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		<title>गैरजरूरी है भूमिअधिग्रहण कानून</title>
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		<pubDate>Tue, 08 Nov 2011 11:39:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>bhartiyapaksha</dc:creator>
				<category><![CDATA[सभ्यतामूलक विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[सम सामयिक]]></category>

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		<description><![CDATA[भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की यात्राओं और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की राजनीतिक रथयात्रा से पहले ही एक यात्रा शुरू हो चुकी थी। यह यात्रा भारतीय एकता परिषद् के श्री पी वी राजगोपाल ने शुरू की थी, वर्तमान व प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून के विरोध में। भट्ठा पारसौल और बाद में [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=147&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की यात्राओं और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की राजनीतिक रथयात्रा से पहले ही एक यात्रा शुरू हो चुकी थी। यह यात्रा भारतीय एकता परिषद् के श्री पी वी राजगोपाल ने शुरू की थी, वर्तमान व प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून के विरोध में। भट्ठा पारसौल और बाद में नौएडा में चल रहे किसानों के विरोध प्रदर्शन के बाद से ही यह कानून बहस के दायरे में आ गया था। हालाँकि अनेक विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून का एक संशोधित प्रारूप तैयार किया है और शीघ्र ही उसे संसद में प्रस्तुत भी किया जाने वाला है, परंतु अभी से ही उन संशोधनों की भी आलोचना शुरू हो गई है। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2011 नामक इस संशोधित प्रारूप को यदि हम केवल सरसरी निगाहों से भी पढें तो एक बात साफ हो जाती है। कम से कम यह कानून भारत और उसके किसानों व कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के हित के लिए बिल्कुल ही नहीं बनाया गया है।</p>
<p>इस कानून में कई विसंगतियां थीं, जिनका निराकरण प्रस्तावित प्रारूप में किया गया है। इसके बाद भी इस पर पर्याप्त सवाल खडे किये जा सकते हैं और किए जा भी रहे हैं। हालाँकि संशोधित प्रारूप में ऐसे अनेक सवालों का समाधान प्रस्तुत किया गया है। जैसे सिंचाई वाली भूमि के बारे में प्रस्ताव है कि एक जिले में अधिकतम 5 प्रतिशत सिंचाई वाली भूमि का ही अधिग्रहण किया जा सकता है। साथ ही उतनी ही बंजर भूमि को खेती योग्य बनाने का भी प्रस्ताव है। इसी प्रकार संशोधित प्रारूप में विशेष परिस्थितियों में लाभ का कुछ भाग भूमि के मालिक को देने का भी प्रस्ताव रखा गया है। कुल मिला कर देखा जाए तो एक अत्यंत आकर्षक और लुभावना प्रस्ताव तैयार किया गया है। बहरहाल, यदि ध्यान से देखें तो इस पूर्ण कानून की मंशा पर ही प्रश्न चिह्न खडा हो जाता है। पहला और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर इस कानून की आवश्यकता क्यों है और किसको है?</p>
<p>मौलिक रूप से भूमि अधिग्रहण कानून 1894 का है यानी कि इसका निर्माण अंग्रेजों ने 1894 में किया था। ध्यान देने की बात यह है कि 1894 से कुछ ही वर्ष पूर्व 1876 में भारत में कंपनी राज समाप्त हुआ था और ब्रिटिश राज शुरू हुआ था। इस कानून के मूल प्रारूप में भूमि अधिग्रहण करने के उद्देश्यों में साफ साफ लिखा हुआ है कि जनहित और कंपनियों के लिए भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा। अब यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि 1894 में भारत में कितनी कंपनियां थीं। यह तो इतिहास का एक सामान्य विद्यार्थी भी जानता है कि उस समय भारत में केवल एक ही कंपनी थी, ईस्ट इंडिया कंपनी। इस कानून का निर्माण केवल उसे फायदा पहुँचाने के लिए किया गया था। दिखावे के लिए जनहित शब्द भी जोड दिया गया था। स्वाधीनता मिलने के बाद इस कानून की कोई आवश्यकता नहीं थी और न ही इसका कोई उपयोग था। परंतु स्वाधीन भारत के नए शासक या तो अत्यंत मूर्ख थे या फिर एकदम धूर्त। उन्होंने इस कानून को यथारूप बनाए रखा ताकि भविष्य में इसका फायदा उठाया जा सके।</p>
<p>यह एक तथ्य है कि भूमि अधिग्रहण का यह एक शानदार कानून होने के बावजूद स्वाधीनता से पहले और बाद में भी अन्यान्य विभिन्न कारणों से भूमि अधिग्रहण करने के कई कानून और बनाए गए। कई कानून पहले से भी थे। जैसे, भूमि अधिग्रहण (खनन) अधिनियम, 1885, भारतीय ट्रामवे अधिनियम, 1886। बाद में 1903 में ‘द वर्क्स ऑफ डिफेंस एक्ट’ बनाया गया। स्वाधीनता के बाद तो भूमि अधिग्रहण के कानूनों की बाढ आ गई। विभिन्न कारणों से भूमि अधिग्रहण करने के कुल 13 कानून बनाए गए। जैसे, रेल सेवा के लिए, मेट्रो रेल के लिए, राजमार्गों के लिए, विद्युतिकरण के लिए, विस्थापितों के पुनर्वास के लिए, आदि आदि। सवाल यह है कि क्या ये 13 कारण जनहित में नहीं थे? यदि नहीं थे तो सरकार को इन कारणों से भूमि अधिग्रहण करने का क्या अधिकार है? और यदि थे तो इन कानूनों की अलग से क्या आवश्यकता थी? ये सवाल ही भूमि अधिग्रहण कानून की मंशा को संदेह के घेरे में ला देते हैं।</p>
<p>भारतीय परंपरा में प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य का स्वामित्व कभी भी नहीं माना गया। प्राकृतिक संसाधन सामुदायिक संपत्ति माने जाते थे। राज्य की भूमिका केवल नियामक की हुआ करती थी और यही जनता के हित में भी था। प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के स्वामित्व की अवधारणा पाश्चात्य अवधारणा है और इस अवधारणा ने वहाँ भी पर्याप्त अनाचार और हिंसा फैलाया है। अमरीकी विद्वान कार्ल पोलान्यी अपनी पुस्तक “द ग्रेट ट्रांसफार्मेशन: द पोल्ट्कल एंड इकोनॉमिक ओरिजिन्स ऑफ ऑवर टाइम” के पंद्रहवें अध्याय ‘मार्केट एंड नेचर’ में लिखते हैं: “इंग्लैण्ड में टयूडर्स के साथ कृषिपरक पूंजीवाद विकसित हुआ। भूमि को किसानों के कुलों और गावों के साझे स्वामित्व से मुक्त कर उसे व्यक्तियों की निजी वस्तु बना डाला गया। एनक्लोजर्स तथा कन्वर्जन्स की प्रक्रिया द्वारा यह काम हुआ ।</p>
<p>एनक्लोजर का अर्थ था सैकडों या दर्जनों किसानों की भूमि को किसी सम्पन्न व्यक्ति द्वारा बाडे में घेर लेना तथा सभी किसानों को उजाड कर भगा देना। कन्वर्जन का अर्थ था – क्षेत्र के सभी किसानों को बलपूर्वक किसी कारखानेदार के नियंत्रण में ले लेना और उनकी भूमि उस कारखानेदार की घोषित कर उस पर कब्जा कर लेना। मिल के लिये और मिल-मजदूरों की बस्तियों के लिए उस जमीन को किसानों से छीन लेना। 18वीं शताब्दी के आरम्भ में इंग्लैण्ड और फ्रांस दोनों में ये दोनो काम बडे पैमाने पर हुआ। उन्नीसवीं शदी में औद्योगिक कस्बों की वृद्धि हुयी तो इलाके के इलाके घेर लिये गये ताकि खाद्यान्न और कच्चा माल की पूर्ति हो सके। पहले किसानों को जमीन देते समय यह ब्यवस्था होती थी कि वे उस भूमि को रेहन नहीं रख सकते या उसका व्यापारिक उपयोग नहीं कर सकते। अब यह व्यवस्था खत्म। यह प्रक्रिया बहुत वर्षो चली। इस प्रक्रिया को कहीं निजी बल एवं हिंसा से सम्पन्न किया गया, कहीं ऊपर या नीचे से हुई क्रांति द्वारा, कहीं युद्ध एवं विजय से, कहीं कानून बनाकर, कहीं प्रशासन का दबाव डालकर, कहीं तत्काल जो सूझ जाये, वह उपाय अपनाकर।“ इसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों का विस्थापन, बेरोजगारों का संख्या में अपरिमित वृद्धि और भारी अनाचार पैदा हुआ। लाखों लोग असमय और अकारण विकास की भेंट चढ गए या चढा दिए गए।</p>
<p>पिछले दिनों जो कुछ भी देश के विभिन्न भागों में हो रहा है, वह उपरोक्त कथन को ही फिर से प्रमाणित कर रहा है। यह साफ है कि स्थानीय समाज की आवश्यकता का ध्यान रखे बगैर और बिना उसकी सहमति के भूमि अधिग्रहण का कोई भी कानून देश में बेरोजगारी, अराजकता और हिंसा ही बढाएगा। सुरक्षा व राष्ट्रीय महत्व के कुछेक विषयों के अलावा राज्य द्वारा भूमि का अधिग्रहण समस्या के अतिरिक्त और कुछ नहीं बढाने वाला है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि भूमि अधिग्रहण के सभी कानूनों पर समग्रता से विचार करके कोई एक कानून बनाया जाए जिसमें कंपनियों की बजाय जनता का हित सर्वोपरि हो।</p>
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		<title>बढते बलात्कार और हमारा दायित्व</title>
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		<pubDate>Sun, 02 Jan 2011 13:00:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>bhartiyapaksha</dc:creator>
				<category><![CDATA[सभ्यतामूलक विमर्श]]></category>
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		<description><![CDATA[देश की राजधानी दिल्ली में एक के बाद एक सामूहिक बलात्कार की घटनाएं होती ही जा रही हैं। पुलिस की जितनी सक्रियता दिल्ली में है और महिलाओं में जितनी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक जागरूकता दिल्ली में है, उतनी शायद ही कहीं और हो सकती है। इसके बावजूद भी महिलाओं के प्रति अपराधों और विशेषकर बलात्कार [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=138&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>देश की राजधानी दिल्ली में एक के बाद एक सामूहिक बलात्कार की घटनाएं होती ही जा रही हैं। पुलिस की जितनी सक्रियता दिल्ली में है और महिलाओं में जितनी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक जागरूकता दिल्ली में है, उतनी शायद ही कहीं और हो सकती है। इसके बावजूद भी महिलाओं के प्रति अपराधों और विशेषकर बलात्कार की घटनाओं में राजधानी का अव्वल आना, शासन ही नहीं, अपितु समाज के लिए भी चिंतनीय होना चाहिए। परंतु देखने में आता है कि ऐसी कोई घटना होने पर प्रशासन पर दोष मढ़कर और कठोर कानून बनाए जाने की बात कह कर सभी अपने निश्चिंत हो जाते हैं। कोई भी यह सोचने की कोशिश नहीं करता कि इतने चाक-चौबंद प्रशासन और पुलिस तंत्र व इतनी जागरूकता के बावजूद दिल्ली में महिलाओं के प्रति अपराध क्यों बढ़ रहे हैं? कोई भी इस समस्या के मूल में जाने की कोशिश नहीं करता, सभी केवल और केवल प्रशासन पर दोष मढ़ कर अपना काम चला लेना चाहते हैं। हालांकि कई बार प्रशासन अपनी लाचारी जतला चुका है कि उसके पास करने के लिए और भी ढ़ेर सारे काम होते हैं और महिलाओं को अपनी सुरक्षा स्वयं ही करनी चाहिए, परंतु इसके बावजूद आम आदमी से लेकर स्वयंसेवी महिला संगठन, राजनीतिक नेता और मीडिया व अन्य चिंतक-लेखक आदि सभी प्रशासन और सरकार पर ही दोषारोपण करते नजर आते हैं। आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रशासन की जिम्मेदारी को पूरी तरह स्वीकार करने के बाद भी यह हमें स्वीकार करना होगा कि महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों विशेषकर बलात्कार की घटनाओं के लिए केवल और केवल प्रशासन व सरकार को दोषी ठहराना और केवल उनसे ही समाधान की आशा करना नितांत गलत और असंगत है। वास्तव में इसके समाधान के लिए समस्या के मूल में जाना जरूरी है। सबसे पहले तो <strong>बलात्कार की घटनाओं को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना ही अपने आप में पूरी तरह गलत है। यदि यह कानून व्यवस्था की समस्या होती तो राजधानी दिल्ली से अधिक सतर्क कानून व्यवस्था तो कहीं और हो ही नहीं सकती। ऐसे में यहां तो ऐसी घटनाएं होनी ही नहीं चाहिए थीं। परंतु आंकड़ों की मानें तो दिल्ली का इन अपराधों में अव्वल स्थान है। ऐसा क्यों है? </strong>जब तक हम इसे नहीं समझेंगे तब तक इन घटनाओं पर लगाम भी नहीं लगा पाएंगे।</p>
<p>महिलाओं के प्रति अपराध को सामान्य अपराधों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। ये अपराध केवल कानून व्यवस्था की समस्या नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक अपराधों की श्रेणी में आते हैं। ये केवल आपराधिक मनोवृत्ति का परिणाम नहीं हैं, बल्कि इन अपराधों के पीछे सामाजिक व मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हैं। इस लिए ऐसे अपराधियों को दंडित करने मात्र से इन समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। <strong>महिलाओं के प्रति अपराध विशेषकर बलात्कार की घटनाओं का मूल कारण है महिलाओं के प्रति समाज की विकृत धारणाएं और महिलाओं को दैहिक स्तर पर देखने की मानसिकता। इसी प्रकार महिलाओं के प्रति हिंसा, चाहे वह बाहरी हो या फिर घरेलू, के पीछे महिलाओं के प्रति हीन भाव का होना प्रमुख कारण है।</strong> महिलाओं को कमतर मानना, उन्हें मानसिक, बौध्दिक और आर्थिक स्तर पर कमजोर मानना ही उनके प्रति हिंसा को बढ़ाता है। <strong>आज की शिक्षा में सामाजिक दायित्व बोध बढाने और महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव जगाने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए आज के शिक्षित समाज में भी महिलाओं के प्रति हिंसा और अपराध की घटनाएं भारी संख्या में होती हैं, बल्कि देखा जाए तो शिक्षित समाज में ही अधिक होती हैं। समस्या यह है कि जाने अनजाने आज की शिक्षा पध्दति और जागरूकता अभियान में महिलाओं के प्रति इन दोनों मानसिकता को ही बढ़ावा दिया जाता है। </strong>चाहे वह सौंदर्य प्रतियोगिताएं हों या फिर किसी कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत, महिलाओं की भूमिका दैहिक प्रस्तुति तक ही सीमित है। अन्यथा <strong>क्या कारण है कि एयर होस्टेस के लिए सुंदर युवतियां ही चाहिए होती हैं? क्या कारण है कि कार्यक्रमों में अतिथियों के स्वागत युवतियों से ही करवाया जाता है? क्या कारण है कि पुरूषों के सामानों के विज्ञापन आदि के लिए सुंदर युवतियां ही चाहिए होती हैं? क्या इन सबके पीछे महिलाओं को दैहिक रूप में देखने की मानसिकता निहित नहीं है? क्या सौंदर्य प्रतियोगिताओं और आज की फिल्मों में महिलाओं को केवल और केवल दैहिक रूप में नहीं देखा जाता? क्या शीला की जवानी, मुन्नी बदनाम हुई और इस जैसे तमाम आइटम गाने महिलाओं के प्रति केवल और केवल दैहिक आकर्षण पैदा नहीं करते हैं? </strong>क्या स्कूल कालेज सहित कोई भी ऐसा तंत्र है जो हमारे नौनिहालों और युवाओं को महिलाओं के प्रति जिम्मेदारी और सम्मान का भाव रखना सिखाता हो? इन सबके जवाब नकारात्मक ही हैं।</p>
<p>आज के सबसे बदनाम ग्रंथ मनुस्मृति पर आरोप है कि उसमें महिलाओं को हीन बताया गया है और उन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया है। यहां मैं मनुस्मृति से ही कुछ उध्दरण देना चाहूंगा ताकि हमें पता चल सके कि अत्यंत संकीर्ण माने जाने वाले ग्रंथ भी महिलाओं के प्रति कितने उदात्त भाव सिखाते थे।</p>
<p><strong>सम्मान का आधार: </strong><strong></strong></p>
<p><em>वित्तं बन्धुर्वय: कर्म विद्या भवति पंचमी। </em><em></em></p>
<p><em>एतानि मान्यास्थानानि गरीयो यद्यदुत्तारम्॥ </em>मनु 2.136</p>
<p>धन, बंधु यानी मित्रों व सहयागियों की संख्या, उत्ताम कर्म और श्रेष्ठ विद्या ये पांच मान्य स्थान हैं और इनमें भी धन से बंधु, बंधु से कर्म और कर्म से विद्या अधिक माननीय हैं।</p>
<p>इस श्लोक से पता चलता है कि मनु किसी को सम्मान देने में लिंग, जाति, भाषा और प्रांत आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करते हैं, बल्कि इसमें पूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करते हैं। अत: वे कभी भी किसी को स्त्री होने के कारण हीन नहीं ठहराते।</p>
<p><strong>स्त्री के प्रति भाव:</strong><strong></strong></p>
<p><em>यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। </em>मनु 3.56</p>
<p>जहां स्त्रियों का सत्कार और सम्मान होता है, वहां श्रेष्ठ लोगों व देवताओं का वास होता है।</p>
<p><em>शोचन्ति जामयो यत्र विनष्यत्याषु तत्कुलम्र। </em><em></em></p>
<p><em>न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तध्दि सर्वदा॥ </em>मनु 3.57</p>
<p>जिस समाज में स्त्रियां शोक व चिंताग्रस्त होती हैं, वह समाज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहां स्त्रियां निष्चिंत और सुखी रहती हैं, वह समाज सदैव विकास करता रहता है।</p>
<p>क्या यही कारण नहीं है कि आज हमारे समाज का पतन ही हो रहा है, उत्थान नहीं। धन संपदा के बढ़ने पर भी परिवार भाव, सामाजिक दायित्वबोध और मानवीय मूल्यों में लगातार गिरावट ही आ रही है।</p>
<p><strong>स्त्री की सुरक्षा:</strong><strong></strong></p>
<p>सामान्यत: माना जाता है कि मनुस्मृति स्त्रियों की स्वतंत्रता का विरोधी है और इसको सही सिध्द करने के लिए उसमें ऐसे ढेर सारे श्लोक पाए भी जाते हैं। परंतु मनु स्मृति में प्रक्षिप्तों की बात तो कुल्लूक भट्ट प्रभृति मनु के पुराने भाष्यकार भी स्वीकार करते हैं और उन श्लोकों का प्रक्षिप्त होना प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार सहित अनेक विद्वानों ने भली भांति सिध्द किया है। वैसे भी ऊपर हम देख आए हैं कि लिंग के आधार पर मनु भेदभाव नहीं करते, अत: ऐसे भेदभाव परक श्लोक उनके रचित नहीं माने जा सकते। बहरहाल, मनु ने स्त्रियों की सुरक्षा पर जो लिखा है, वह यहां प्रस्तुत है।</p>
<p><em>न कष्चिद्योषित: शक्त: प्रसह्य परिरक्षितुम्॥ </em>मनु 9.10</p>
<p>अर्थ: कोई भी जबरदस्ती या दबाव से स्त्रियों की रक्षा संभव नहीं है।</p>
<p><em>अरक्षिता गृहे रूध्दा: पुरूषैराप्तकारिभि:।</em><em></em></p>
<p><em>आत्मानमात्मना यास्तु रक्ष्ेयुस्ता: सुरक्षिता:॥ </em>मनु 9.12</p>
<p>अर्थ: विश्वसनीय पुरूषों, पिता, पति, भाई चाचा, मामा, आदि की निगरानी में घर में रोक कर रखी हुई स्त्री भी सुरक्षित नहीं होती। जो अपनी रक्षा स्वयं करती हैं, वही सुरक्षित रहती हैं।</p>
<p>इन दो श्लोकों में मनु ने जो बात कही है, आज वही बात हमारी पुलिस और सरकारें भी कह रही हैं। घर में या फिर अपने संबंधी पुरूषों के संरक्षण में रहने मात्र से स्त्री की सुरक्षितता को अनिष्चित कह कर मनु ने घरेलू हिंसा की समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया है। अत: स्त्रियों के प्रति सम्मान और स्नेह के भाव को बढ़ाकर ही उनकी रक्षा की जा सकती है। इसके लिए मनु स्मृति में पर्याप्त संख्या में श्लोक पाए जाते हैं। ऊपर उदाहरण के लिए दो श्लोक दिए गए हैं। ऐसे श्लोक मनु स्मृति में भरे हुए हैं। स्त्रियों के प्रति हीन भाव वाले श्लोकों की भी कमी नहीं है, परंतु शैली, विषय और प्रसंग आदि के आधार पर यह सिध्द होता है कि वे प्रक्षिप्त श्लोक हैं।</p>
<p>कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि महिलाओं की सुरक्षा कानून बना कर तो बिल्कुल ही नहीं की जा सकती। कानून तो हों परंतु साथ ही महिलाओं के प्रति समाज में सम्मान का भाव होना आवश्यक है। इसके लिए महिलाओं के केवल दैहिक बोध को प्रदर्शित करने वाले सभी प्रकार की अभिव्यक्तियों और साधनों को नियंत्रित करना होगा। <strong>चाहे वह &#8216;मुन्नी बदनाम हुई&#8217; व &#8216;शीला की जवानी&#8217; जैसे फूहड़ व अश्लील गाने व फिल्में हों, या फिर वैलेंटाइन डे मनाने के नाम पर सार्वजनिक स्थलों पर युवाओं का भोंडा प्रदर्शन हो, या सौंदर्य प्रतियोगिताओं व फैशन शो के नाम पर अंग प्रदर्शन हो, इस तरह के सभी प्रकार के कार्यक्रमों, प्रदर्शनों और गतिविधियों का सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। इनके विरूध्द कानून भी हों परंतु कानून से अधिक आवश्यक है इनका सामाजिक बहिष्कार करना।</strong></p>
<p>इसमें मीडिया और साहित्य की भूमिका और भी महत्वपूर्ण है। <strong>आज की मीडिया व साहित्य में इस तरह के सामाजिक बहिष्कार को मोरल पोलिसिंग कह कर उसकी भर्त्स्ना की जाती है। देखा जाए तो महिलाओं के प्रति दैहिक बोध को बढ़ाने में आज का मीडिया व साहित्य सबसे बड़ा दोषी है।</strong> आज के साहित्यकार यथा स्थिति के वर्णन के नाम पर अश्लीलता और भोंडेपन को ही बढ़ावा देते हैं। इसलिए आज <strong>यदि हम सच में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों विशेषकर बलात्कार को रोकना चाहते हैं तो साहित्य व मीडिया और शिक्षा पध्दति तीनों का परिष्कार व मार्जन करना होगा। इसके बिना केवल कानून बनाने और नारी सशक्तिकरण के नारे लगाने से कुछ नहीं होगा।</strong></p>
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		<title>आइए मनाएं, राजनीतिक शुचिता माह</title>
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		<pubDate>Sun, 03 Oct 2010 12:30:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>bhartiyapaksha</dc:creator>
				<category><![CDATA[सम सामयिक]]></category>
		<category><![CDATA[Mahatma Gandhi]]></category>
		<category><![CDATA[Politics]]></category>

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		<description><![CDATA[अक्टूबर का महीना भारत के लिए राजनीतिक शुचिता माह के रूप में मनाया जा सकता है। इस महीने में तीन ऐसे राजनीतिक नेताओं का जन्म हुआ, जिन्होंने न केवल देश की राजनीति को नई दिशा दी, बल्कि नए आदर्श व मानदंड भी स्थापित किए। इनमें से दो यानी मोहनदास करमचंद गांधी और लाल बहादुर शास्त्री [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=130&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अक्टूबर का महीना भारत के लिए राजनीतिक शुचिता माह के रूप में मनाया जा सकता है। इस महीने में तीन ऐसे राजनीतिक नेताओं का जन्म हुआ, जिन्होंने न केवल देश की राजनीति को नई दिशा दी, बल्कि नए आदर्श व मानदंड भी स्थापित किए। इनमें से दो यानी मोहनदास करमचंद गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का जन्म दो अक्टूबर को हुआ था और ग्यारह अक्टूबर को नानाजी देशमुख का। </strong>मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी को राजनीतिक नेता कहना थोड़ा अटपटा-सा प्रतीत होता है। वे इन सभी सीमाओं से ऊपर उठ चुके थे, परन्तु 1931 में कांग्रेस की सदस्यता और उसके रूप में सक्रिय राजनीति को छोड़ने के बाद भी वे राजनीतिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली बने रहे। इतना ही नहीं, उनका राजनीतिक हस्तक्षेप भी उसी रूप में बना रहा। वास्तव में, महात्मा गांधी सामाजिक कार्यों का भी अपना राजनीतिक महत्व था। इसलिए प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति में न रहते हुए भी महात्मा गांधी ने देश को न केवल एक राजनीतिक नेतृत्व दिया, बल्कि उसमें आदर्श व मापदंड भी स्थापित किए।</p>
<p>पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का नाम तो जगविदित है। जय जवान, जय किसान के उनके नारे ने उनकी मजबूत राजनीतिक क्षमता का अहसास कराया था और रेलमंत्री रहते हुए, एक साधरण-सी दुर्घटना पर दिए गए उनके तस्तीफे से उनकी मजबूत राजनीतिक नैतिकता व शुचिता का परिचय मिलता था। राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने न तो कभी धन कमाने का प्रयास किया और न ही नाम। वे सभी लौकिक एषणाओं से मुक्त रहकर निरपेक्ष भाव से देशसेवा में लगे रहे। राजनीतिक क्षेत्र में रहते हुए भी सादगी और सरलता की वे एक मिसाल थे। महात्मा गांधी की तरह उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र का परित्याग तो नहीं किया परंतु प्रत्यक्ष राजनीति में रहते हुए आर्थिक शुचिता का समाज में एक आदर्श स्थापित किया। असमय उनकी मृत्यु (जिस पर उनकी हत्या होने का भी संदेह है) नहीं हुई होती, तो शायद देश की राजनीति की दिशा ही आज कुछ और होती।</p>
<p>इसी कड़ी में जो तीसरा नाम है, वह है नानाजी देशमुख का। नानाजी देशमुख एक सच्चे अर्थों में समाजसेवी राजनेता थे। महात्मा गांधी की ही तरह उनका व्यक्तित्व भी बहुआयामी और प्रतिभा बहुमुखी थी और महात्मा गांधी की ही तरह उन्होंने राजनीतिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली रहने के बावजूद सक्रिय चुनावी राजनीति का परित्याग कर दिया था। राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने अनेक राजनीतिक आदर्श और प्रतिमान स्थापित किए। भारतीय जनसंघ की स्थापना में सहयोग करने के बाद अपने संगठन से कौशल से न केवल जनसंघ को मजबूत किया, बल्कि उसके प्रति अन्य राजनीतिक दलों का भेदभावपूर्ण व्यवहार को भी समाप्त करने में सफल रहे। नानाजी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के &#8216;संपूर्ण क्रांति&#8217; आन्दोलन का सफल संचालन किया और 1977 में देश की पहली गैरकांग्रेस सरकार बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मोरारजी देसाई सरकार के निर्माण का महत्वपूर्ण घटक होने के बावजूद वे मंत्री पद के लोभ में नहीं फंसे और उद्योग मंत्री रूपी प्रभावशाली मंत्री पद त्याग दिया। राजनीतिक आदर्श स्थापित करने के लिए उनका अगला कदम था राजनीति से सेवानिवृत्ति। उनका यह स्पष्ट मानना था कि जिस प्रकार व्यक्ति 60 वर्ष की आयु में नौकरी से निवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार उसे राजनीति से भी निवृत्त होकर समाजसेवा में लगना चाहिए। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने वर्ष 1987 में सक्रिय राजनीति छोड़ दी और चित्रकूट जाकर ग्राम विकास के काम में पूरी तरह जुट गए। चित्रकूट में उन्होंने जो कार्य खड़ा किया, वह इतना परिणामकारक और प्रभावोत्पादक है कि तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तक ने उसकी प्रशंसा की और देश के विकास के लिए उसे एक आदर्श प्रारूप घोषित किया।</p>
<p><strong>भारतीय राजनीति के वर्तमान गिरावट के दौर में जब सर्वत्र स्वार्थ और धनबल व बाहुबल का जोर हो, ये तीनों एक अलग सितारे के रूप में चमकते नजर आते हैं। दु:ख का विषय यह है कि इनके अपने राजनीतिक साथियों व अनुयायियों तक ने इनके बनाए राजनीतिक आदर्शों व प्रतिमानों की स्पष्ट व घोर उपेक्षा की। महात्मा गांधी जिन्हें अपना उत्ताराधीकारी और वारिस मानते थे। उन पंडित नेहरू ने 1947 में ही साफ-साफ कह दिया था कि वे गांधीजी की ग्राम स्वराज की अवधारणा से बिल्कुल भी सहमत नहीं हैं।</strong> महात्मा गांधी के राजनीति छोड़कर समाजसेवा में लगने के आदर्श को किसी कांग्रेसी नेता ने अपनाने की कोशिश नहीं की, इसके उलटे वे सत्ता की राजनीति में इतना डूबे, इतना डूबे कि राजनीतिक भ्रष्टाचार का आज वे पर्याय वन गए हैं। लाल बहादुर शास्त्री की राजनीतिक निरपेक्षता और निस्वार्स्थता का दूसरा उदाहरण भी उन्हें भ्रष्ट होने से नहीं बचा सका। लाल बहादुर शास्त्री का सादगीपूर्ण जीवन और सरलता उदाहरण ही वन कर रह गई। किसी भी कांग्रेसी नेता ने उनको अपने जीवन में उतारने की कोशिश नहीं की। दूसरी ओर, <strong>राजनीति में एक अलग चाल, चेहरा और चरित्र प्रस्तुत करने का दावा करने वाला भारतीय जनसंघ भी इस राजनीतिक गिरावट से नहीं बच सका। नानाजी देशमुख के निकटतम राजनीतिक सहयोगी रहे अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी में से किसी ने उनके आदर्शों पर चलने की आवश्यकता नहीं समझी। अटल बिहारी वाजपेयी शरीर से पूरी तरह लाचार होने तक शीर्ष पर बने रहे और 89 वर्ष की आयु में भी आडवाणी पीएम इन वेटिंग की दूसरी पारी खेलने के लिए तैयार बैठे हैं। </strong>इसका ही परिणाम है कि भारतीय जनसंघ के नए अवतार भारतीय जनता पार्टी में कोई दूसरी पीढ़ी तैयार नहीं हो पाई। इसी कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत को कहना पड़ा कि युवा नेतृत्व को पार्टी में आगे लाना चाहिए।</p>
<p>बहरहाल, <strong>कांग्रेस हो या भाजपा, किसी ने भी अपने इन नेताओं के आदर्शों को आगे बढ़ाने की कोई भी कोशिश नहीं की। दूर से प्रणाम ले लिया, श्रद्धा सुमन भी चढ़ाए, परन्तु उनके दिखाए गए रास्ते पर चलने की हिम्मत नहीं दिखा पाए।</strong> जब उनके दल के नेताओं ने ही इनकी उपेक्षा की तो अन्य दलों के नेताओं से तो कोई अपेक्षा करना ही व्यर्थ है। परन्तु भारतीय राजनीति में आज जो गिरावट आ रही है, उसका एकमात्र समाधान इनके दिखाए गए रास्ते में ही दिखता है। इसलिए आज जरूरत है कि हम इस महीने राजनीतिक शुचिता माह मनाकर इन्हें याद करें और इनके दिखाए रास्ते पर चलने का संकल्प करें। यदि पूरा महीना मनाना हमारे राजनीतिक नेताओं को कठिन प्रतीत होता हो तो राजनीतिक शुचिता सप्ताह भी मनाया जा सकता है। इस <strong>राजनीतिक शुचिता माह या सप्ताह में आदर्श राजनीतिक जीवन पर केवल कार्यशालाओं, संगोष्ठियां और सेमिनारों का ही आयोजन न किया जाए, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव लेने के भी कुछ कार्यक्रम बनाए जाएं। जैसे, चित्रकूट या वर्धा जाकर वहां चल रहे सेवा कार्यों में प्रत्यक्ष भाग लेना। एक पूरा सप्ताह या फिर कम से कम दो दिन किसी दलित बस्ती या फिर किसी सुदूर गांव में वहां के लोगों के बीच रहना। </strong>इस प्रकार के और भी राजनीतिक प्रशिक्षण के कार्यक्रमों की योजना बनाई जा सकती है। इस प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन यदि किया जाए तो यही इन महापुरूषों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।</p>
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		<title>क्या ओबामा अमेरीकी राजनीति को रसातल में पहूँचाकर ही दम लेंगे?</title>
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		<pubDate>Thu, 23 Sep 2010 08:49:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>bhartiyapaksha</dc:creator>
				<category><![CDATA[सम सामयिक]]></category>
		<category><![CDATA[America]]></category>
		<category><![CDATA[Muslim]]></category>
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		<description><![CDATA[बराक ओबामा के पिछले कुछ निर्णयों और बयानों को देखने के बाद एक आम राजनीतिक विश्लेषक के मन में एक ही सवाल उभर रहा है। क्या बराक ओबामा का भारतीयकरण हो गया है? एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि जैसे पंडित नेहरू के उदय के बाद भारतीय राजनीति के बुरे दौर की शुरूआत हुई [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=127&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>बराक ओबामा के पिछले कुछ निर्णयों और बयानों को देखने के बाद एक आम राजनीतिक विश्लेषक के मन में एक ही सवाल उभर रहा है। क्या बराक ओबामा का भारतीयकरण हो गया है? <strong>एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि जैसे पंडित नेहरू के उदय के बाद भारतीय राजनीति के बुरे दौर की शुरूआत हुई थी, क्या उसी तरह ओबामा के उदय के बाद अमेरीकन राजनीति के भी बुरे दौर की शुरूआत हो चुकी है? उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी के नाम पर राजनीति करने वाले पंडित नेहरू ने ही भारतीय राजनीति में सेकुलरवाद के नाम पर तुष्टिकरण और समाजवाद के नाम पर जातिवादी राजनीति के बीज डाले थे। उसके बाद से लगातार ही भारतीय राजनीति का स्तर गिरता गया है और वह इतना नीचे गिर गया है कि देश के लिए घातक निर्णय भी बड़ी ही सरलता से ले लिए जाते हैं और उस पर शर्म आना तो दूर, किसी को भी उस पर चिंता नहीं होती। </strong>चाहे वह मुस्लिम अल्पसंख्यकों के उत्थान के नाम पर देश में विभाजनकारी आर्थिक योजनाएं हों या फिर कश्मीर और आतंकवाद पर दोहरी नीति हो, भारतीय राजनीति में आई इस गिरावट का ही परिणाम है कि किसी भी प्रदेश में आज शांति नहीं है। कुछ यही स्थिति ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद से अमेरीका की होने लगी है। हालांकि अमेरीका के नागरिक भारतीय नागरिकों की तुलना में कहीं अधिक जागरूक और लोकतांत्रिक रूप से अधिक शक्तिसंपन्न हैं, इसलिए वहां इस पतन का परिणाम आने में समय लग सकता है।</p>
<p>ओबामा की नीतियां और बयान हमें भारतीय नेताओं की नीतियों और बयानों की याद दिलाते हैं। पिछले दिनों जब 9/11 के घटनास्थल पर एक स्मारक भवन बनाने की योजना बनी तो ओबामा ने उसके ग्राउंड जीरो यानी कि भूतल पर इस्लामिक कल्चरल सेंटर बनाने का प्रस्ताव रख दिया। खबर तो शुरूआत में यह आई कि ओबामा वहां एक मस्जिद का निर्माण चाहते हैं, परंतु बाद में जब उनके इस प्रस्ताव का विरोध शुरू हो गया तो इस्लामिक कल्चरल सेंटर का प्रस्ताव रख दिया गया। यह एक न समझ में आने वाला प्रस्ताव था और स्वाभाविक ही था कि इसका तीव्र विरोध वहां शुरू हो गया। विरोध इतना तीव्र था कि वहां ओबामा को मुसलमान तक करार दिया जाने लगा। पियु रिसर्च सेंटर द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 19 प्रतिशत अमेरीकन मानते हैं कि बराक ओबामा मुसलमान हैं। यह संख्या मार्च 2009 की तुलना में पूरे 18 प्रतिशत अधिक है। वहीं ओबामा के संप्रदाय के बारे में अनभिज्ञता जाहिर करने वालों की संख्या 43 प्रतिशत थी। सवाल यह है कि ओबामा ने ऐसा प्रस्ताव आखिर दिया ही क्यों? क्या ओबामा को 9/11 के बाद मुलसमानों के प्रति अमेरीका के व्यवहार पर पछतावा प्रकट करना था? क्या उन्हें यह लगता था कि इराक में सेना भेजकर अमेरीका ने जो गलती की है, वह इससे सुधर जाएगी? या फिर उन्हें भी भारतीय नेताओं की तरह अमेरीका में बढ़ रहे मुस्लिम मतों को लुभाने की चिंता थी? कारण चाहे जो भी हो, यह प्रस्ताव ओबामा की राजनीतिक अदूरदर्शिता को ही प्रकट करता है। ओबामा की इस राजनीतिक अपरिपक्वता पर पक्की मुहर उनके पिछले दिनों दिए गए एक बयान ने लगा दी।</p>
<p><strong>पिछले दिनों एक गुमनाम से पादरी ने 9/11 की बरसी पर कुरान की प्रतियों को जलाने की घोषणा की। बस फिर क्या था, तुरंत उसका विरोध प्रारंभ हो गया। विरोध के स्वर अंतरराष्ट्रीय थे। विरोध होना भी चाहिए था। 9/11 की घटना और कुरान की प्रतियों को जलाना, दोनों एक ही प्रकार की मानसिकता के परिचायक हैं। परंतु ओबामा ने इस पर जो प्रतिक्रिया व्यक्त की वह केवल अमेरिकियों ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व को हैरान कर देने वाली थी। ओबामा ने कहा कि वे उस पादरी से निवेदन करने हैं, कि वह ऐसा न करें, क्योंकि उसके ऐसा करने से इराक और अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम देशों में रह रहे अमेरीकी सैनिकों व नागरिकों को जान का खतरा पैदा हो जाएगा। यह भाषा भारत के नेताओं के मुख से सुनने के हम आदि हो चुके हैं, परंतु विश्व के सर्वाधिक शक्तिसंपन्न देश के प्रमुख के मुख से ऐसा बयान निश्चित ही हैरान कर देने वाला था। </strong>यदि ओबामा नैतिक और वैचारिक आधार पर कुरान की प्रतियों को जलाने से रोकने की अपील करते तो बात समझ में आती, परंतु यह तो भय की भाषा थी। क्या ओबामा ने इस्लामी कट्टरपंथ के आतंकवाद से हार मान ली है? क्या यह मान लिया जाए कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरीका ने जिस युध्द की घोषणा की थी, ओबामा ने उसमें अपनी हार स्वीकार कर ली है? क्या ओबामा ने यह स्वीकार कर लिया है कि इस्लामी कट्टरपंथियों को हिंसा फैलाने से रोकना या फिर उसका विरोध करना अब संभव नहीं है?</p>
<p>यह ठीक है कि हिंसा का जवाब हमेशा हिंसा से नहीं दिया जा सकता। यह भी सही है कि यदि हमें किसी पुस्तक पर किसी प्रकार की कोई आपत्ति है तो उसे जलाना कोई समाधान नहीं है। परंतु यह कदापि सही नहीं हो सकता कि किसी के कट्टरपंथी कार्रवाई का जवाब कट्टरपंथ से ही दिया जाए। यदि कुरान की प्रतियों को जलाना गलत कार्य है तो उसके विरोध में लोगों की हत्याएं करना तो उससे भी अधिक गलत है। फिर उसका भय दिखाना क्या एक परिपक्व और समझदार राजनेता का परिचायक हो सकता है? देखा जाए तो <strong>अमेरीका से हम किसी भी प्रकार की राजनीतिक परिपक्वता की आशा नहीं कर सकते। बुश(बड़े) से लेकर ओबामा तक उसके अभी तक के पिछले व्यवहारों ने उसके राजनीतिक मंतव्यों पर तो प्रश्चिह्न लगाया ही है, साथ ही उसकी राजनीतिक अदूरदर्शिता पर भी पक्की मुहर लगाई है। चाहे मामला इराक का हो या कश्मीर का, 9/11 की घटना हो या फिर तालिबान का मामला, अमेरीका ने सदैव स्वार्थपरक और अदूरदर्शी राजनीति का ही परिचय दिया है। परंतु ओबामा से पूर्व के राजनीतिक निर्णयों और बयानों में फिर भी एक प्रकार की राजनीतिक दृढता दिखती थी। ओबामा में उस दृढता का अभाव दिखता है। उनकी राजनीति स्वार्थपरक, अदूरदर्शी होने के साथ-साथ कमजोर भी है। क्या इसे हम अमेरीका के विश्व पर राजनीतिक प्रभुत्व के अंत का प्रारंभ के रूप में देख सकते हैं?</strong></p>
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		<title>इस्लाम और कट्टरता व हिसंक व्यवहार III</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Apr 2010 06:49:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>bhartiyapaksha</dc:creator>
				<category><![CDATA[सभ्यतामूलक विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[Intolerance]]></category>
		<category><![CDATA[Islam]]></category>

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		<description><![CDATA[भारत में इस्लाम पर चर्चा शुरू होते ही हिन्दुओं का ही एक तथाकथित उदारवादी वर्ग सामने आ जाता है। यह वर्ग मुसलमानों को पीड़ित मानता है और उसे यह भी लगता है कि इस्लाम पर कोई भी चर्चा करने से सर्वधर्मसमभाव पर चोट पहुँचती है। ऐसे लोगों को लगता है कि इस्लाम पर कोई आरोप [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=122&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में इस्लाम पर चर्चा शुरू होते ही हिन्दुओं का ही एक तथाकथित उदारवादी वर्ग सामने आ जाता है। यह वर्ग मुसलमानों को पीड़ित मानता है और उसे यह भी लगता है कि इस्लाम पर कोई भी चर्चा करने से सर्वधर्मसमभाव पर चोट पहुँचती है। ऐसे लोगों को लगता है कि इस्लाम पर कोई आरोप लगाने की बजाय हमें केवल और केवल मानवता की चर्चा करनी चाहिए, मानवता के ही विकास पर विचार-विमर्श करना चाहिए। यही भाव दिव्य प्रकाश जी ने भी अपनी टिप्पणियों में व्यक्त किए हैं। सेकुलरवादियों और राजनीतिक लोगों की तुलना मे यह वर्ग थोडा ईमानदार है और इसलिए इनकी बातों पर विचार किया जा सकता है। अत: इस्लाम पर चर्चा प्रारंभ करने से पहले हम थोड़ा सा सर्वधर्मसमभाव की पड़ताल करेंगे।</p>
<p>भारत का एक बहुत ही पुराना सिध्दांत एक वेदमंत्र में इस प्रकार कहा गया है- ‘एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति॥’ अर्थात् सत्य एक ही है, विद्वान लोग उसे बहुत प्रकार से बताते हैं। माना जाता है कि इससे ही सर्वधर्मसमभाव की परिकल्पना का जन्म हुआ है। वेदमंत्र में विप्र शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ और भाव दोनों ही निस्वार्थ और अकिंचन विद्वान की ओर संकेत करते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि सर्वधर्मसमभाव की यह वैदिक परिकल्पना आज सामान्य रूप से केवल और केवल भारत और उसमें भी केवल हिन्दुओं में ही पाई जाती है। विश्व के अन्य भागों में इस परिकल्पना को कुछ विशेष आदर प्राप्त नहीं है। पिछले कुछ (50-100) वर्षों में विश्व की राजनीतिक व शक्ति समीकरणों में हुए उलटफेर के कारण यूरोप व अमेरिका जैसे देशों ने राजनीतिक सिध्दांत के रूप में सेकुलरवाद को तो अपनाया है, परंतु सर्वधर्मसमभाव जैसा उदात्त भाव अभी भी वहां के समाजों में अपना स्थान नहीं बना पाया है। सवाल उठता है कि ऐसा क्यों है? मलेशिया जैसे एक परावर्तित इस्लामिक देश में गैरमुसलमानों के साथ पर्याप्त भेदभाव बरता जाता है, तो क्यों? अफ्रीका के देशों में 1950-60 के दशक में एकदम से पंथानुसार जनसंख्या में परिवर्तन आता है और अफ्रीका के मूल पंथानुयायियों की संख्या में केवल इस एक दशक में ही 50 प्रतिशत से अधिक की कमी आ गई तथा ईसाइत व इस्लाम के अनुयायियों की संख्या में जबरदस्त उछाल आया। ऐसा क्यों? ऐसा क्यों होता है कि आधुनिक शिक्षा और विज्ञान के इतने प्रचार-प्रसार के बाद भी ईसाई व मुसलमान जनसंख्या का एक बहुत बड़ा वर्ग (ईसाइयों में 40 से 77 प्रतिशत तक और मुसलमानों में 40 से 90 प्रतिशत तक) बाइबिल और शरिआ का कानून लागू किए जाने का पक्षधर है? जबतक हम विश्व में चल रहे इन घटनाक्रमों का अध्ययन नहीं कर लेते और जबतक कि हम इन विरोधाभासों का उत्तर नहीं ढूंढ लेते, तबतक सर्वधर्मसमभाव का हवाला देना आत्मघाती मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता।</p>
<p>गंभीरता से अध्ययन किया जाए तो सर्वधर्मसमभाव और समानता जैसे उदात्त भावों के विरोधाभास और उनकी वास्तविक अर्थों से हम परिचित हो पाएंगे। समानता का कभी यह अर्थ नहीं होता कि अच्छे और बुरे दोनों के साथ समान व्यवहार किया जाए। समानता का यह अर्थ भी नहीं होता कि देश काल व परिस्थिति देखे बिना व्यवहार किया जाए। समानता के उद्धोषक भी अपने निजी जीवन में अनेक प्रकार के असमान व्यवहार करते हैं। इसी प्रकार हम सर्वधर्मसमभाव को भी समझ सकते हैं। सर्वधर्मसमभाव का यह अर्थ कदापि नहीं लिया जा सकता कि जो पंथ मानवता की बात करते हों और जो अन्य पंथों के प्रति नफरत का भाव रखते हों, दोनों को समान मान लिया जाए। वास्तव में समानता या फिर सर्वधर्मसमभाव जैसे उदात्त विचार व्यवहार से कहीं अधिक भाव के द्योतक हैं। जिस प्रकार माँ और पत्नी के प्रति समान रूप से सम्मान का भाव रखने के बाद भी समान व्यवहार नहीं किया जा सकता, जिस प्रकार अपने शिक्षक और नौकर के प्रति समान रूप से सम्मान का भाव रखते हुए भी समान व्यवहार नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार अन्य व्यक्तियों, समुदायों और धर्मों या फिर पंथों के बारे में भी समझना चाहिए।</p>
<p>इस्लाम और ईसाइयत जैसे सेमेटिक संप्रदाय सर्वधर्मसमभाव पर आस्था नहीं रखते। इन संप्रदायों की स्पष्ट मान्यता है कि ईश्वर के बारे में केवल और केवल उनकी धारणा ही सही है। इस्लाम ने दुनिया को दो भागों में बांट रखा है। ईमान वाले और काफिर। उनके लिए दुनिया में दो प्रकार के लोग हैं, पहले वे जो कुरआन और मोहम्मद साहब पर ईमान रखते हैं यानी कि मुसलमान हैं और दूसरे वे जो इन पर ईमान नहीं रखते हैं यानी कि काफिर हैं। कुरआन में ईमान न रखने वाले लोगों के लिए दोजख का विधान किया गया है और यह कहा गया है कि दीन वालों को चाहिए कि वे उनसे निरंतर संघर्षरत रहें। इस संघर्ष पर इस्लाम में कोई विवाद नहीं है, विवाद है तो उसके तरीके पर। कुरआन में ऐसी आयतें भारी संख्या में हैं जो हिंसक संघर्ष का आदेश देती हैं। सेकुलरवादी और उदारवादी हिन्दू तथा कुछ आधुनिक शिक्षा में शिक्षित मुसलमान इस्लाम के पक्ष में तर्क गढ़ने के लिए संघर्ष को अहिंसक सिध्द करने की कोशिश करते हैं। परंतु दोनों इतना तो स्वीकार करते ही हैं कि इस्लाम लोगों को व्यक्तिगत आस्था के आधार पर विभाजित करता है। आस्था के आधार पर लोगो में भेदभाव करना ही अपने आप में वैमनस्य व नफरत पैदा करने के लिए पर्याप्त बड़ा कारण है और इसलिए इस्लाम कभी भी समाज में शांति का संदेश नहीं दे सकता। यही कारण है कि इस्लाम कभी भी मानवता की बात नहीं कर सकता और न ही वह करता है। सनातन वैदिक धर्म भी लोगों को दो भागों में बांटता है लेकिन या विभाजन आचरण के आधार पर है, व्यक्तिगत आस्था के आधार पर नहीं। यह विभाजन अच्छे और बुरे का है न कि वैदिक और अवैदिक का। इसलिए चार्वाक जैसे नास्तिक को भी वैदिकों ने ऋषि कहा। इस्लाम जैसे सेमेटिक संप्रदाय और सनातन वैदिक धर्म में यह एक मूलभूत अंतर है। इसलिए इस्लाम पर बहस करते समय सर्वधर्मसमभाव और मानवता के विकास की बातें करना लुभावना तो है, परंतु सही नहीं। इसलाम की मान्यता और मूल सिध्दांतों में ये दोनों ही बातें नहीं हैं। इस बात को समझने के लिए मौलाना जाकिर नाइक का यह साक्षात्कार देखना चाहिए। आगे दिए गए लिंक को कॉपि करके अपने ब्राउजर में पेस्ट करें और रैपिडशेयर से विडीयो डाउनलोड करके देखें। डाउनलोडिंग नि:शुल्क है।  http://rapidshare.com/files/334042409/video_JNAIK.mp4</p>
<p>हैरत की बात यह भी है कि इस्लाम पर लिखे मेरे लेखों पर जो भी गालियां मुझे प्राप्त हुईं, वे सभी केवल और केवल मेरे हिन्दू बंधुओं द्वारा प्राप्त हुईं। अधिकांश मुसलमान भाइयों ने मेरे प्रयास को सराहा। कुछेक ने विरोध तो किया, परंतु गालियां नहीं दीं। किसी मुसलमान ने मुझे हिन्दू कट्टरवाद या फिर गुजरात दंगों की याद नहीं दिलाई। यह सारा काम हिन्दुओं ने ही किया। इस्लाम पर मेरी पहली पोस्ट पर ही मेरे एक मित्र की टिप्पाणी थी कि अब मेरे खिलाफ फतवा जारी होगा। हालांकि यह एक मजाक था, परंतु यह मजाक भी भय में से पैदा मजाक था। इससे यह स्पष्ट होता है कि सर्वधर्मसमभाव और हिन्दू कट्टरवाद आदि सारी बातें केवल और केवल हिन्दुओं के ही एक वर्ग द्वारा रचित बातें हैं। मुसलमानों और ईसाइयों को इससे कोई लेना-देना नहीं है या फिर तभी तक लेना-देना है, जब तक वे अल्पमत में हैं। क्या ये उदारवादी और सेकुलर हिन्दू इस पर विचार करने के लिए तैयार हैं? क्या ये उदारवादी और सेकुलर हिन्दू यह सोचने के लिए तैयार हैं कि आखिर नरेंद्र मोदी और साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ मुहिम चलाने वाले सारे लोग हिन्दू या फिर परावर्तित हिन्दू (तीस्ता सीतलवाड) ही क्यों हैं? इस्लाम पर बहस छेडते ही उसे शांतिप्रिय और मानवता का रक्षक घाषित करने के लिए हिन्दू या फिर परावर्तित हिन्दू ही आगे क्यों आते हैं? कुरआन की हिंसापरक आयतों का हवाला दिए जाने पर उनके गलत अर्थ किए जाने की बात हिन्दू ही क्यों करते हैं? आखिर इन उदारवादी और सेकुलर हिन्दुओं ने कुरआन का ठेका क्यों लिया हुआ है? ये उदारवादी और सेकुलर हिन्दू वेदों और मनुस्मति जैसे हिन्दू ग्रंथों पर आरोप लगाए जाने पर उसके समर्थन में क्यों नहीं खडे होते हैं? आखिर विजय तेंडुलकर जैसे सेकुलर साहित्यकार भी क्यों नरेंद्र मोदी को तो बिना मुकदमा चलाए देखते ही गोली मार देना चाहते हैं, परंतु मोहम्द अफजाल को कोर्ट से फांसी की सजा मिलने पर भी उसे बचाने के लिए खडे हो जाते हैं? उन्हें कुरआन और इस्लाम की ही इतनी चिंता क्यों है? इस्लाम पर चर्चा करते ही जाग जाने वाली उनकी अस्मिता हिन्दुत्व पर आघात होने पर क्यों नहीं जागती है?</p>
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		<title>सगोत्र विवाह और भारतीय परम्परा</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Apr 2010 06:59:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>bhartiyapaksha</dc:creator>
				<category><![CDATA[सभ्यतामूलक विमर्श]]></category>

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		<description><![CDATA[सगोत्र विवाह भारतीय वैदिक परम्परा मे निषिद्ध माना जाता है. वैसे गोत्र शब्द का प्रयोग वैदिक ग्रंथों मे कहीं दिखायी नही देता. सपिण्ड (सगे बहन भाइ) के विवाह निषेध का उपदेश , ऋग्वेद 10वें मण्डल के 10वें सूक्त मे यम यमि जुडवा बहन भाइ के सम्वाद के रूप में एक आख्यान द्वारा मिलता है. यमी [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=118&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align:left;">सगोत्र विवाह भारतीय वैदिक परम्परा मे निषिद्ध माना जाता है. वैसे गोत्र शब्द का प्रयोग वैदिक ग्रंथों मे कहीं दिखायी नही देता.  सपिण्ड (सगे बहन भाइ) के विवाह निषेध का उपदेश , ऋग्वेद 10वें मण्डल के 10वें सूक्त मे  यम यमि जुडवा बहन भाइ के सम्वाद के रूप में एक आख्यान द्वारा मिलता है.<br />
यमी अपने सगे भाई यम से विवाह द्वारा संतान उत्पन्न करने की प्रबल  इच्छा प्रकट करती है .परन्तु यम  उसे यह अच्छे तरह से समझाता  है, कि ऐसा विवाह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होता है, और जो इस प्रकार संतान उत्पन्न करते हैं वे घोर पाप करते हैं.<br />
“सलक्षमा यद् विषु रूपा भवाति” ऋ10/10/2 (“सलक्ष्मा सहोदर बहन  से पीडाप्रद संतान उत्पन्न होने  की सम्भावना होती है”)‌<br />
“ पापमाहुर्य: सस्वारं निगच्छात” ऋ10/10/12 ( “जो अपने सगे बहन भाई से संतानोत्पत्ति करते हैं,  भद्र जन उन्हें पापी कहते हैं)<br />
इस विषय पर स्पष्ट जानकारी पाणिनी कालीन भारत से भी मिलती है.<br />
अष्टाध्यायी के अनुसार “ अपत्यं पौत्र प्रभृति यद गोत्रम् “, एक पुरखा के पोते,पडपोते आदि जितनी संतान होगी वह एक गोत्र की कही जायेगी.<br />
यहां पर सपिण्ड का उद्धरण करना आवश्यक हो जाता है.<br />
“ सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते !<br />
समानोदकभावस्तु  जन्मनाम्नोरवेदन !! “<br />
मनु: 5/60<br />
“सगापन तो सातवीं पीढी में समाप्त हो जाता है. और  घनिष्टपन जन्म और नाम के ज्ञात ना रहने पर छूट जाता है.”<br />
आधुनिक जेनेटिक अनुवांशिक विज्ञान के अनुसार inbreeding multiplier अंत:प्रजनन से उत्पन्न विकारों की सम्भावना का गुणांक इकाई से यानी एक से कम सातवीं पीढी मे जा कर ही होता है.<br />
गणित के समीकरण  के अनुसार,<br />
अंत:प्रजनन विकार  गुणांक= (0.5)N  x100, ( N पीढी का सूचक है,)<br />
पहली पीढी मे N=1,से यह गुणांक 50 होगा, छटी पीढी मे N=6 से यह गुणांक 1.58 हो कर भी इकाई से बडा रहता है. सातवी पीढी मे जा कर N=7 होने पर ही यह अंत:पजनन गुणांक 0.78 हो कर इकाई यानी एक से कम हो जाता है.<br />
मतलब साफ है कि सातवी पीढी के बाद ही अनुवांशिक रोगों की सम्भावना समाप्त होती है. यह एक अत्यंत विस्मयकारी आधुनिक विज्ञान के अनुरूप सत्य है जिसे हमारे ऋषियो ने सपिण्ड विवाह  निषेध कर के बताया था.<br />
सगोत्र विवाह से शारीरिक रोग , अल्पायु , कम बुद्धि, रोग निरोधक क्षमता की कमी, अपंगता, विकलांगता सामान्य विकार होते हैं. भारतीय परम्परा मे सगोत्र विवाह न होने का यह भी एक परिणाम है कि सम्पूर्ण विश्व मे भारतीय सब से अधिक बुद्धिमान माने जाते हैं.<br />
सपिण्ड विवाह निषेध भारतीय वैदिक परम्परा की विश्व भर मे एक अत्यन्त आधुनिक विज्ञान से अनुमोदित व्यवस्था है. पुरानी सभ्यता चीन, कोरिया, इत्यादि  मे भी गोत्र /सपिण्ड विवाह अमान्य है. परन्तु मुस्लिम और दूसरे पश्चिमी सभ्यताओं मे यह विषय आधुनिक विज्ञान के द्वारा ही लाया जाने के प्रयास चल रहे हैं. एक जानकारी भारत वर्ष के कुछ मुस्लिम समुदायों के बारे मे भी पता चली है. ये मुस्लिम समुदाय इस्लाम को अपनाने से पहले के अपने हिंदू गोत्रों को अब भी याद रखते हैं और विवाह सम्बंध बनाने समय पर सगोत्र विवाह नही करते.<br />
आधुनिक अनुसंधान और सर्वेक्षणों के अनुसार फिनलेंड मे कई शताब्दियों से चले आ रहे शादियों के रिवाज मे अंत:प्रजनन के कारण  ढेर सारी ऐसी बीमारियां सामने आंयी  हैं जिन के बारे  वैज्ञानिक अभी तक कुछ भी नही जान पाए हैं.<br />
मेडिकल अनुसंधानो द्वारा , कोरोनरी हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर , गठिया, द्विध्रुवी अवसाद (डिप्रेशन), दमा, पेप्टिक अल्सर, और हड्डियों की कमजोरी. मानसिक दुर्बलता यानी कम बुद्धि का होना भी ऐसे विकार हैं जो अंत:प्रजनन से जुडे  पाए गए हैं<br />
बीबीसी की  पाकिस्तानियों पर  ब्रिटेन  की एक रिपोर्ट के अनुसार,  उन के बच्चों मे  13 गुना आनुवंशिक विकारों के होने  की संभावना  अधिक मिली, बर्मिंघम में पहली चचेरे भाई से  विवाह के दस बच्चों में  एक या तो बचपन में मर जाता है या एक गंभीर विकलांगता विकसित करता है. बीबीसी ने यह भी कहा  कि, पाकिस्तान में ब्रिटेन, के   पाकिस्तानी समुदाय में प्रसवकालीन मृत्यु दर काफी अधिक है.  इस का मतलब यह है कि ब्रिटेन में अन्य सभी जातीय समूहों. के मुकाबले मे जन्मजात सभी ब्रिटिश पाकिस्तानी शिशु मौते 41 प्रतिशत अधिक पाई गयी. इसी प्रकार  Epidermolysis bullosa अत्यधिक शारीरिक कष्ट का जीवन, सीमित मानवीय और संपर्क शायद त्वचा कैंसर से एक जल्दी मौत भीआनुवंशिक स्थितियों की संभावना  बताती है.<br />
माना जाता है, कि मूल पुरुष ब्रह्मा के चार पुत्र हुए, भृगु, अंगिरा, मरीचि और अत्रि. भृगु के कुल मे जमदग्नि, अंगिरा के गौतम और भरद्वाज,मरीचि के कश्यप,वसिष्ट, एवं अत्रि के विश्वामित्र हुए.<br />
इस प्रकार जमदग्नि, गौतम, भरद्वाज, कश्यप, वसिष्ट, अगस्त्य और विश्वामित्र ये सात ऋषि आगे चल कर गोत्रकर्ता या वंश चलाने वाले हुए. अत्रि के विश्वामित्र के साथ एक और भी गोत्र चला बताते हैं.इस प्रकार  के विवरण से प्राप्त होती है आदि  ऋषियों के  आश्रम के नाम.<br />
अपने नाम के साथ गुरु शिष्य परम्परा, पिता पुत्र परम्परा, अपने नगर, क्षेत्र, व्यवसाय समुदाय के नाम जोड कर बताने की प्रथा चल पडी थीं. परन्तु  वैवाहिक सम्बंध के लिए सपिंड की सावधानी सदैव वांछित रही है. आधुनिक काल मे  जनसंख्या वृद्धि से  उत्तरोत्तर समाज आज  इतना बडा हो गया है  कि सगोत्र होने पर भी सपिंड  होंने की सम्भावना नही होती . इस लिए विवाह सम्बंध के लिए आधुनिक काल मे केवल गोत्र छोड देना आवश्यक नही रह गया है. परंतु सगोत्र होने पर सपिण्ड की वैज्ञानिक परीक्षा आवश्यक हो जाती है. यह इतनी सुगम नही होती. सात पीढी पहले के पूर्वजों की जानकारी भी साधारणत: उपलब्ध नही रह्ती. इसी लिए सगोत्र विवाह न करना ही ठीक माना जाता है.<br />
इसी लिए 1955 के हिंदु विवाह सम्बंधित कानून मे सगोत्र विवाह को भारतीय न्याय व्यवस्था मे अनुचित नही माना गया. परंतु अंत:प्रजनन की रोक के लिए कुछ मार्ग निर्देशन भी किया गया है.<br />
वैदिक सभ्यता मे हर जन को उचित है के अपनी बुद्धि का विकास अवश्य करे. इसी लिए गायत्री मंत्र सब अधिक महत्वपूर्ण माना और पाया जाता है.<br />
निष्कर्ष  यह निकलता है कि सपिण्ड विवाह नही करना चाहिये. गोत्र या दूसरे प्रचलित नामों, उपाधियों को बिना विवेक के सपिण्ड निरोधक नही समझना चाहिये.<br />
<strong> &#8211; सुबोध कुमार</strong></p>
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	</item>
		<item>
		<title>क्या यह सांप्रदायिकता नहीं है?</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Apr 2010 09:01:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>bhartiyapaksha</dc:creator>
				<category><![CDATA[सांप्रदायिकता]]></category>
		<category><![CDATA[Communalism]]></category>
		<category><![CDATA[Islam]]></category>

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		<description><![CDATA[यह चित्र दिन शुक्रवार के एक बजे का देश की राजधानी दिल्ली की एक अत्यंत व्यस्त सड़क का है। इस समय इस सड़क पर भारी ट्रैफिक दिखना चाहिए था, परंतु यहां सन्नाटा पसरा हुआ दिखता है। इस सन्नाटे का कारण कोई कर्फ्यु या धारा 144 नहीं है। वास्तव में इस सड़क पर शुक्रवार होने के [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=112&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://bhartiyapaksha.files.wordpress.com/2010/04/image109.jpg"><img src="http://bhartiyapaksha.files.wordpress.com/2010/04/image109.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="Image109" width="300" height="225" class="alignleft size-medium wp-image-113" /></a> यह चित्र दिन शुक्रवार के एक बजे का देश की राजधानी दिल्ली की एक अत्यंत व्यस्त सड़क का है। इस समय इस सड़क पर भारी ट्रैफिक दिखना चाहिए था, परंतु यहां सन्नाटा पसरा हुआ दिखता है। इस सन्नाटे का कारण कोई कर्फ्यु या धारा 144 नहीं है।<br />
<a href="http://bhartiyapaksha.files.wordpress.com/2010/04/image113.jpg"><img src="http://bhartiyapaksha.files.wordpress.com/2010/04/image113.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" title="Image113" width="300" height="225" class="alignright size-medium wp-image-114" /></a> वास्तव में इस सड़क पर शुक्रवार होने के कारण मुसलमान नमाज पढ़ रहे हैं और इस कारण इस अतिव्यस्त सड़क पर पूरे एक घंटे तक कर्फ्यु जैसा माहौल है। लोगों को परेशानी होती है तो हुआ करे, आखिर यह एक सेकुलर देश है भई। ऐसा नहीं है कि यह केवल इस एकमात्र सड़क पर या वर्ष में कोई एकाध बार ही होता हो। ऐसी सड़के देश भर में हजारों हैं और ऐसा उन सड़कों पर हरेक शुक्रवार को होता है। संभवत: किसी इस्लामिक देश में भी ऐसा नहीं होता होगा, परंतु भारत तो सेकुलर देश है। परंतु आप सबसे आग्रह है कि ऐसा देखने के बाद चुप नहीं बैठें, थाने में जाएं और शिकायत दर्ज करें। वहां कोई सुनवाई नहीं हो तो न्यायालय में जाएं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने ऐसे ही एक मामले में यह निर्णय दिया है कि नमाज पढ़ने के लिए सड़कों या गलियों का अतिक्रमण गैर कानूनी है और पुलिस को इसे रोकना चाहिए।<br />
<a href="http://bhartiyapaksha.files.wordpress.com/2010/04/hc-order-on-namaj.jpg"><img src="http://bhartiyapaksha.files.wordpress.com/2010/04/hc-order-on-namaj.jpg?w=52&#038;h=300" alt="" title="HC Order on Namaj" width="52" height="300" class="alignleft size-medium wp-image-115" /></a> दिल्ली उच्च न्यायालय ने गत 20 अप्रैल को यह ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा है कि मुसलमान नमाज पढ़ें लेकिन अपनी मस्जिद के परिसर के अंदर न कि बाहर पूरी सड़क पर।<strong> न्यायालय ने कहा है कि नमाज पढ़ने के लिए सार्वजनिक सड़क या गलियों को घेरना गैरकानूनी है और पुलिस को चाहिए कि वह ऐसी गतिविधियों को रोके। ध्यान देने की बात यह है कि न्यायालय ने यह निर्णय जनवरी, 2009 में ही दिया था, परंतु पुलिस मुसलमानों को सड़कों पर नमाज पढ़ने से नहीं रोक पाई, तब स्थानीय निवासी दोबारा न्यायालय में गए थे।</strong> हालांकि पुलिस ने इसपर अपनी असमर्थता व्यक्त की है कि उसके पास इतने लोग नहीं। परंतु इसके बावजूद न्यायालय के इस आदेश की बिना पर सड़कों और गलियों पर होने वाले इस प्रकार के अतिक्रमणों को रोकने की कोशिश की जा सकती है।<br />
<strong>ध्यान देने की बात यह है कि समुदाय स्तर पर होने वाली इसप्रकार की गतिविधियों का निराकरण समुदाय स्तर पर आपत्ति प्रकट करके हो किया जा सकता है। यह सवाल केवल मुसलमानों का ही नहीं है, यह सवाल देश की कानून व सामाजिक व्यवस्थाओं का है। सवाल यह है कि यदि देश के अन्य समुदाय भी ऐसा ही करने लगें तो क्या हमारा शासन-प्रशासन तंत्र उसे इतने ही सहज भाव से स्वीकार कर लेगा? क्या इससे सामाजिक और कानून व्यवस्था का सुचारू पालन संभव है? यदि नहीं तो किसी समुदाय विशेष को यह छूट क्यों? क्या ऐसी गतिविधियों को सहन करना व बढ़ावा देना सांप्रदायिकता को बढ़ाना ही नहीं कहलाएगा?</strong></p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/bhartiyapaksha.wordpress.com/112/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=112&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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	</item>
		<item>
		<title>कुछ टिप्पणियां जो ईमेल पर आईं</title>
		<link>http://bhartiyapaksha.wordpress.com/2010/04/16/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9b-%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%a3%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a5%8b-%e0%a4%88%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/</link>
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		<pubDate>Fri, 16 Apr 2010 07:43:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>bhartiyapaksha</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[1. Dear Ravi, Sorry for multicasting my message. I’m impressed by the detailing of your article, I wish you could have excavated bit deeper. I humbly request you to remove my email id from the list. I felt bad and surprised after reading your article. ये पढियेगा जरा खुले दिमाग से शायद होश ठिकाने आयें [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=109&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>1. Dear Ravi,<br />
Sorry for multicasting my message.<br />
I’m impressed by the detailing of your article, I wish you could have excavated bit deeper.<br />
I humbly request you to remove my email id from the list.<br />
I felt bad and surprised after reading your article.<br />
ये पढियेगा  जरा खुले दिमाग से शायद होश ठिकाने आयें आपके….<br />
दूसरा बनवास(कैफ़ी आज़मी)<br />
राम बनवास से जब लौट के घर में आये<br />
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये<br />
रक्से दीवानगी आंगन में जो देखा होगा<br />
छह दिसंबर को श्री राम ने सोचा होगा<br />
इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये?<br />
जगमगाते थे जहां राम के क़दमों के निशां<br />
प्यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहां<br />
मोड़ नफरत के उसी राहगुज़र में आये<br />
धरम क्या उनका है, क्या जात है, यह जानता कौन?<br />
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन<br />
घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये<br />
शाकाहारी है मेरे दोस्त, तुम्हारा खंजर<br />
तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर<br />
है मेरे सर की खता ज़ख्म जो सर में आये<br />
पांव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे<br />
के नज़र आये वहां खून के गहरे धब्बे<br />
पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे<br />
राम यह कहते हुए अपने द्वारे से उठे<br />
राजधानी की फ़िज़ा आयी नहीं रास मुझे<br />
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे।</p>
<p>सादर ,</p>
<p><strong>Divya Prakash Dubey</strong></p>
<p>2. दिव्य प्रकाश दुबे जी<br />
हमारे होश तो ठिकाने ही है , पर आप ज़रा आखो से हरा चश्म उतारिये . दिमाग को खुला रखिये तब सोचियेगा ?<br />
दिसंबर में ढाचा टूटा था . पर पुरे देश में लोगो के घर जला दिए गए . कशमीर में इतने सालो में इतने मंदर टूटे पर कभी कोई हिन्दू किसी का घर जलाने पहुचा क्या ?.<br />
काशी से ;लेकर मथुरा तक में मंदिरों को मस्जिदों में बदल दिया गया इतिहास गवाह है . किसी हिन्दू ने कभी किसी मस्जिद को तोड़ कर मंदर बनाया हो बताइयेगा . हम तो हर पत्थर  को पूजते है  पेड़ को पूजते है  हम कहा किसी के घर को गिराने  की सोचेगे  पर आपने जो मेरा घर लुटा गर वापस मागते है तो कोई गुनाह नहीं  शान्ति हर बार मेरी ही कीमत पर क्यों ?<br />
आप दंगो का दर दिखाते है मारकाट का डर दिखाते है . इसलिए आप सेकुलर है . आप जैसे लोगो के कारण ही कशमीर से भगाए है है कल दिल्ली से भी भगाए जायेगे तब ये कविता गुनगुनाइयेगा . इन साहब को ये कविता गोधरा पर नहीं सूझी . आपको सूझी ? काहे भाई ये हिन्दू क्या इंसान नहीं है ये मर जाए तो आप जैसे लोग बिल में घुस जाते है  मुंबई कांड में मोमबत्ती जलाते है फिर कसाब और उसके टुच्चे पैरवीकारो के साथ खड़े होकर उसके मानवाधिकारों के लिए लड़ते है कहते है पुलिस ने गलत पकड़ कर फसा दिया ये तो मुंबई घुमाने आये थे . वीडियो भी फिलम में काम दिलावाने के बहाने शूट किया गया . आपने सापो के बारे में पडा है ? सबसे खतरनाक साप आस्तीन के होते है और वो कौन है आप अब बखूबी जान गए होगे ?<br />
<strong>ARUN ARORA</strong> </p>
<p>3. I feel that Mr. Divya Prakash Dubey lost his mental balance.<br />
<strong>viniyog</strong></p>
<p>4. नमस्‍कार, </p>
<p>मैने भा‍रतीय पक्ष को पढा उसमे कुछ भी ऐसा नही था जिसमे कुछ कहा जा सकें, यह‍ उनकी अभिव्‍यक्ति थी उन्‍होने दिखाया। आपके ईमेल पर यह मेल पहुँची यह दु:खद है, किन्‍तु जिस प्रकार आप कैफी का उदाहरण दे रहे है उन्‍ही कैफी पुत्री शबाना जी कहती हैं कि इस्लामिक आतंकवाद इस्लाम को बदनाम करने की साज़िश है और यह मीडिया द्वारा रची जा रही है। यह मान भी लें कि भारत जैसे देश में यह संभव है, तो पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, इराक और अरब जैसे देशों में यह किनकी साज़िश है? क्या वहां भी हिंदुत्ववादी इंडियन मीडिया का प्रभुत्व है? वैसे भी शबाना और जावेद अख़्तर की बौद्धिकता तभी जागृत होती है जब मुस्लिमों को कोई तकलीफ़ होती है। </p>
<p>गुजरात दंगो का असर सबको दिखा क्‍योकि मुसलमान मारे गये किन्‍तु मऊ, आजमगढ़ और हाल मे ही बरेली 15 दिनो तक कर्फ्यू मे पड़ा रहा किसी के कान मे जू तक नही रेंगी। अगर इसी का परिणाम उत्तर प्रदेश दंगा होता तो सभी हमदर्दी एक हो जाते। मै अरूण अरोड़ा जी की बात से सहमत हूँ कि देश के सबसे बड़े गद्दार आस्‍तीन के सांप होते है। </p>
<p>जय हिन्‍द<br />
<strong>Pramendra Pratap Singh</strong></p>
<p>5. श्रीमान जी सभी लोगो को मेरा नमस्कार।</p>
<p>मैं कैफ़ी आज़मी साहेब को बचपन से जनता हूँ और कई बार मिल भी चूका हूँ।<br />
शबाना आज़मी और जावेद साहेब जो भी कहें , मगर मुझे पता है की कैफ़ी साहेब<br />
का घर उजाड़ने वाले उन्ही के गाँव के मुसलमान लोग ही थे , अगर किसी ने<br />
मदत की तो वो लोग हिन्दू ही थे।</p>
<p>कैफ़ी साहेब की खुद अपने गाँव मैं कोई भी मुसलामन इज्जत नहीं करता था।<br />
वजह थी शबाना  जी का फिल्मो मैं काम करना।</p>
<p>लेकिन धीरे -धीरे लोगो ने अपने आप मैं बदलाव लाये और कैफ़ी साहेब को समाज<br />
मैं इज्जत दी।<br />
<strong>Tarkeshwar Giri</strong></p>
<br />  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/bhartiyapaksha.wordpress.com/109/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=109&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>इस्लाम और कट्टरता व हिसंक व्यवहार II</title>
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		<pubDate>Wed, 14 Apr 2010 09:06:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>bhartiyapaksha</dc:creator>
				<category><![CDATA[सभ्यतामूलक विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[Intolerance]]></category>
		<category><![CDATA[Islam]]></category>

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		<description><![CDATA[यह इस देश की विडंबना है कि अपने देश में इस्लाम पर कोई शास्त्रीय चर्चा नहीं की जा सकती। उस पर केवल और केवल राजनीतिक बहस ही संभव है।<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=101&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मेरी एक पिछली पोस्ट ‘इस्लाम और कट्टरता व हिंसक व्यवहार’ पर बहुत टिप्पणियां हुई और अच्छी बहस हुई। कई लोगों ने फोन भी किया। मैंने यह महसूस किया कि अधिकांश लोगों ने विषय की गंभीरता पर ध्यान देने की बजाय इसे राजनीतिक चश्मे से देखा। पिछले आलेख में एक विडीयो का लिंक था। उसे कापी करके ब्राउजर में पेस्ट करने से विडीयो डाउनलोड किया जा सकता था। केवल पांच लोगों ने उसे डाउनलोड करके देखने की जहमत उठाई। शेष बिना उसे देखे टिप्पणियां करते रहे। कइयों ने तो अनेक बौध्दिक गालियां भी दीं। परंतु मेरा इस आलेख का हेतु इस्लाम को समझने और समझाने का ही है। इससे अधिक कुछ नहीं। इसी कड़ी में यह दूसरा आलेख प्रस्तुत है।</strong></p>
<p>यह इस देश की विडंबना है कि अपने देश में इस्लाम पर कोई शास्त्रीय चर्चा नहीं की जा सकती। उस पर केवल और केवल राजनीतिक बहस ही संभव है। परंतु मैं यहां इस्लाम पर एक शास्त्रीय बहस छेड़ने की कोशिश कर रहा हूं। बात इस्लाम के सिध्दांतों के बारे में की गई थी, परंतु लोगों ने देश में रह रहे मुसलमानों के बारे में चर्चा शुरू कर दी। सवाल मुसलमानों का नहीं है। सवाल इस्लाम के मूल सिध्दांतों का है। इस्लाम के सिध्दांतों और आम मुसलमानों के व्यवहार को अलग-अलग करके देखना होगा। सामान्यत: आम मुसलमान एक शांत जीवन से अधिक की इच्छा नहीं करते और उनमें भी अन्य सामान्य मनुष्यों के समान ही गुण व दोष होते हैं। परंतु उनका मत यानी कि इस्लाम उनके दैनन्दिन जीवन को एक नैतिक आधार व पांथिक कर्मकांड प्रदान करता है, जो इस तरह की मानसिक व बौध्दिक सीमाएं व बाधाएं खड़ी करता है, जिससे मुक्त होना सहज नहीं होता। सवाल यह है कि क्या इस्लाम के मूल चरित्र में असहिष्णुता और हिंसा है? क्या उसके कारण समाज में किसी प्रकार की समस्या पैदा हो सकती है? यदि है तो फिर उसका उपाय क्या है? इन प्रश्नों पर विचार करने के लिए ही हमें इस्लाम को एक व्यक्ति के नाते मुसलमानों से अलग करके, उस पर एक सिध्दांत के रूप में चर्चा करनी होगी।</p>
<p><strong>सामान्यत: यह कहा जाता है कि इस्लाम के मूल चरित्र में कोई कट्टरता, असहिष्णुता और हिंसा नहीं है। यह सब विकृतियां हैं और दिग्भ्रमित लोगों द्वारा की गईं गलत व्याख्याएं हैं। परंतु सोचने की बात यह है कि यदि मूल विचार में हिंसा नहीं हो तो क्या केवल उसकी गलत व्याख्या के कारण इतने बड़े पैमाने नरसंहार संभव है? उदाहरण के लिए हम सनातन वैदिक धर्म को देखें। सनातन वैदिक धर्म में भी विकृतियां आईं और उसकी काफी विकृत मीमांसाएं भी की गईं, परंतु उसके कारण कभी भी बड़े तो क्या छोटे स्तर पर भी नरसंहार नहीं हुआ। उन विकृतियों व गलत व्याख्याओं के कारण समाज में भेदभाव और छुआछूत तो फैला और उसके कारण अत्याचार भी बहुत हुए, परंतु देश के आजाद होने तक उसके कारण सामूहिक हत्याकांड कभी नहीं हुआ। देश के आजाद होने के बाद जब देश में सामाजिक व जातीय आधार पर सामूहिक हत्याकांड करनेवाले विदेशी समूहों यथा साम्यवादियों व नक्सलवादियों के सक्रिय होने के बाद कुछेक स्थानों पर सामूहिक हत्याकांड हुए हैं।</strong> परंतु विदेशी हस्तक्षेप से पहले देश में कभी भी जातीय या पांथिक आधार पर कोई सामूहिक नरसंहार नहीं हुआ। </p>
<p>इसका कारण भी बड़ा स्पष्ट है। सनातन वैदिक धर्म के मूल चरित्र में हिंसा नहीं है। इसलिए तमाम विकृतियों के बावजूद भी उसने कभी भी हिंसा नहीं फैलाया या फिर हिंसा का समर्थन नहीं किया। महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में भी जो हिंसा का वर्णन है, वह हिंसा मात्र न हो कर अच्छाई बनाम बुराई का संघर्ष है। वास्तव में मतभिन्नता के कारण किसी भी प्रकार की हिंसा को सनातन वैदिक धर्म ने किसी भी स्वरूप में मान्यता नहीं दी। यही कारण है कि घोर आस्तिक राजा दशरथ के दरबार में घोर नास्तिक ऋषि भी हुआ करते थे। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि जब तक किसी भी संप्रदाय के मूल चरित्र में हिंसा नहीं हो, तब तक केवल उसकी गलत व्याख्या के आधार पर इतनी हिंसा नहीं फैलाई जा सकती। इससे यह तो स्पष्ट होता है कि इस्लाम के मूल सिध्दांतों और चरित्र में किसी न किसी रूप में हिंसा को मान्यता दी गई है।<br />
कुरआन के सामान्य अध्ययन से ही यह बात पता चल जाती है कि कुरआन में स्थान-स्थान पर इस्लामविरोधियों व इस्लामद्रोहियों को मार डालने का आदेश दिया गया है। काफिरों से निरंतर युध्द जारी रखने और उन्हें देखते ही मार डालने का आदेश कुरआन में आम है। इसके लिए प्रेरणा के रूप में जन्नत का प्रलोभन दिया गया है। जन्नत में उन्हें हूरें मिलने की आशा दिखाई जाती है। इसके बारे में प्रसिध्द विद्वान अनवर शेख ने अपनी पुस्तकों में काफी कुछ लिखा है। यहां उसके कुछ उध्दरण प्रस्तुत हैं। इन उध्दरणों में अनवर शेख ने इस्लाम के सिध्दांतों में व्याप्त हिंसा और उसकी प्रेरणा देने के लिए दिए जाने वाले प्रलोभनों का वर्णन किया है। यहां मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैंने स्वयं भी व्यक्तिगत रूप से कुरान का अध्ययन किया है और इन आयतों को इसी रूप में वहां पाया है।</p>
<p><em>इस्लाम ही एक ऐसा धर्म है जिसने मानव समाज को दो स्थायी पारस्परिक युठ्ठ करने वाले समूहों में बाँट रखा है। इनमें से जो अल्लाह और पैगम्बर मुहम्मद में विश्वास करते हैं, वे अल्लाह की पार्टी वाले कहलाते हैं और जो ऐसा नहीं मानते हैं, वे शैतान की पार्टी वाले हैं (58:19,22)। इनमें से पहले वर्ग वालों का सबसे पवित्रतम कर्त्तव्य यह है कि वे दूसरे वर्ग वालों को पराधीन करके समाप्त कर दें। यह उद्देश्य इतना आवश्यक है कि उसके लिए इस्लाम अपने अनुयायियों को न केवल गैर-ईमान वालों की हत्या, लूट और उनकी स्त्रियों को पराधीन करने को उत्साहित करता है, बल्कि इस प्रकार की हत्या, लूट और शील भ्रष्टीकरण को सबसे बड़ा पुण्य कार्य तक घोषित करता है। इस्लाम इसे &#8216;जिहाद&#8217; कहता है जोकि किसी मुजाहिद (इस्लाम का पवित्र सैनिक) को उद्धार और &#8216;जन्नत&#8217; में स्थान देने की गारंटी देता है।<br />
अपने अनुयायियों को निर्दयी लुटेरा बनाने के लिए, वह उन्हें बार-बार अपने संभावित पीडितों यानी गैर-मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा करने के लिए प्रेरित करता है।<br />
1. &#8221;निश्चय ही (भूमि) पर चलने वाले सबसे बुरे जीव अल्लाह की दृष्टि में वे लोग हैं जिन्होंने &#8216;कुफ्र&#8217; किया फिर वे &#8216;ईमान&#8217; नहीं लाते&#8221;। (इस्लाम नहीं स्वीकारते) (8:55)।<br />
2. &#8221;तो इन काफ़िरों पर अल्लाह की फिटकार है&#8221;। काफ़िरों (गैर-मुसलमानों) के लिए अपमानित करने वाली यातना है।&#8221; (2:89-90)<br />
3. &#8221;जो काफ़िर हैं, जालिम वही हैं&#8221;। (2:254)<br />
4. &#8221;हे ईमानवालो! उन काफ़िरों से लड़ो जो तुम्हारे आस-पास हैं और चाहिए कि वे तुम में सख्ती पाएँ।&#8221; (9:123)<br />
5. &#8221;किताब वाले&#8221; (यहूदी-ईसाई) जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं और न अन्तिम दिन पर और न उसे &#8216;हराम&#8217; करते हैं जिसे अल्लाह और उसके &#8216;रसूल&#8217; ने हराम ठहराया है और सच्चे &#8216;दीन&#8217; को अपना दीन बनाते हैं उनसे लड़ो यहाँ तक कि वे अप्रतिष्ठित होकर अपने हाथ से ज़िज़िया देने लगें।&#8221; (9:29)<br />
क्योंकि यह लूट ही थी कि जिसके परिणामस्वरूप इस्लाम का प्रसार हुआ, यहाँ तक कि जिन चीज़ों को स्वयं पैगम्बर ने पवित्र घोषित किया, उनकी मान्यता समाप्त हो गई, जब वे बातें उन्हें असुविधाजनक लगीं। उदाहरण के लिए<br />
&#8221;जब हराम (पवित्र) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ-कहीं पाओ कत्ल करो और उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और &#8216;नमाज&#8217; कायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो।&#8221; (9:5)<br />
&#8221;क्या तुम ऐसे लोगों से नहीं लड़ोगे जिन्होंने अपनी कसमों को तोड़ा और &#8216;रसूल&#8217; को निकाल देने की फिक्र की और उन्होंने ही तुमसे पहले छेड़ भी की। क्या तुम उनसे डरते हो? यदि तुम &#8216;ईमान&#8217; वाले हो तो अल्लाह इस बात का ज्यादा हकदार है कि उससे डरो। उनसे लड़ो! अल्लाह तुम्हारे हाथों उन्हें यातना देगा, और उन्हें रुसवा करेगा और उनके मुकाबले में तुम्हारी सहायता करेगा और &#8216;ईमान&#8217; वाले लोगों के दिल ठण्डे करेगा&#8221; (9:13-14)<br />
&#8221;हे नबी! &#8216;ईमानवालों&#8217; को लड़ाई पर उतारो। यदि तुम में बीस जमे रहने वाले होंगे तो वे दो सौ पर प्रभुत्व प्राप्त करेंगे। और यदि तुम में सौ हों तो वे एक हजार काफ़िरों पर भारी रहेंगे।&#8221; (8:65)</p>
<p>इस बात की सच्चाई की पुष्टि निम्नलिखित हदीस से होती है<br />
&#8221;मुझे (काफ़िरों) लोगों से तब तक युद्ध करने की आज्ञा दी गई है जब तक कि वे यह स्वीकार न करें कि अल्लाह के सिवा अन्य कोई पूज्य नहीं है और (मुहम्मद) को अल्लाह का पैगम्बर न माने; और जब वे ऐसा कर लें तो उनका जीवन परिवार (सहित) और सम्पत्ति की मेरी ओर से सुरक्षा की गारंटी है, इसके अलावा जो भी कानूनन सही हो&#8221;। (सहीद मुस्लिम खंड 1 : 31 पृ. 20-21)</em></p>
<p>इन उध्दरणों और उदाहरणों से यह सिध्द होता है कि इस्लाम का मूल ग्रंथ कुरआन ही आस्था के आधार पर हिंसा का समर्थन करता है। आस्था के आधार पर हिंसा के इतने खुले समर्थन को नजरअंदाज किया जाना कठिन है। इसे आप केवल कुछेक विकृतियां कहकर नहीं टाल सकते। इसलिए सवाल यही है कि क्या इस्लाम के व्याख्याता और सेकुलरवाद के पैरोकार इस्लाम की इन सैध्दांतिक विडंबनाओं पर विचार करने के लिए तैयार हैं?</p>
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		<title>महिला आरक्षण और महिलाओं का हित</title>
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		<pubDate>Mon, 08 Mar 2010 09:00:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>bhartiyapaksha</dc:creator>
				<category><![CDATA[सम सामयिक]]></category>
		<category><![CDATA[Woman Reservation]]></category>

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		<description><![CDATA[तो आज महिला दिवस है और आज अपना देश कथित तौर पर एक इतिहास रचने वाला है। महिला आरक्षण विधेयक के पारित होने की पूरी संभावना है। इस आरक्षण से उन्हें राजनीतिक क्षेत्र में यानी कि संसद में 33 प्रतिशत का आरक्षण प्राप्त हो जाएगा। इसे एक ऐतिहासिक कदम के रूप में प्रचारित किया जा [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=bhartiyapaksha.wordpress.com&amp;blog=8396167&amp;post=97&amp;subd=bhartiyapaksha&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>तो आज महिला दिवस है और आज अपना देश कथित तौर पर एक इतिहास रचने वाला है। महिला आरक्षण विधेयक के पारित होने की पूरी संभावना है। इस आरक्षण से उन्हें राजनीतिक क्षेत्र में यानी कि संसद में 33 प्रतिशत का आरक्षण प्राप्त हो जाएगा। इसे एक ऐतिहासिक कदम के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। कुछ लोग इसे महिलाओं के लिए एक महान उपलब्धि सिध्द करने में जुटे हुए हैं। देश के नवबौध्दिक वर्ग का मानना है कि इससे महिलाओं को महान फायदा होने वाला है और वर्षों से वे पुरूषों की जिस गुलामी को सहन करने के लिए विवश थीं, उससे अब वे आजाद हो जाएंगी। देखना यह है कि क्या वास्तव में ऐसा कुछ हो पाएगा? क्या वास्तव में पहले वे किसी प्रकार की गुलामी में थीं और क्या वास्तव में इस विधेयक से उनकी गुलामी समाप्त हो जाएगी और उनके विकास का रास्ता खुल जाएगा?</p>
<p>इन सवालों पर विचार करने से पहले मैं कुछ दिनों पहले आई एक खबर को सामने रखना चाहूंगा। कुछ दिनों पहले राष्ट्रीय दैनिक हिन्दुस्तान के मुखपृष्ठ पर खबर छपी कि भारतीय रेलवे ने कुली की नौकरी के लिए आवेदन मंगवाए थे। रेलवे ने महिलाओं से भी आवेदन मंगवाए थे ताकि महिला कूलियों की भी नियुक्ति की जा सके, लेकिन रेलवे को तब काफी निराशा हाथ लगी जब एक भी महिला ने आवेदन नहीं किया। इस खबर पर हिन्दुस्तान के संवाददाता ने लिखा था कि रेलवे को बड़ी आशा थी कि जिस प्रकार महिलाओं ने अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है और बेहतर प्रदर्शन किया है, उसी प्रकार कुली बनने के लिए भी वे आगे आएंगी। परंतु ऐसा नहीं हो पाया और एक भी महिला ने आवेदन नहीं किया। ऐसी कई खबरें जब-तब हम पहले भी पढ़ते रहे हैं। जैसे कि देश की पहली महिला ऑटो चालक, देश की पहली महिला ट्रक ड्राइवर आदि आदि। इससे पता चलता है कि हमारे देश के नवबौध्दिक लोग महिलाओं के बारे में कितनी ऊँची सोच रखते हैं। उनके ऑटो चालक, ट्रक चालक या कूली बनने को वे एक उपलब्धि मानते हैं और मानते हैं कि इससे उनका विकास हो रहा है। अभी मैं यहाँ पर सौंदर्य प्रतियोगिताओं की चर्चा नहीं कर रहा। वह तो एक अलग और बड़ा ही विशाल मुद्दा है।<br />
बहरहाल, इन खबरों को सामने रखने का मेरा उद्देश्य यह बतलाना है कि महिलाओं के विकास की बात करने से पहले उनकी समस्याओं को ठीक से जानने-समझने की आवश्यकता है। महिलाओं की समस्याओं पर विचार करते समय यह ध्यान रखने की भी आवश्यकता है कि <strong>भारत में भारतीय मूल के पंथावलंबी महिलाओं की स्थिति खराब होते हुए भी उसकी स्थिति व समस्याएं यूरोप, अमेरिका व अरब आदि देशों की ईसाई व मुस्लिम महिलाओं की स्थिति व समस्याएं नितांत ही भिन्न हैं। इसलिए यूरोप में जन्मे और विकसित हुए नारीवादी आंदोलन की नकल करके भारत की महिलाओं की स्थिति में सुधार करना चाहेंगे तो उन्हें कूली व ऑटो चालक बनाने या फिर अधिक से अधिक विश्व सूंदरी आदि बनाने में ही खुशी व गर्व का अनुभव करेंगे और कुल मिला कर महिलाओं की आर्थिक रूप से सक्षम होने तक ही सीमित रह जाएंगे। </strong>यूरोप व अमेरिका में महिलाओं को सबसे पहले तो अपने अस्तित्व की ही लड़ाई लड़नी पड़ी थी, क्योंकि लंबे समय तक चर्च यह मानने के लिए तैयार ही नहीं था कि उनमें भी आत्मा होती है। चर्च ने लंबे समय तक पाप का कारण और आत्माविहीन बता कर महिलाओं को उनके वास्तविक सम्मान व अधिकारों से वंचित ही नहीं रखा, बल्कि उन पर अमानवीय अत्याचार भी किए। परंतु भारत में ऐसी स्थिति कभी नहीं रही। इसलिए भारत में महिलाओं की समस्याएं यूरोप की महिलाओं की समस्याओं से काफी अलग हैं।</p>
<p>इसलिए <strong>सवाल यह नहीं है कि महिलाएं नौकरी करती हैं या नहीं, सवाल यह भी नहीं है कि उनकी राजनीतिक सहभागिता कितनी है, सवाल यह है कि समाज में उनकी स्थिति क्या है। </strong>कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों में कई महिला नेता हैं और प्रमुख भूमिकाओं में हैं। परंतु जब उनके बारे में चर्चा की जाती है तो उनके अपने दल के लोग ही उनके बारे में जो टिप्पणियां या फिर चर्चा करते हैं, यहां लिखा नहीं जा सकता परंतु उसे सुनने के बाद कोई भी समझ सकता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है। सोचने की बात यह है कि राजनीतिक दलों में आम महिला कार्यकर्ताओं की आज जो स्थिति है, वह क्या आरक्षण के अभाव के कारण है? आखिर देश की राजधानी दिल्ली में तो महिलाएं काफी जागरूक, शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, फिर इसी दिल्ली में महिलाओं के प्रति इतने अधिक अपराध क्यों हो रहे हैं? सोचने की बात यह है कि जहाँ-जहाँ महिलाएं जागरूक, शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती जा रहीं हैं, वहीं-वहीं उनके प्रति अपराध भी क्यों बढ़ रहे हैं? सीधी सी बात है कि जागरूकता, शिक्षा और स्वावलंबन आदि का अपना महत्व है लेकिन यदि वास्तव में महिलाओं की समस्या दूर करनी है तो उनके प्रति अपनी सोच को हमें बदलना होगा। समाज में स्त्री-पुरूष के बीच में जो सामंजस्य इस देश के ऋषियों ने स्थापित किया था, उसे पुन: स्थापित करना होगा। यह समझना होगा कि <strong>समानता का अर्थ पुरूष व महिला कूलियों की नियुक्ति नहीं है। माँ और पत्नी से समान व्यवहार करने का अर्थ यह नहीं होता कि पत्नी के साथ जो व्यवहार हम करते हैं, वही माँ के साथ भी कर सकते हैं। समानता का अर्थ प्रसंग के अनुसार ही लगाया जाना चाहिए। इसलिए यदि महिलाओं को हम समान स्थान देना चाहते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं है कि उन्हें संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देने से ही वह संभव होगा। उन्हें समान स्थान देने का अर्थ है कि हमारे घरों में रहने वाली महिलाओं को हम आदर व स्नेह देना सीखें। उनके गुणों व प्रतिभा को सम्मान देने व उभारने का प्रयास करें। नेतृत्व केवल राजनीति  में ही नहीं किया जाता, एक परिवार का सफल संचालन भी नेतृत्व के गुणों के अंदर ही आता है। अपनी संतानों को सुयोग्य व संस्कारित बनाना भी देश व समाज की सेवा ही है। परिवार में महिलाओं की स्थिति को सम्मानित व मजबूत बनाने से ही महिलाओं की समस्याओं का समाधान संभव है</strong>, अन्यथा 33 नहीं 100 प्रतिशत आरक्षण के बाद भी महिलाएं अपराध व अत्याचार का शिकार बनती ही रहेंगी। </p>
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