापना के लिए संघ नेतृत्व यानी कि श्रीगुरूजी बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। उन्हें यह अनुमति मजबूरी में देनी पड़ी। दूसरी बात यह है कि संघ के स्वयंसेवकों ने उनकी अनुमति मिलने से पूर्व ही इकाइयों का गठन प्रारंभ कर दिया था। अखिल भारतीय संगठन बाद में बना। विरोधाभास केवल इतना है कि संघ नेतृत्व ने राजनीतिक कार्य की अनुमति मजबूरी में दी या योजनापूर्वक। परंतु इस सवाल का उत्तर हमें आगे के कुछ घटनाक्रम से मिल जाता है। वैद्य गुरूदत्त लिखते हैं, ”श्री वसन्तराव ओक उत्तरी भारत में आर.एस.एस. के प्रमुख थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को जनसंघ से पृथक करने के लिये श्री ओक को जनसंघ से पृथक रखना चाहते थे। परन्तु जब श्री ओक ने राजनीतिक कार्य में अपनी अभिरूचि प्रकट की तो उन्हें आर.एस.एस. से पृथक कर दिया गया।

यहां तक सब युक्तिसंगत ही था, परन्तु इतने से संतोष न कर जनसंघ के प्रथम अधिवेशन कानपुर में जब श्री वसन्तराव ओक को महामंत्री बनाने का प्रस्ताव हुआ तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उच्चाधिकारियों से आज्ञा मिली कि श्री वसन्तराव ओक के स्थान पर श्री दीनदयाल उपाध्याय को महामंत्री बनाया जाए।

यह था संघ का वह अंग जो स्वयं राजनीति में नहीं आना चाहता था, परन्तु जनसंघ को अपने अंगूठे के नीचे रखना चाहता था। इस मनोवृत्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन उस समय हुआ, जब डा. मुखर्जी परमिट सिस्टम की अवज्ञा कर कश्मीर के लिये चले।

मुझे डा. साहब के साथ जाने के लिये कहा गया और मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। डा. साहब चाहते थे कि कोई युवक भी साथ चले। मुझे और डा. साहब को बताया गया कि श्री टेकचन्द शर्मा हमारे साथ चलेंगे। यात्रा आरंभ हुई। जब हम पानीपत पहुंचे और वहां सार्वजनिक सभा हो रही थी तो जनसंघ के एक प्रमुख सदस्य मेरे पास आए और कहने लगे कि मैं श्री टेकचन्द शर्मा को कह दूं कि वह वहां से दिल्ली लौट जाएं। मैंने श्री टेकचन्द शर्मा को कहा। श्री शर्मा का कहना था कि वह श्री बसन्तराव ओक के विचारों के हैं, इसी कारण दीनदयाल ग्रुप को पसंद नहीं। उन्होंने यह भी कहा है कि वह अपने मित्रों और घरवालों को कहकर आए हैं कि सत्याग्रह करने जा रहे हैं, इस कारण अब लौटेंगे नहीं। मैंने यह बात उस जनसंघ अधिकारी तक पहुंचा दी, जिसने मुझे श्री टेकचन्द को लौट जाने के लिये कहा था।

यह सुन उस अधिकारी ने कह दिया कि उसकी यात्रा का खर्च (रेल टिकट इत्यादि) जनसंघ नहीं देगा। यह मैंने श्री टेकचन्द को बताया तो वह पानीपत नगर में से अपने किसी परिचित से पचास रूपये उधार ले आए और अपना टिकट लेकर अमृतसर की ओर जाने के लिये गाड़ी में आकर बैठ गए। किसी ने टिकट एग्ज़ामिनर से उनका टिकट चैक करने के लिये कहा और वह श्री शर्मा का टिकट देखने आ गया। श्री शर्मा के पास अमृतसर का टिकट था। अमृतसर में बात डा. साहब तक पहुंची। डा. साहब ने मुझसे पूछा तो मैंने पूर्ण घटना का वृतान्त बता दिया। मुझे यह बताया गया था कि श्री टेकचन्द शर्मा जी के स्थान पर श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा रहा है।

जब डा. साहब को पता चला कि यह संघ का आभ्यंतरिक विवाद है तो उन्होंने श्री अटलबिहारी को मना कर दिया और श्री टेकचन्द हमारे साथ चलते गए। मेरे विचार से यह सब इस कारण हो रहा था कि आर.एस.एस. का वह विभाग जो स्वयं राजनीति में तो नहीं आना चाहता था, किन्तु जनसंघ पर हावी रहना भी चाहता था।

यह बात अगले ही वर्ष स्पष्ट हो गई। जनसंघ का अधिवेशन बम्बई में होना निश्चित हुआ था। पं. मौलीचन्द्र शर्मा, जो डा. साहब के निधन के उपरान्त कार्यवाहक प्रधान घोषित हुए थे, जनसंघ के यूनिटों से आगामी वर्ष के लिये प्रधान चुने गए। पं. मौलीचन्द्र शर्मा ने घोषणा कर दी कि वे अमुक तारीख को बम्बई पहुंच रहे हैं और वहां बैठकर अपना अध्यक्षीय भाषण लिखेंगे। भाषण छप चुका था कि एकाएक श्री दीनदयाल की ओर से घोषणा हो गई कि बम्बई जनसंघ अधिवेशन के प्रधान श्री उमाशंकर त्रिवेदी होंगे और वह अमुक तारीख को बम्बई पहुंच रहे हैं।

श्री मौलीचन्द्र शर्मा ने इस समाचार का प्रतिवाद छपवा दिया। झगड़ा बढ़ता गया तो श्री त्रिवेदी ने घोषणा कर दी वह प्रधान नहीं बन रहे। अत: श्री मौलीचन्द्र शर्मा अखिल भारतीय जनसंघ के प्रधान बन गए। इसका परिणाम एक अन्य रूप में प्रकट हुआ। 1955 में दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी के चुनाव हो रहे थे। दिल्ली प्रदेश जनसंघ की कार्यकारिणी ने एक निर्वाचन बोर्ड बना दिया। उसमें पांच सदस्य थे। श्री कंवरवाल गुप्ता थे मंत्री और मैं उसका प्रधान था। पचास प्रत्याशी घोषित करने थे। बोर्ड ने अपनी एक मीटिंग में प्रथम दस की सूची तैयार की। इस पर आर.एस.एस. के एक अधिकारी का टेलीफोन आया कि वह सूची घोषित न की जाए। उसमें आर.एस.एस. की सहमति चाहिए। श्री कंवरलाल ने टेलीफोन पर पूछा कि सहमति कैसे प्राप्त हो सकेगी? क्या प्रत्याशियों की विचारित सूची उनके पास भेज दें? वहां से आज्ञा आई कि उनके दो प्रतिनिधि हमारे निर्वाचन बोर्ड में बैठकर राय देंगे।

आर.एस.एस. के दो प्रतिनिधि अगले दिन आए और तैयार सूची पर पुन: विचार आरम्भ हुआ। दस में दो नाम बदले गए और सूची प्रेस में भेजने के लिये तैयार हो रही थी कि आर.एस.एस. के कार्यालय से पुन: आज्ञा आई कि अभी ठहरा जाए और सूची प्रसारित न की जाए। हमने एक दिन और ठहर जाना स्वीकार किया। परन्तु रात के बारह बजे श्री दीनदयाल उपाध्याय की आज्ञा से दिल्ली प्रदेश जनसंघ की कार्यकारिणी, प्रतिनिधि सभा और निर्वाचन बोर्ड भंग कर ‘एडहाक’ कमेटी बना दी गई।”

इस लंबे उद्धरण से संघ और जनसंघ के संबंधों और संघ की राजनीतिक कार्यों में संलिप्तता या निर्लिप्तता का पता चलता है। वास्तव में प्रारंभ से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नेपथ्य राजनीति करता रहा है। इसका मूल कारण यह है कि शाखा पद्धति से उपजे हुए कार्यकर्ताओं में स्वाभाविक रूप से राजनीतिक अभिरूचि विकसित होती है, जबकि संगठनात्मक उद्देश्यों को राजनीति से पृथक रखा गया है। उद्देश्य और स्वभाव की इस विषमता से ही संघ के इस अंतर्द्वन्द्व का जन्म हुआ है। संघ के इस अंतर्द्वन्द्व के कारण न तो वह खुल कर राजनीति कर पाया और न ही उससे पृथक रह पाया। माया और राम का यह अंतर्द्वन्द्व इतना बढा कि आज समाज को उसकी सारी बातें दोहरी प्रतीत होने लगी हैं। समस्त आचरण दोहरा प्रतीत होने लगा है। परिणामस्वरूप उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है, उनकी प्रामाणिकता और वैचारिक ईमानदारी पर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं। एक पुराने स्वयंसेवक की प्रतिक्रिया है, ”संघ और भाजपा के बीच के संबंध सबको पता हैं। इसे नकारना केवल वाग्जाल मात्र ही है। इनके ऐसे दोहरे बयानों से ही स्वयंसेवकों की श्रद्धा को चोट पहुंचती है।” इस अंतर्द्वन्द्व से निकलने के लिए चित्रकूट में एक बैठक हुई और वहां संघ नेतृत्व ने कुछ नियम बनाए। वहां यह तय किया गया कि भाजपा के सांगठिनक और चुनावी मामलों में संघ हस्तक्षेप नहीं करेगा। परंतु इसके बावजूद न केवल हस्तक्षेप जारी रहा, बल्कि दिल्ली के एक अत्यंत वरिष्ठ संघ कार्यकर्ता ने टिप्पणी की कि ”जब दरियां बिछानी थी और भीड़ जुटाना था, तब तो हम लगे और अब जब मलाई खाने का समय आया है तो हम सब छोड़ दें? यह संभव नहीं है।”

संघ के इस अंतर्द्वन्द्व के कारण जनसंघ में भी एक गहरा अंतर्द्वन्द्व पैदा हुआ। यह अंतर्द्वन्द्व था संघ से संबंध और जनसंघ पर उसके नियंत्रण का। प्रारंभ में ही इसको लेकर जो समस्या शुरू हुई थी, उसका पता पंडित मौलीचंद्र शर्मा और वैद्य गुरूदत्त के उपरोक्त वर्णन से चल जाता है। परंतु यह बात यहीं नहीं रूकी। यह विवाद बढता गया और इस पर बैठक तक बुलानी पड़ गई। देवेंद्र स्वरूप लिखते हैं, ”भाजपा और संघ परिवार के बीच गर्भ-नाल संबंध हैं। इस समय भी भाजपा के अधिकांश नेता संघ प्रक्रिया से राजनीति में आये हैं। संघ के अनेक प्रचारक भाजपा में संगठन मंत्री के नाते संघ की विचारधारा और आदर्शवाद के प्रतिनिधि माने जाते हैं। यह संबंध ही भाजपा में वैचारिक निष्ठा और आदर्शवाद का स्रोत है। पर, यही भाजपा के अन्तर्द्वंद्व का कारण भी है।” इस अंतर्द्वन्द्व का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं, ”1971 के लोकसभा चुनावों में जनसंघ को अपेक्षा से बहुत कम सीटें मिलीं। पराजय की कारण-मीमांसा के लिए दिल्ली के ढांसा रेस्ट हाउस में दो दिन की आत्मालोचन बैठक आयोजित की गयी, जिसमें जनसंघ का षिखर नेतृत्व सम्मिलित हुआ। स्व. श्री के.आर.मलकानी और मुझे भी आर्गेनाइजर तथा पाञ्चजन्य के सम्पादक के नाते उसमें सम्मिलित होने का अवसर मिल गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से स्व. बापूराव मोघे और स्व.दत्तोपंत ठेंगड़ी उपस्थित थे। उस बैठक में एक पर्चा प्रस्तुत किया गया, जिसमें संघ के साथ रिष्ते को जनसंघ की पराजय का एक कारण बताया गया। अटल जी ने उस बैठक में प्रश्न उठाया कि जनसंघ को निर्णय करना होगा कि वह राजनीति में मात्र एक सैद्धांतिक दबाव गुट बनकर रहे या सत्ता प्राप्ति को लक्ष्य बनाये। कौन कह सकता था कि किसी भी राजनीतिक दल का उद्देश्य सत्ता प्राप्ति नहीं होना चाहिए? पर, क्या सिद्धांतनिष्ठा और सत्ता प्राप्ति परस्पर विरोधी हैं? क्या सिद्धांतवाद को तिलांजलि देकर सत्ता प्राप्ति करना उचित होगा? यहां से जनसंघ के सामने सिद्धांतवाद और सत्ता के बीच समन्वय बैठाने की समस्या पैदा हो गयी।”

यह मामला यहीं नहीं रूका। विषय उठा तो भाजपा में संघ के राजनीतिक हस्तक्षेप पर काफी चर्चा हुई। इस पर वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने 1979 में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने संघ द्वारा जनसंघ की गतिविधियों में हस्तक्षेप पर सवाल खड़े किए। संघ को अनेकानेक उपदेश भी दिए। देवेंद्र स्वरूप लिखते हैं, ”भारतीय जनसंघ का नेतृत्व अभी भी जनता पार्टी के भीतर दोहरी सदस्यता के विवाद से जूझ रहा था। जनसंघ के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने 2 अगस्त 1979 को इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा जिससे ध्वनित होता था कि वे दोहरी सदस्यता के प्रश्न पर संघ से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। इस लेख में संघ के अनुषांगिक संगठनों (विद्यार्थी परिषद् व मजदूर संघ आदि) की राजनीतिक गतिविधियों पर आपत्ति उठाई गई। संघ को मुस्लिमों के लिए दरवाजे खोलने का उपदेष दिया गया। हिन्दू राष्ट्र की जगह भारतीय राष्ट्र शब्द प्रयोग अपनाने को कहा गया। इसी सोच में से 5 अप्रैल 1980 को 3500 प्रतिनिधियों के मुम्बई सम्मेलन में जनता पार्टी से अलग एक नये दल के निर्माण की घोषणा की गयी। भारतीय जनसंघ से उसकी भिन्नता दिखाने के लिए भारतीय जनता पार्टी जैसा नया नाम अपनाया गया। जनसंघ के भगवे झंडे की जगह भगवे के साथ हरा रंग जोड़कर नया झंडा बनाया गया। यहां तक कि दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद की जगह गांधीवादी समाजवाद को नई पार्टी की अधिकृत विचारधारा घोषित किया गया। और नई पार्टी के सेकुलर चरित्र को प्रदर्शित करने के लिए कांग्रेस से आए सिकंदर बख्त को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया।”

स्पष्ट है कि भाजपा का जन्म ही उस अंतर्द्वन्द्व से उबरने के लिए हुआ था। लेकिन पार्टी का यह प्रयोग सफल नहीं रहा। उसके बाद हुए आम चुनावों में उसकी करारी हार हुई। हालांकि हार के कारण दूसरे थे, परंतु इससे यह सिद्ध हो गया कि इन परिवर्तनों से उसे फायदे की बजाय नुकसान ही होने वाला है। परिणामस्वरूप पार्टी ने पुन: संघ का दामन थाम लिया। हिन्दुत्व का राग अलापा जाने लगा। परंतु अब हिन्दुत्व भाजपा के लिए सिद्धांत नहीं, बल्कि एक रणनीति थी, जिसके बल पर उसे चुनाव जीतना था। इसलिए जब तक राम मंदिर और धारा 370 वोट दिलाते रहे, वे पार्टी के एजेंडा में रहे और जब उससे वोट मिलने की आस नहीं रही, बल्कि उसके छोड़ने से सत्ता मिलती दिखी तो वे मुद्दे एजेंडा से गायब हो गए। वर्ष 1992 से वर्ष 2004 तक देश की जनता और संघ के स्वयंसेवकों ने यह सारा तमाशा देखा। वर्ष 2004 में भाजपा की करारी हार के बाद यह सिद्ध हो गया कि भेड़िया आया भेड़िया आया का खेल बार बार नहीं खेला जा सकता।

वर्ष 2004 और 2009 में भाजपा की हार को देवेंद्र स्वरूप सत्ता राजनीति की विडंबना के रूप में प्रस्तुत करते हैं। परंतु सवाल यह है कि संघ की क्या मजबूरी है? वह विचारधारा से समझौता करने के लिए क्यों विवश हो रहा है? क्या उसे भी भाजपा के सत्तासीन होने से मिलने वाले सुखों की चाट लग गई है? यदि नहीं तो सत्तामोह में फंसे और विचारधारा से भ्रष्ट भाजपा नेतृत्व के प्रति उनकी आसक्ति क्यों है? वरिष्ठता के नाम पर विचारभ्रष्ट लोगों को वह क्यों सहन कर रहा है? एक आम और साधारण स्वयंसेवक के मन में आज एक ही सवाल है। क्या संघ राजनीति करता है? यदि नहीं तो भाजपा से संघ का क्या संबंध है? यदि संबंध हैं जोकि हैं ही, तो उसे नकारने का क्या कारण है? समस्या यह भी है कि संघ का भाजपा में हस्तक्षेप सांगठनिक और वैयक्तिक ही बना रहा है। वैचारिक स्तर पर उसने आज तक कभी भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया। इसके विपरीत विचारधारा से भटकाव को चुनावी राजनीति की विवशता के रूप में व्याख्यायित करने की कोशिश करता रहा है। वास्तव में यह दोहरा व्यवहार ही चुनावों में उसकी बेरूखी का मुख्य कारण बना और जिसके कारण भाजपा की अप्रत्याशित हार हुई।

बहरहाल, संघ नेतृत्व के सामने प्रश्न यही है कि वह भाजपा के साथ अपने संबंधों को स्वीकारने की हिम्मत दिखाए। भाजपा में सांगठनिक व वैयक्तिक हस्तक्षेप और परिवर्तनों की बजाय वैचारिक परिवर्तन करने का साहस प्रदर्शित करे। जब तक वह यह हिम्मत नहीं दिखाता, संघ नेतृत्व के साथ-साथ आम स्वयंसेवकों को भी दुविधाओं का सामना करना पड़ता रहेगा और इस दुविधा का खामियाजा पूरे देश को भोगना पड़ेगा। पिछले दो आम चुनावों में संघ के स्वयंसेवकों की निष्क्रियता ने यह सिद्ध कर दिया है कि उच्चादर्शों पर चलने वाले स्वयंसेवकों को विचारभ्रष्ट भाजपा नेतृत्व स्वीकार नहीं होगा।

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