गांधीजी को नेहरू का उत्तर
Posted by bhartiyapaksha on जुलाई 6, 2009
महात्मा गांधी के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले पंडित नेहरू के विचार महात्मा गांधी के ठीक उल्टे थे। महात्मा गांधी भारत के विकास का आधार गांवों को बनाना चाहते थे परंतु पंडित नेहरू को गांवों से नफरत थी। गांधीजी धर्म को शिक्षा और राजनीति दोनों का एक आवश्यक अंग मानते थे, परंतु पंडित नेहरू को धर्म शब्द से ही चिढ़ थी। महात्मा गांधी अंग्रेजी सभयता को भारत ही नहीं वरन् पूरी दूनिया के लिए खतरा मानते थे, परंतु पंडित नेहरू अंग्रेजी सभ्यता के सबसे बड़े और अंधप्रशंसक थे। गांधी और नेहरू का यह वैचारिक मतभेद किसी कल्पना पर आधारित नहीं है। उनका यह मतभेद उनके परस्पर के पत्र व्यवहार से साफ पता चलता है। इतना ही नहीं जिस गांधी का नाम लेकर कांग्रेस इस देश में अपनी तानाशाही चलाती आई है, वही कांग्रेस गांधी की वैचारिक हत्या की भी दोषी है। गोडसे ने तो गांधी के शरीर को खत्म किया, परंतु कांग्रेस ने तो गांधी के विचारों को ही समाप्त कर दिया। इसका एक बड़ा प्रमाण पंडित नेहरू द्वारा 1945 में गांधीजी को लिखा गया एक पत्र है। यह पत्र नेहरू ने गांधीजी के उस पत्र के उत्तर में लिखा था जिसमें गांधीजी ने उन्हें देश के विकास का प्रारूप तैयार करने से पहले हिन्द स्वराज पढ़ने की राय दी थी। गांधीजी का वह पत्र दिया जा चुका है। पंडित नेहरू का उत्तर यहां प्रस्तुत है।
आनंद भवन, इलाहाबाद
9 अक्तूबर, 1945
प्रिय बापू ,
- संक्षेप में कहूं तो मेरा मानना है कि हमारे सामने सवाल सच बनाम झूठ और अहिंसा बनाम हिंसा का नहीं है। सभी का प्रयास होना चाहिए कि आपसी सहयोग एवं शांतिपूर्ण रास्ता हमारा ध्येय हो, और एक ऐसे समाज का निर्माण करना हमारा उद्देश्य जो इस रास्ते पर ले जाने को प्रेरित करता हो। सवाल यह है कि ऐसे समाज का निर्माण कैसे हो और इसके अवयव क्या हों? मुझे समझ नहीं आता कि किसी गांव में सच्चाई और अहिंसा पर इतना बल क्यों दिया जाता है? आमतौर पर माना जाता है कि गांवों में रहने वाले लोग बुध्दिमत्ता और सांस्कृतिक तौर पर पिछड़े हुए होते हैं और एक पिछड़े हुए वातावरण में कोई प्रगति नहीं हो सकती। बल्कि संकुचित विचारों वाले लोगों के झूठे व हिंसक होने की संभावना ज्यादा रहती है।
- इसके अलावा, हमें अपने कुछ लक्ष्य भी तय करने हैं, मसलन, खाद्य सुरक्षा, कपड़े, आवास, शिक्षा, स्वच्छता, वगैरह। ये वे न्यूनतम लक्ष्य हैं जो किसी भी देश या व्यक्ति के लिए अनिवार्य हैं। इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए हमें यह देखना है कि हम कितनी तेजी से उन्हें हासिल कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, यातायात के आधुनिक साधनों व दूसरी आधुनिक गतिविधियों का विकास और उनकी निरंतर प्रगति भी मुझे अपरिहार्य लगते हैं। इसके अलावा, मुझे कोई और रास्ता नहीं दिखता। भारी उद्योग भी आज की आवश्यकता है और क्या यह सब विशुद्ध ग्रामीण परिवेष में संभव है? व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि भारी और हल्के उद्योगों का यथासंभव विकेन्द्रीकरण होना चाहिए और बिजली का नेटवर्क बन जाने के बाद यह संभव भी है। देश में अगर दो तरह की अर्थव्यवस्था काम करेंगी तो या तो दोनों के बीच द्वंद्व होगा या एक, दूसरे पर हावी हो जाएगी।
- लाखों-करोड़ों लोगों के लिए महल बनाने का सवाल नहीं है। लेकिन इसका भी कोई कारण नहीं है कि उन सभी को ऐसे सुविधाजनक व आधुनिक घर मिल सकें जहां वे एक अच्छा संस्कारी जीवन जी सकें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कई भारी-भरकम शहरों में बहुत सी बुराइयां घर कर गई हैं। इनकी निंदा की जानी चाहिए। शायद हमें एक सीमा से अधिक शहरों के विकास पर रोक लगानी होगी, लेकिन साथ ही गांव वालों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना होगा कि वे शहरों की संस्कृति में खुद को ढाल सकें।
- उस बात को कई साल हो गए हैं जब मैंने ”हिन्द स्वराज” पढ़ी थी। आज मेरे दिमाग में उसकी कुछ धुंधली सी यादें हैं। लेकिन जब मैंने उसे 20 या अधिक साल पहले पढ़ा था तब भी वह मुझे अव्यवहारिक लगी थी। उसके बाद के आपके लेखों व भाषणों से मुझे लगा है कि आप भी उस समय से काफी आगे निकल चुके हैं और आधुनिक परिवेष को समझने लगे हैं। इसलिए मुझे तब आश्चर्य हुआ जब आपने कहा कि वह पुरानी तस्वीर आज भी आपके दिमाग में बसी हुई है। आपको मालूम ही है कि कांग्रेस ने उस तस्वीर पर कभी विचार ही नहीं किया। उसे स्वीकार करने की बात तो छोड़ ही दीजिए। आपने स्वयं भी कभी इसके लिए जोर नहीं दिया। एकाध मामूली से अपवाद को छोड़ कर। यह निर्णय आपको करना है कि इस तरह के आधारभूत लेकिन दार्शनिक सवालों पर कांग्रेस को विचार भी करना चाहिए। मुझे लगता है कि कांग्रेस जैसे संगठन को इस तरह की किसी बहस में नहीं उलझना चाहिए, जिससे लोगों के दिमाग में उलझन पैदा हो और वे वर्तमान में काम करने में असमर्थ हो जाएं। इससे कांग्रेस और देश के दूसरे लोगों के बीच एक दीवार भी खड़ी हो सकती है। …
आपका ही,
जवाहरलाल

अफ़लातून said
जरूरी पत्राचार का हवाला दिया है । सन्दर्भ ग्रन्थों का उल्लेख भी करते बेहतर होता । गांधी और नेहरू के वांग्मय के अलावा प्यारेलाल रचित पूर्णाहुति में इस पत्रचार का ब्यौरा है। संजाल पर यहां देखा जा सकता है ।
bhartiyapaksha said
धन्यवाद। गांधीजी के पत्र का संदर्भ अंग्रेजी वाले पोस्ट में दिया है।