Bhartiyapaksha's Blog

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  • अपने बारे में क्या कहूँ। यदि जानता होता तो यह सब कहने और सुनने की आवश्यकता ही नहीं होती। फिर भी जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों का उल्लेख किया जा सकता है।

    मूलतः झारखंड के धनबाद शहर का निवासी हूँ। रसायन शास्त्र से बीएससी ऑनर्स किया है। भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। गाँधियन थॉट में स्नातकोत्तर कर रहा हूँ। 1992 में राम मंदिर आंदोलन में सार्वजनिक जीवन से परिचय हुआ। 1994 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से परिचय हुआ और 1995 से 2002 तक झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में संघ का प्रचारक रहा।

    इसी बीच स्वामी जगदीश्वरानंद सरस्वती के मार्गदर्शन में उनके शिष्य आचार्य परमदेव मीमांसक के सान्निध्य में सांगोपोग वेदविद्यापीठ गुरूकुल में कुछ मास संस्कृत का भी अध्ययन किया। 2002 से पत्रकारिता शुरू की। पांचजन्य, हिन्दुस्थान समाचार, भारतीय पक्ष, एकता चक्र, द कंप्लीट विजन, उदय इंडिया विभिन्न आदि पत्र-पत्रिकाओं में काम किया। इसी दौरान पंचवटी फाउंडेशन के साथ जुड़ कर गाय के आर्थिक, वैज्ञानिक, पर्यावरणीय आदि विभिन्न आयामों पर पाँच खंडों के शोध ग्रंथ का संकलन व संपादन किया। फाउंडेशन के साथ ही भारत की परंपरागत कृषि जो आज जैविक कृषि के रूप में जानी जाती है, पर भी शोध किया।

    माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल की एक शोध परियोजना के तहत राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर एक पुस्तक लिखी है। पुस्तक विश्वविद्यालय द्वारा ही प्रकाशित की गई है।

    संप्रति स्वतंत्र पत्रकार हूँ और भारतीय धरोहर पत्रिका से जुड़ा हुआ हूँ। राजनीति और समाजशास्त्र के साथ-साथ विज्ञान, धर्म, संस्कृति, दर्शन, योग और अध्यात्म के विषयों में गहरी रूचि और पकड़ है। इनके अतिरिक्त समसामयिक विषयों पर भी निरंतर लेखन करता रहता हूँ।

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साहित्यविकारों की वैचित्र्य संहिता

Posted by bhartiyapaksha on अक्टूबर 28, 2015

साहित्यविकारों का पुरस्कार वापसी अभियान चल रहा है। इसमें दुर्भाग्यवश कुछ साहित्यकार भी शामिल हो गए हैं। इन्हें अचानक देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ती दिखने लगी है। उत्तर प्रदेश के दादरी के एक गांव में किसी दूसरे की बछिया को चुरा कर मार कर खा जाने वाले एक मुसलमान व्यक्ति अखलाक की हत्या से आज के इन साहित्यविकारों का उसी प्रकार हृदय द्रवित हो गया जैसा कि एक बहेलिये द्वारा मैथुनरत क्रौंच पक्षी के वध को देख कर वाल्मिकी का द्रवित हो गया था। यह अलग बात है कि वाल्मिकी की संवेदना से हमें रामायण मिली जो पूरे विश्व की धरोहर बनी। इन साहित्यविकारों के मानसिक उद्वेलन से हमें वे पुरस्कार मिले जो इन्होंने हड़पे हुए थे। जैसे याज्ञवल्क्य के उगले हुए ज्ञान को कुछ लोगों ने तीतर बन कर चुग लिया और उसका उपदेश किया तो वह तैत्तिरीय संहिता कहलाई, वैसे ही इन साहित्यविकारों के उगले हुए पुरस्कारों और उलटी किए हुए विचारों को यदि चुग कर फिर से कह दिया जाए तो वह भी कलियुग की एक वैचित्र्य संहिता तो बन ही जाएगी। तो यहां प्रस्तुत है साहित्यविकारों की वैचित्र्य संहिता।

इस वैचित्र्य संहिता में दो पर्व हैं। पहला पर्व है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का और दूसरा पर्व है सांप्रदायिकता का। यदि हम पहले पर्व की चर्चा करें तो सवाल उठता है कि क्या वाकई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देश में घट गई है? आखिर उदय प्रकाश या अशोक वाजपेयी या किसी और साहित्यकार की कौन सी रचना प्रतिबंधित की गई है या फिर उनके किस लेखन पर किसी सरकार ने कोई आपत्ति की है? इसका विवरण उन्होंने अभी तक तो नहीं दिया है। इसके विपरीत, तस्लीमा नसरीन और सलमान रश्दी को भारत न आने देने के सांप्रदायिक प्रयासों को ये अपनी मौन स्वीकृति ही देते रहे हैं। जयपुर लिट्रेचर फेस्टीवल में जब सलमान रश्दी को आने से रोका गया था तब इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में क्यों नहीं प्रतीत हुई थी? ऐसे और भी ढेरों उदाहरण हैं जब इन्होंने अभिव्यक्ति का गला घोंटा जाना न केवल स्वीकार किया था, बल्कि उसकी प्रशंसा भी की थी। जैसे कि फ्रांस की पत्रिका शार्ली हेब्दो द्वारा कार्टून प्रकाशित किए जाने पर इनके दोहरे चरित्र का पर्दाफाश हो गया था।

एक सवाल इनके द्वारा की जाने वाली अभिव्यक्ति का भी है। जिस प्रकार की काव्य और साहित्यिक अभिव्यक्ति ये करते रहे हैं, उसे भारतीय मानस तो पहले से ही खारिज किए बैठा है। इनके काव्य में न तो कोई रस है, न कोई छंद है, न कोई स्वर है। गद्य रूपी शैली में अपने मन की भड़ास को निकाल दिया गया है। वह भड़ास इतना विद्रुप है कि उसे पढ़ने से मन में जुगुप्सा ही पैदा होती है। कई कविताएं तो पढ़ने से पता ही नहीं चलता है कि कविता पढ़ रहे हैं या अखबार। समाचार वाचन की कोई नई विधा जैसी प्रतीत होती हैं इनकी कविताएं। कहानियां अत्यंत ही विद्रुप चित्रण करने वाली समाज के यथार्थ से कोसों दूर या फिर व्रणमिच्छन्तिमच्छिका की भांति केवल समाज के नग्नता का प्रदर्शन करने वाली। ऐसा साहित्य जिससे न कोई प्रेरणा मिलती है और न ही कोई आदर्श गढ़ा जा सकता है।

यही कारण है कि यदि हम दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे कुछ राजनीतिक विश्वविद्यालयों के राजनीतिक वादों से प्रेरित वर्ग को छोड़ दें तो इनके लिखे को देश का कोई व्यक्ति पढ़ता भी नहीं है। यही कारण है कि 125 करोड़ के देश में इनका लिखा साहित्य कठिनाई से 12-13 हजार लोग भी नहीं पढ़ते। यदि किसी की लिखी कोई पुस्तक की 2-4 हजार प्रतियां भी बिक जाएं तो ये खुशी से झूम उठते हैं। ऐसे में विचार करने की बात यह है कि आखिर ये लिख किसके लिए रहे हैं? इस देश का सामान्य जन तो इस साहित्य से पूरी तरह कटा हुआ ही है।

दूसरी बात यह है कि इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की इतनी ही चिंता है तो इन्होंने स्वयं दूसरे विचारधारा के साहित्यकारों को कितना मौका दिया? देखा जाए तो पिछले 60-65 वर्षों से इन्होंने एक प्रकार का वैचारिक तालिबानीकरण किया हुआ था। देशभक्ति, राष्ट्रवाद और भक्ति काव्य इनके लिए सर्वथा त्याज्य थे। इन पर कविता करने वाले इनकी भाषा में कवि या साहित्यकार हो ही नहीं सकते। राष्ट्रवाद या देशभक्ति की बात करने वालों को इन्होंने साहित्यनिकाला दिया हुआ था। यही कारण है कि कमलकिशोर गोयनका जैसे साहित्यकार उपेक्षित रहे। लगभग सौ उपन्यास लिखने वाले वैद्य गुरूदत्त पर साहित्य अकादमी ने कोई काम नहीं किया। रामायण और महाभारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने वाले नरेंद्र कोहली के साथ ये मंच साझा करने के लिए तैयार नहीं। ऐसे और भी ढेर सारे नाम हैं जिनके साथ इन्होंने तालिबानी व्यवहार किया है।

नफरत इनके अंदर कितनी कूट-कूट कर भरी रहती है, यह समझने के लिए एक साहित्यविकार विजय तेंडुलकर का उदाहरण दिया जा सकता है। एक बार एक विद्यालय में एक विद्यार्थी ने विजय तेंडुलकर को पूछा कि अगर नरेंद्र मोदी से उनकी भेंट हो जाए तो वे क्या करेंगे? तेंडुलकर का त्वरित और अविचारित उत्तर था कि वे मोदी को गोली मार देंगे। हालांकि फिर उन्हें ध्यान आया कि वे अपनी नग्नता एक मासूम छात्र के समक्ष प्रकट कर रहे हैं तो उन्होंने फिर बात संभालते हुए कहा कि वे मोदी की उपेक्षा करेंगे। यह एक उदाहरण पर्याप्त है इन साहित्यविकारों के अंदर छिपे तालिबान को समझने के लिए।

वैचित्र्य संहिता का दूसरा पर्व है सांप्रदायिक सहिष्णुता और हिंसा का। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की भानजी नयनतारा सहगल के अनुसार दादरी घटना से देश में इतना सांप्रदायिक माहौल बन गया है कि उन्हें अपना सम्मान लौटाना पड़ा। इस दर्द में कृष्णा सोबती, साराह जोसफ, उर्दू साहित्यकार रहमान अब्बास, पंजाब के गुरबचन भुल्लर, अजमेर सिंह औलख, आत्मजीत आदि ने साहित्य अकादमी सम्मान वापस कर दिया। सही बात है यदि देश में सांप्रदायिक सद्भाव नहीं रहेगा तो क्या करेंगे ये सम्मान लेकर? कोई भी समझदार व्यक्ति एक असहिष्णु और असभ्य समाज से सम्मान कैसे ले सकता है? परंतु देखने की बात यह है कि इन्हें क्या वाकई सांप्रदायिक सद्भाव की चिंता है या कुछ और ही बात है?

अधिक दिन नहीं हुए हैं, जब उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार आई थी और वहां एकाएक दंगों की झड़ी लग गई थी। हर छोटी बात पर दंगे हो रहे थे। सौ के लगभग दंगे हुए। फिर एक बड़ा दंगा भी हुआ। मुजफ्फरनगर का दंगा। काफी बड़ा दंगा था। बड़ी संख्या में लोग मारे गए, विस्थापित भी हुए। परंतु इन साहित्यविकारों के लिए देश का सांप्रदायिक सद्भाव कायम रहा। फिर एक और दंगा हुआ असम में। जी हां, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के संसदीय क्षेत्र वाले असम में। उसमें और भी अधिक लोग मारे गए। परंतु सांप्रदायिक सद्भाव नहीं बिगड़ा। केवल 8-10 हजार लोग ही तो विस्थापित हुए थे उस दंगे में। परंतु दादरी में एक गायचोर के मारे जाने पर एकदम से सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ गया। एक आदमी मारा गया था भई। नयनतारा जी के नयन भर उठे। सम्मान भारी लगने लगा।

देखा जाए तो ये नयनतारा जी को साहित्य जगत में कोई ठीक से जानता भी नहीं है। लोगबाग ये न पूछ बैठें कि कौन नयनतारा, इसलिए पहले ही बता दिया गया कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल को भानजी। अब जिसे पहचाना ही किसी परिवार के कारण जा रहा हो, उसका समाज और साहित्य में कितना प्रभाव रहा होगा, यह समझने वाली बात है। अशोक वाजपेयी भी साहित्यकार तो नहीं ही हैं। वे साहित्य प्रबंधक तो कहे जा सकते हैं। अपनी राजनीतिक संपर्कों और आईएएस लॉबी का लाभ उठाकर वे साहित्य जगत में हस्तक्षेप अवश्य करते रहे हैं। परंतु जनता तो उनके लिखे साहित्य से अनभिज्ञ ही है।

अब कोई इनसे यह पूछे कि क्या देश में संप्रदाय के नाम पर एक ही संप्रदाय है जिसके हितों के लिए ये चिंतित हैं? इस्लाम के अलावा और किसी संप्रदाय को ये संप्रदाय मानते हैं या नहीं और उनके हितों का संरक्षण इनकी रूचि का विषय है या नहीं? पूछने की भी कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। आप घटनाओं को सामने रख लीजिये, सब समझ में आ जाएगा। दादरी में अखलाक के मारे जाने के कुछ ही दिनों बाद कर्नाटक में प्रशांत पुजारी की हत्या कर दी गई। परंतु क्या किसी ने उसकी खबर भी कहीं सुनी? प्रशांत पुजारी की हत्या के गवाह वामन पुजारी की भी हत्या कर दी गई। परंतु ये हत्याएं सेकुलर हत्याएं थीं। इन हत्याओं पर सेकुलरों की संवेदनाएं नहीं जागतीं। उनकी संवेदनाओं को जगाने के लिए आपको मुसलमान होना पड़ता है। यानी हत्या हत्या में भी फर्क है। फर्क हो न हो, परंतु किया जा रहा है। खून का रंग एक है, बतलाने वाले एकाएक खून का रंग देखने लगे हैं।

तो सांप्रदायिक कौन हुआ? ये सम्मान लौटाने वाले अधिक सांप्रदायिक हुए या नहीं हुए? देश का सांप्रदायिक सद्भाव इन्होंने ही बिगाड़ा है। नयनतारा सहगल के बारे में तो यह भी पता चल चुका है कि 1984 में सिखों के हत्यारों को ये अपने घरों में छिपाती थीं। इन्हें सांप्रदायिक हिंसा से परेशानी नहीं है, इन्हें परेशानी है अपने राजनीतिक आकाओं की राजनीति चमकाने से। उन्हें राजनीतिक मुद्दा प्रदान करने से। सम्मान तो इन्हें पता है कि वैसे भी इनका कोई नहीं करता। स्वयं ही मंच सजाते हैं, स्वयं ही कुर्सियों पर बैठते हैं और स्वयं ही तालियां भी बजाते हैं।

अंतिम बात रह जाती है कलबुर्गी और दाभोलकर जैसों की हत्या की। साहित्यकारों की हत्या हुई। परंतु दाभोलकर तो साहित्यकार थे नहीं। राजनीतिक या सामाजिक व्यक्ति थे। ऐसी तो अनेक हत्याएं देश में होती रहती हैं। उन हत्याओं पर ये हजार चौरासी की माँ जैसे महान उपन्यास की रचना कर देते हैं। वे हत्यारे इनके लिए क्रांतिकारी और महान लोग होते हैं। मतलब साफ है कि इन्हें हत्याओं या हिंसा की भी चिंता नहीं है। इन्हें चिंता है अपने खेमे की। अपने वैचारिक खोखलेपन के उजागर हो जाने की। अपने वैचारिक तानाशाही के गिरते-ढहते दूर्ग की। इस अर्थ में ये कोई साहित्यकार दिखते भी नहीं हैं, पूरे राजनीति लोग दिखते हैं। इनका सच भी यही है। यही है इनकी वैचित्र्य संहिता।

इति शम्।।

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तकनीक का पर्याय नहीं है मशीनीकरण

Posted by bhartiyapaksha on मार्च 11, 2015

उन्नत तकनीक की बात करते ही हमारे ध्यान में बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाएं और मशीनें आती हैं। यदि खेती में उन्नत तकनीक की बात करें तो ट्रैक्टरों, ट्यूबवेलों और रासायनिक खादों व कीटनाशकों का चित्र दिमाग में उभरता है। खेती में उन्नत तकनीक के प्रयोग का आज एकमात्र अर्थ रह गया है खेती का मशीनीकरण व रासायनीकरण करना। विचार किया जाए तो तकनीक का अर्थ मशीन नहीं होता है। तकनीक बिना मशीन के भी हो सकती है। तकनीक के इस पक्ष को ध्यान में रखें तो ध्यान में आता है कि हमने खेती की तकनीक को उन्नत बनाने के न्यूनतम प्रयास किए हैं। या फिर जो प्रयास किए गए हैं, वे जमीन तक किसानों के पास नहीं पहुंचाए गए हैं।

तकनीक का पहला लक्ष्य होता है कार्य को सरल और लाभकारी बनाना। ट्रैक्टरों और रासायनिक खादों ने कृषि को जटिल, खर्टीला और घाटे का सौदा बना दिया है। हो सकता है कि अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में जहां कि जमीन बहुतायत में उपलब्ध है और जहां मौसम केवल दो होते हैं, ये कुछ लाभकारी साबित हुए हों, परंतु भारत में इन्होंने खेती और किसानों का विनाश ही किया है। रासायनिक खादों के कारण पंजाब जैसे उपजाऊ प्रदेश की उत्पादकता में बड़े पैमाने में ह्रास आया है। जाब्नेर कृषि विश्वविद्यालय के मृदा वैज्ञानिक प्रोफेसर श्रीराम शर्मा बताते हैं कि डीएपी और यूरिया जैसे रासायनिक खादों का केवल 25-30 प्रतिशत भाग ही पौधों के काम आता है, शेष 70-75 प्रतिशत वहीं जमीन में अनुपयोगी रूप में पड़ा रहता है। खेतों में प्रत्येक वर्ष डीएपी डालते रहने से उसमें इस अनुपयोगी हिस्से की मात्रा बढ़ती रहती है और यह खेत की मिट्टी को सख्त बनाता रहता है। परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में खेत की मिट्टी इतनी सख्त हो जाती है कि उसमें पानी अंदर नहीं रिस पाता और पानी नहीं टिक पाने के कारण दिनों दिन उसमें कार्बनिक पदार्थ भी घटने लगते हैं। इससे मिट्टी की उत्पादकता घटने लगती है। 41_20130315

देश में रासायनिक खादों की खपत के आंकड़ें यदि देखें तो पता चलता है कि वर्षानुवर्ष प्रति हेक्टेयर इसमें बढ़ोत्तरी होती जा रही है। यह बात तो एक सामान्य किसान भी बता देता है कि प्रत्येक वर्ष यूरिया व डीएपी की मात्रा बढ़ानी होती है अन्यथा खेतों की उत्पादकता घटने लगती है। साथ ही खेतों को सामान्य से अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है। यह अतिरिक्त पानी वर्षा से तो नहीं मिल सकता। इसके लिए ट्यूबवेल और ट्यूबवेल के लिए बिजली की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार जो खेती पहले बिना किसी पूंजी के सरलता से हो जाती थी, अब काफी खर्चीली और मंहगी होती जा रही है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने एक भाषण में कहा कि किसानों की लागत का एक बड़ा हिस्सा पानी पर खर्च होता है। पानी की लागत बुनियादी तौर पर बिजली की लागत के कारण है। सरकारें चाहे जितने कम दर में बिजली दें, वह भी किसानों की लागत तो बढ़ाती हैं। ट्यूबवेल लगवाने और उसके रख-रखाव का खर्च तो अलग से है ही।

रासायनिक खादों विशेषकर यूरिया का एक बड़ा दुष्प्रभाव खेतों में उपस्थित और खेती के मित्र सूक्ष्म कीटों पर पड़ता है। यूरिया उनके लिए विष का काम करता है और यूरिया तथा उसके कारण उत्पन्न शुष्कता का मिश्रित परिणाम यह होता है कि खेतों में से केंचुएं और माइक्रो ऑर्गेनिज्म यानी कि सूक्ष्म कीटाणु समाप्त हो जाते हैं। ये माइक्रो ऑर्गेनिज्म ही जमीन में विभिन्न पोषक पदार्थ पौधों को उपलब्ध कराते हैं जो यूरिया व डीएपी नहीं करा सकते। साथ ही केंचुओं के समाप्त हो जाने से जमीन की स्वाभाविक उर्वरता भी समाप्त हो जाती है।

रासायनिक खादों विशेषकर यूरिया की एक और समस्या है जिस ओर सरकार का ध्यान नहीं गया है। यूरिया शुद्ध रूप से नाइट्रोजन है। खेतों में यूरिया के प्रयोग से पौधों को उनकी आवश्यकता से अधिक नाइट्रोजन मिल जाता है। पौधों में पहुंचा यह अतिरिक्त नाइट्रोजन कीटों को आकर्षित करता है। इस प्रकार फसल तो अधिक होती है परंतु वह कीटों के चपेट में आ जाती है। फसल को कीटों से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग अनिवार्य हो जाता है। रासायनिक कीटनाशक भी खेती की लागत को अच्छा-खासा बढ़ा देते हैं। साथ ही इन कीटनाशकों के जहरीलेपन के कारण उत्पादित फसल भी मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाती है। पंजाब में इसका दुष्प्रभाव साफ देखा जा सकता है जहां कैंसर जैसी घातक बीमारी काफी बड़े पैमाने पर फैल गई है।

इस प्रकार यदि पूरा अर्थशास्त्र देखा जाए और किसान द्वारा किया जाने वाला व्यय और सरकार द्वारा दिए जाने वाले अनुदानों व कर्जमाफी को जोड़ा जाए तो आधुनिक कृषि तकनीकें एक बहुत ही मंहगा सौदा साबित होंगी। लाख करोड़ रूपयों का तो केवल खादों पर अनुदान दिया जा रहा है। बिजली पर अनुदान, ट्रैक्टरों व ट्यूबवेलों पर अनुदान आदि को जोड़ लिया जाए तो यह राशि खतरनाक रूप से बड़ी हो जाएगी। इतनी मंहगी कीमतों पर हमें जो प्राप्त हो रहा है, वह फसल भी मानव स्वास्थ्य के लिए लाभकारी नहीं होती। साथ ही जो किसान देश का अन्नदाता हुआ करता था, वह अब कर्ज में डूब कर आत्महत्या करने को विवश है या फिर सरकार की दया पर जीवनयापन करने को मजबूर। अंग्रेजों के देश में आने और लूट मचाने से पहले यही किसान राज्यों की आय के प्रमुख स्रोत हुआ करते थे। अंग्रेजों ने इन्हें लूट-लूट कर ही इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति कर ली। परंतु समृद्धि के प्रतीक वही किसान आज सर्वाधिक दयनीय हालत में हैं और खेती सबसे अधिक घाटे का व्यवसाय बनती जा रही है। यह सब कुछ हुआ है तकनीक का गलत अर्थ निकाले जाने के कारण।

तो क्या हम यह मान लें कि खेती में हमें तकनीक की कोई आवश्यकता ही नहीं है? क्या खेती को आदिम काल के पिछड़े तरीकों से ही करना होगा? तो फिर खेती की उत्पादकता कैसे बढ़ेगी? कैसे पूरे देश का पेट भरा जाएगा? कहां से आएगा इतना अनाज यदि हम रासायनिक खादों, ट्रैक्टरों, ट्यूबवेलों, हाइब्रिड बीजों आदि की उन्नत तकनीक को अलविदा कह देंगे? क्या हम फिर से देश में भुखमरी लाना चाहते हैं? इन सवालों का उत्तर हमें मिल सकता है यदि हम थोड़ा सा इतिहास का अध्ययन कर लें। यह एक इतिहास है कि देश में अंग्रेजों के आने से पहले अकाल का कोई खास विवरण नहीं पाया जाता। मुसलमानों के आने से पहले तो अकाल का विवरण हजारों सालों में कोई एकाध बार मिलता है। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि अंग्रेजों के आने के मात्र पचास-सौ वर्षों में ही देश में कई बड़े अकाल पड़ गए? यह हुआ तो था अंग्रेजों द्वारा मचाए गए लूट के कारण परंतु अंग्रेजों ने इसका बहाना बना कर कृषि अनुसंधान की शुरूआत की। इस कृषि अनुसंधान का उनका उद्देश्य कृषि का विकास तो कतई नहीं था इसलिए उनका कृषि विभाग शुरूआती वर्षों में केवल लैंड रिकॉर्ड बनाने में व्यस्त रहा। आखिर उन्हें उससे राजस्व जो वसूलना था।

बाद में अंग्रेजों ने खेती की दशा सुधारने पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए डा. जॉन अगस्टस वोल्कर को लगा दिया गया। वोल्कर की रिपोर्ट आज उपलब्ध है। उस रिपोर्ट में भारतीय कृषि की तत्कालीन उन्नत दशा का पता चलता है। उदाहरण के लिए वर्ष 1832 में अंग्रेज कृषि विशेषज्ञों ने स्वीकार किया था कि भारतीय कृषि में बहुत सुधार की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए चावल की खेती में आने वाले हजार वर्षों में भी हम शायद ही कोई विकास करने की आवश्यकता पड़े। वोल्कर ने अपनी रिपोर्ट में कृषि उत्पादन का जो विवरण दिया है, वह कहीं से भी कमजोर नहीं कहा जा सकता। देश में सिंचाई की परंपरागत व्यवस्था पर भी इस रिपोर्ट में खासा प्रकाश डाला गया है। वोल्कर का सुझाव था कि सरकार सिंचाई के परंपरागत स्रोतों की देख-रेख में व्यय करे। किसानों को खाद के समुचित उपयोग करने के बारे में प्रशिक्षित करे। इतने से ही कृषि में काफी सुधार हो जाएगा। उल्लेखनीय बात है कि उस समय रासायनिक खादों का आविष्कार नहीं हुआ था।

बहरहाल, वोल्कर की रिपोर्ट से हमें भारतीय कृषि की स्थिति का पता चलता है। साथ ही अन्य इतिहासकारों ने भी भारतीय किसानों द्वारा प्रयोग की जाने वाल कृषि तकनीकों का वर्णन किया है। सेंटर फॉर पालिसी स्टडीज, नई दिल्ली के निदेशक डा. जितेंद्र बजाज बताते हैं कि अकबर के काल में किसानों को नमक पानी से बीजोपचार करने की विधि पता थी और वे उसका प्रयोग भी किया करते थे। खेतों में कम्पोस्ट खाद डालने की विधि तो बहुप्रचलित थी ही। इतिहास के इन तथ्यों के आलोक में हम भारतीय कृषि के लिए आधुनिक तकनीकों का खुलासा कर सकते हैं। ये तकनीकें न केवल निःशुल्क हैं, बल्कि ये बिना किसी अतिरिक्त लागत के कृषि की उत्पादकता बढ़ाती हैं और फसल की उच्च गुणवत्ता भी सुनिश्चित करती हैं।

पहली तकनीक है बीजोपचार। नमकीन पानी और गोमूत्र से बीजोपचार करना परंपरागत तकनीक रही है। आज इसके लिए ट्राइकोडर्मा वृडी जैसे और भी कई जैविक उपाय आ गए हैं। इनसे बीजों का उपचार करने के बाद बुवाई करने से फसल में कीट लगने की संभावना घट जाती है। बीजोपचार से बीजों की रोग व कीट प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। दुर्भाग्यवश आज के किसान बीजोपचार से अधिक परिचित नहीं हैं। इसके लिए केवल किसानों को उनकी परंपरागत तकनीक को स्मरण कराने की आवश्यकता है। साथ ही आधुनिक उपायों की जानकारी भी दिया जाना लाभदायक है।

vermicompostउन्नत कृषि तकनीकों में दूसरी तकनीक है कम्पोस्ट बनाने की। गोपालकों का देश होने के कारण देश में गोबर का कम्पोस्ट बनाने की विधि काफी पहले समय से प्रचलित रही है। रासायनिक खेती के प्रचलन के कारण देश में उसका ज्ञान घटा है। आज किसान गोबर को जमा करके बिना कम्पोस्ट बनाए खेतों में डाल देते हैं। इसमें गोबर कच्चा रह जाता है और इसके कारण खेतों में दीमक लगने की समस्या बढ़ जाती है। हैरत की बात यह है कि कम्पोस्ट बनाने की इंदौर पद्धति के जनक और दुनिया में जैविक खेती की शुरूआत करने वाले अल्फ्रेड हावर्ड ने भारत में ही यह तकनीक सीखी और विकसित की थी। आज कम्पोस्टिंग की उस विधि का काफी विस्तार हो गया है। वर्मी कम्पोस्ट यानी कि केंचुआ खाद, अमृत पानी जासी अनेक नई और अधिक प्रभावकारी तकनीकें आ गईं हैं। रासायनिक खादों पर अनुदान में दिए जाने वाले पैसे से सरकार किसानों को इन तकनीकों का प्रशिक्षण दे सकती है। इन तकनीकों में किसान को लागत कुछ भी नहीं लगती है और उसके खेतों की उर्वरता व उत्पादकता दोनों ही बढ़ती है। अमरावती, महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर ने इसका प्रयोग कर शून्य लागत खेती का प्रयोग किया है जो काफी सफल रहा है। उनकी तकनीक का उपयोग कर महाराष्ट्र, कर्नाटक व अन्य कई राज्यों के हजारों किसान अपने खेतों की पैदावार बिना किसी रसायनों और अतिरिक्त लागत के बढ़ाने में सफल हो रहे हैं।

Kamdhenu Bullock Driven Tractorउन्नत कृषि तकनीक का तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है बैलों की क्षमता बढाना। लंबे समय से बैल खेतों की जुताई और अन्यान्य कृषि कार्यों में योगदान करते रहे हैं। चाहे सिंचाई के लिए रहट से पानी निकालना हो या फिर कटाई उपरांत फसल का प्रसंस्करण, बैल किसानों के बड़े दोस्त रहे हैं। बैलों के उपयोग में एक बड़ा फायदा यह भी है कि इनका रखरखाव किसान स्वयं कर लेते हैं और इनका उपयोग सरल है। कमी केवल क्षमता की है। आवश्यकता इनकी क्षमता बढ़ाने की थी। परंतु कृषि वैज्ञानिकों ने बैलों की क्षमता बढ़ाने की बजाय उनका उपयोग समाप्त करने पर जोर दिया। इससे किसानों की बाजार पर निर्भरता बढ़ी और खेती मंहगी भी हो गई। बहरहाल, देश में बैलों की क्षमता संवर्धन पर भी कुछ काम हुआ है। उदाहरण के लिए कृषि इंजीनियरिंग संस्थान, भोपाल में जुताई के लिए दो पहियों का एक बैलचालित ट्रैक्टर विकसित किया गया है। वहां बैलों द्वारा चालित अनेक और भी यंत्र विकसित किए गए हैं जिनका खेती के अन्यान्य कार्यों में उपयोग किया जा सकता है। इन यंत्रों की सहायता से बैलों की क्षमता तीन गुनी बढ़ाई जा सकती है। आवश्यकता है इनका व्यावहारिक प्रयोग बढ़ाए जाने की।

हाइब्रिड व जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) बीज आधुनिक कृषि तकनीक का एक बड़ा आयाम हैं। परंतु इन बीजों के दुष्परिणामों पर या तो कहीं शोध नहीं हुआ है या फिर यदि कहीं शोध हुआ है तो उसे छिपाने-दबाने की पुरजोर कोशिशें की गई हैं। उदाहरण के लिए कपास में स्वाभाविक रूप से पाए जाने वाले कीटनिरोधक गॉसिपाल की मात्रा को बीटी कॉटन में काफी बढ़ा दिया गया। इससे कपास की फसल तो अच्छी हो जाती है परंतु उसके बिनौले की खली और तेल दोनों ही जहरीले हो गए। उस खली को खाने से पशु और तेल को खाने से मनुष्य बीमार पड़ने लगे। कपास की खली गाय-भैंस आदि पशुओं के लिए काफी फायदेमंद मानी जाती है। परंतु बीटी कॉटन की खली जहरीली होने के कारण पशुओं को नहीं खिलाई जा सकती। इसके अलावा संकर बीज हैं जो उपज तो अच्छी देते हैं, परंतु वे भी किसानों को बाजार पर निर्भर बनाते हैं। संकर बीजों की फसल से अगली फसल के लिए बीज नहीं बनाए जा सकते। वे हर बार खरीदने पड़ते हैं। इसकी बजाय यदि देसी बीजों को उपयोग में लाया जाए तो वे न केवल हर बार उपजाए जा सकते हैं, बल्कि उनका प्रबंधन भी कम खर्चीला होता है।

एक और कृषि तकनीक है फसल चक्र। अमेरिका और यूरोप में मौसम के कारण वर्ष में केवल कुछ महीने ही खेती हो पाती है और दो फसलें ही ली जा सकती हैं। परंतु भारत में बारह में से दस महीने खेती हो सकती है और तीन-तीन फसलें आराम से ली जाती हैं। इसलिए प्राचीन काल से भारत में फसल चक्र का पालन किया जाता था। फसल चक्र का अर्थ होता है एक फसल के बाद दूसरी ऐसी फसल लेना जिससे पहली फसल द्वारा जमीन से लिए गए पोषक पदार्थों की पूर्ति हो जाए। इसके पीछे सिद्धांत यह है कि हरेक फसल जमीन से कुछ पोषक पदार्थ लेती है और कुछ छोड़ती है। उदाहरण के लिए दलहन की फसलें खेतों में नाइट्रोजन पैदा कर देती हैं। इसलिए यदि वर्ष में एक बार दलहन की एक फसल ले ली जाए तो वर्ष भर के लिए खेतों में नाइट्रोजन की आवश्यकता पूरी हो जाती है। एक ही प्रकार की फसल यदि बार बार ली जाए तो इससे मिट्टी में से पोषक पदार्थों की कमी हो जाएगी और उत्पादन घटने लगेगा। फसल चक्र उत्पादन को बढ़ाने में सहायक है। फसल चक्र की ही तरह इंटर क्रोपिंग भी है यानी कि एक फसल के साथ दूसरी फसल भी लगाना। उदाहरण के लिए अरहर की फसल के साथ यदि बीच-बीच में सरसों भी बो दी जाए तो दोनों ही फसलें अच्छी होती हैं। इसी प्रकार अन्य फसलों के साथ भी कुछ खास फसलों को बोया जाता है। इससे दोनों ही फसलों का उत्पादन बढ़ जाता है।

इस प्रकार हम देखें तो खेती में तकनीक के प्रयोग का अर्थ केवल मशीनीकरण या रासायनीकरण नहीं है। मशीनों और रसायनों के बिना भी खेती में उन्नत तकनीकों का प्रयोग किया जा सकता है और उपज बढ़ाई जा सकती है। आवश्यकता है तो इसके व्यवस्थित प्रशिक्षण की।

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गांवों के बिना असंभव है विकास

Posted by bhartiyapaksha on जनवरी 6, 2015

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का मानना है कि शहरीकरण को एक समस्‍या के रूप नहीं बल्कि एक अवसर के रूप में मानना चाहिए। उन्होंने कहा है कि अगर हमें बेहतरी के लिए रोजगार जुटाने हैं और बदलाव लाना है तो हमें 100 स्‍मार्ट शहरों का निर्माण करने की योजना बनानी है। सवाल है कि इन स्मार्ट शहरों में क्या होगा? क्यों इन्हें स्मार्ट शहर कहा जाएगा? एक दैनिक समाचार पत्र ने इसकी जो रूपरेखा शहरी विकास व अन्य मंत्रालयों के सूत्रों के हवाले से प्रस्तुत की थी, उसमें शहरों की पारंपरिक कल्पना से हट कर कुछ भी नहीं था। उन शहरों में चमचमाती सड़कें और उस पर दौड़ती कारों का रेला होगा, बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल यानी कि बाजार केंद्र होंगे, चौबीसों घंटे बिजली होगी, पानी के नलके होंगे, टेलीविजन, वाशिंग मशीन, एसी, मोबाइल और ढेरों इलेक्ट्रानिक उपकरण होंगे, 4जी इंटरनेट होगा, मेट्रो ट्रेनें होंगी। यह सब कुछ तो होगा परंतु सवाल है कि क्या केवल इनसे व्यक्ति का जीवन चल सकता है? क्या सड़कें, बिजली, बाजार और इलेक्ट्रानिक उपकरण मनुष्य का पेट भर सकते हैं? सवाल यह भी है कि क्या ये शहर अपनी आवश्यकता के लिए बिजली का उत्पादन करने में समर्थ होंगे? क्या ये शहर अपनी आवश्यकता का भोजन और पानी अपने दम पर जुटा सकेंगे? इन सभी सवालों के जवाब नहीं में है। यानी हमें सुविधाएं तो चाहिएं, लेकिन उसका उत्पादन कहीं और होगा। यह ‘कहीं और’ कहां होगा, यह होगा गांवों में। यह इकलौती बात विकास की इस दौड़ में गांवों के महत्व को परिलक्षित करती है।

रोचक बात यह है कि शहरी जनसंख्या को हमेशा से उपभोक्ता वर्ग ही माना जाता रहा है। बढ़ती शहरी जनसंख्या का अर्थ है बढ़ता उपभोग और बढ़ती मांग। यही कारण है कि दुनिया की बड़ी-बड़ी बाजार-केंद्रित कंपनियों की नजर इस शहरी जनसंख्या पर रहती है। मैकिन्से एंड कंपनी द्वारा वर्ष 2012 में जारी एक रिपोर्ट – शहरी दुनियाः नगर और उपभोक्ता वर्ग का विकास, में इस पर काफी विस्तार से चर्चा की गई है। हालांकि वह रिपोर्ट कंपनी की मार्केटिंग रणनीति के लिए तैयार की गई है, परंतु इस रिपोर्ट से कई सारी बातों का खुलासा होता है। पहली बात तो यह स्पष्ट हो जाती है कि शहरों को उपभोक्ता ही माना जा रहा है, उत्पादक नहीं। दूसरी बात यह है कि बढ़ते शहरीकरण से केवल केंद्रीकृत अर्थ व्यवस्था को बल मिलता है और तीसरी बात यह है कि शहरों को परजीवी के रूप में ही देखा जाता है।

यही कारण भी है कि शहरों के प्रति पर्याप्त से अधिक आकर्षण होने के बाद भी शहरीकरण को एक समस्या के रूप में ही देखा जाता है और एक सीमा से अधिक शहरीकरण को उचित नहीं माना जाता। अगर हम पूरी दुनिया की बात करें तो 1950 में शहरी जनसंख्या केवल 29.2 प्रतिशत ही थी जो वर्ष 2000 में बढ़कर 46.6 प्रतिशत हो गई थी। परंतु तथाकथित विकसित देशों में 1950 में ही शहरी जनसंख्या 53.8 प्रतिशत थी यानी कि वर्तमान वैश्विक प्रतिशत से भी अधिक, जोकि वर्ष 2000 में बढ़कर 74.4 प्रतिशत हो गई थी। वहीं विकासशील देशों में शहरी जनसंख्या 1950 में केवल 17 प्रतिशत थी जो वर्ष 2000 में बढ़कर 39.3 प्रतिशत हो गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि 1950 में विकासशील देशों के संसाधनों को विकसित देश जमकर लूट रहे थे और इस कारण उन्हें शहरी जनसंख्या में बढ़ोत्तरी से कोई नुकसान नहीं दिख रहा था। बल्कि वे विकासशील देशों को भी यही छलावा दिखाने में व्यस्त थे। परंतु जैसे ही विकासशील देशों में शहरीकरण बढ़ा, तो वहां के संसाधनों की उन्हीं देशों में खपत बढ़ गई। परिणामस्वरूप विकसित देशों को समस्या होनी शुरू हो गई। कुछ तो अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों में आए बदलाव के कारण और कुछ इन देशों में संसाधनों की बढ़ती खपत के कारण विकासशील देशों का शोषण पहले की भांति संभव नहीं था। इसलिए अब शहरीकरण उन्हें समस्या लगने लगा और इसकी समस्याएं उन्हें परेशान करने लगीं। यूएन (संयुक्त राष्ट्र) के एक दस्तावेज में शहरीकरण को एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया गया परंतु उसमें शहरीकरण के कारण केवल विकासशील देशों में पैदा होने वाले संकटों की चर्चा की गई है, विकसित देशों की नहीं।

बहरहाल, यदि हम इस यूएन के इस भेदभाव पर अधिक ध्यान न दें, तो यह तो सच है ही कि यदि मार्केटिंग कंपनियों को छोड़ दिया जाए तो शहरीकरण को सभी एक समस्या और चुनौती के रूप में देख रहे हैं। आइए देखते हैं कि शहरीकृत विकास से कौन सी चुनौतियां पैदा हो रही हैं और उनके समाधान में गांवों की क्या भूमिका है?

खाद्य सुरक्षा

शहरीकरण की सबसे प्रमुख समस्या है खाद्य सुरक्षा। शहरों में खाद्य सामग्री का उत्पादन नहीं हो सकता। कृषि या खेती गांवों में होती है शहरों में नहीं। वास्तव में शहर और गांव का मुख्य अंतर भी आजीविका के साधन हैं। गांवों में आजीविका का मुख्य साधन खेती है तो शहरों में भारी उद्योग-धंधे। यह एक सच्चाई है कि भोजन किए बिना मनुष्य नहीं रह सकता और भोजन की सामग्री अनाज, दालें, सब्जियां और फल खेतों में ही पैदा होते हैं, कल-कारखानों में नहीं। इसी प्रकार शहरों में मांस तो पैदा किया जा सकता है परंतु दूध नहीं। दूध पाने के लिए एक बार फिर हमें गांवों की ओर ही देखना पड़ता है। गोशालाएं तक भी गांवो से जुड़े शहरों के बाहरी इलाकों में ही चलाई जा सकती हैं। मांसाहार के प्रचलन के बाद भी मनुष्य का प्रमुख खाद्य दूध ही है, मांस नहीं।

यही कारण है कि देश में साठ के दशक में भी खाद्य सुरक्षा एक बड़ी समस्या थी और आज इक्कीसवीं सदी में भी खाद्य सुरक्षा सरकार का सिरदर्द बनी हुई है जबकि इस बीच में एक हरित क्रांति की जा चुकी है और अनाज उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि की जा चुकी है। परंतु जिस तेजी से उत्पादन में वृद्धि हुई उससे दोगुनी तेजी से उसके उपभोक्ता वर्ग की संख्या भी बढ़ी। किसान उपभोक्ता नहीं है, क्योंकि वह अनाज का उत्पादन करता है। परंतु शहरवासी अनाज या सब्जियां नहीं उगाते, केवल उनका उपभोग करते हैं। परिणाम हुआ कि उत्पादन में वृद्धि के बाद भी समस्या ज्यों की त्यों बनी रही। यदि विकास के केंद्र में शहरों की बजाय गांवों को रखा गया होता तो उद्योग-धंधों की बजाय खेती को केंद्र मान कर विकास की पूरी संरचना बनाई जाती। इससे शहर यानी कि उपभोक्ता वर्ग कम पैदा होता और गांव यानी कि उत्पादन की संख्या बढ़ती। जनता के पैसों से दिये गए अनुदानो से शहरों के उपभोक्ता जीवन को सरल और आकर्षक बनाया गया जिससे गांवों का उत्पादक वर्ग उसी ओर आकृष्ट होने लगा। शहरों के फैलाव और उद्योग-धंधों के विकास के लिए खेतीहर जमीनें ले ली गईं और उन खेतीहर जमीनों से बेदखल हुए किसानों को मजदूर बना कर उनके जीवन को अनुत्पादक बना दिया गया। इसका ही परिणाम खाद्य सुरक्षा और मंहगाई है। इसलिए यदि इन दो समस्याओं से छुटकारा पाना है तो उत्पादक वर्ग को महत्ता देनी होगी। अनुदानों पर जी रहे शहरी उपभोक्ता वर्ग को उत्पादन की ओर प्रेरित करना होगा। उनको दिए जाने वाले अनुदानों को समाप्त करके उन्हें अपने उपभोग की सामग्री स्वयं पैदा करने के लिए विवश करना होगा। तभी गांवों से शहरों की ओर पलायन रूकेगा।

पर्यावरण और स्वास्थ्य

शहरीकरण से दो बड़ी समस्याएं पर्यावरण और स्वास्थ्य की पैदा हुई हैं। शहर मुख्यतः उद्योग केंद्रित होता है और तमाम बड़े उद्योग पर्यावरण के लिए समस्या हैं। साथ ही शहरों की जीवन शैली भी पर्यावरण के लिए खतरा है। जीवन का सर्वोत्तम सिद्धांत जो आज तक विकसित किया गया है, वह यही है कि प्रकृति से आप जितना लें, उतना ही उसे वापस भी दें। इसको ही वेदों में तेन त्यक्तेन भूञ्जीथा कहा गया। परंतु शहरों की मनोवृत्ति केवल और केवल लेने की है, देने की नहीं। अधिकांश बड़े शहरों में पीने का अपना पानी उपलब्ध नहीं है। उनके पीने का पानी दूसरे इलाकों और अधिकांशतः ग्रामीण इलाकों से आता है। परंतु अधिकांश शहरवासी उस पीने के पानी का अत्यधिक दुरूपयोग करते हैं जिसका परिणाम उन ग्रामीण इलाकों को झेलना पड़ता है।

इसी प्रकार शहर के उद्योग-धंधों को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर बिजली की आवश्यकता पड़ती है। बिजली का उत्पादन किसी शहर में नहीं होता। यह होता है कोयले से और नदियों पर बांधों से। दोनों ही उपाय खेती को नष्ट करते हैं। जो नदियां कभी सभ्यता के विकास का केंद्र हुआ करती थीं, और जिनके किनारे बड़ी-बड़ी सभ्याताएं पनपा करती थीं, वे आज सूखने के लिए अभिशप्त हैं और विस्थापन व उजाड़ के लिए जानी जाने लगीं हैं। उनसे जो बिजली निकाली जाती है, वह वहीं के ग्रामीण इलाकों के बजाय दूर के शहरों के लिए होती है। गांवों की नदियों से निकाली गई बिजली से शहर तो चमकाए जा रहे हैं, परंतु गांवों को अंधेरे में रखा जा रहा है।

बिजली और पानी के इस दुरूपयोग ने पर्यावरण के लिए खतरे को काफी बढ़ा दिया है। खाद्य पदार्थों का उत्पादन शहरों से काफी दूर होने के कारण बड़ी संख्या में कोल्ड स्टोरेज की आवश्यकता पड़ती है जो पर्यावरण प्रदूषण का बड़ा कारण हैं। एसी और कोल्ड स्टोरेज ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे बड़े कारण हैं। इसके बावजूद शहरी जीवन को स्वास्थ्यकर नहीं कहा जा सकता। कोल्ड स्टोरेज में रखे खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और पोषक क्षमता नष्ट हो जाती है। दूर गांवों से आने वाले दूध को सुरक्षित रखने के लिए उसे पाशचुराइज करना पड़ता है जिससे उसकी गुणवत्ता पूरी तरह समाप्त हो जाती है। स्वाभाविक ही है कि पोषणविहीन भोजन के कारण शहर बीमारियों का केंद्र बनते जा रहे हैं। इसके अलावा प्रकृतिविमुख शहरी जीवन शैली भी अनेक रोगों को पैदा कर रही है। शहरों में पैदा हुआ प्रदूषण नदियों के माध्यम से गांवों तक पहुंचने लगा है।

इसका समाधान भी गांवों में ही छिपा है। गांवों का प्रकृतिकेंद्रित जीवन स्वाभाविक रूप से प्रदूषणमुक्त होता है। प्रदूषणमुक्त होने से स्वास्थ्य की भी समस्याएं कम होती हैं। ताजी सब्जियां, ताजे फल और पौष्टिक अनाज स्वास्थ्य को स्थिरता प्रदान करते हैं। गांवों की श्रम आधारित जीवन शैली भी एक स्वास्थ्यकर होती है।

आवास और अन्य समस्याएं

शहरीकृत विकास की एक प्रमुख समस्या आवास की है। छोटे से क्षेत्रफल में बड़ी संख्या में लोग रहते हैं। स्वाभाविक ही है कि आवास की समस्या पैदा होगी। आवास से जुड़ी हुई समस्या है स्वच्छता की। भारत में बनाया गया सीवेज तंत्र बुरी तरह असफल रहा है और प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण भी है। यह एक सच्चाई है कि बड़ी संख्या में लोगों को विलासितायुक्त जीवन नहीं मिल सकता। यही कारण है कि जहां कहीं भी शहरों में बड़ी-बड़ी कोठियां हैं, उनके ठीक बगल में उनको आधारभूत सुविधाएं प्रदान करने वाली झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां भी हैं। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां आज सभी शहरों की अनिवार्य सच्चाई व बुराई बन चुकी हैं। शहरवासी इनसे घृणा करते हैं, परंतु इनके बिना जीवन भी नहीं चला सकते। उनके कारों को चलाने वाले ड्राइवर, उनके घरों में काम करने वाली महरी, आया, उनकी नालियों और सीवेज की सफाई करने वाले मेहतर, उनके कारखानों में काम करने वाले मजदूर सभी इन्हीं झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहते हैं। इन झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में वे सभी समस्याएं होती हैं, जिनसे बचने के लिए गांववासी शहर भाग कर आते हैं।

आवास की समस्या हल करने के लिए बहुमंजिली इमारतों का विकल्प अवश्य निकाला गया है, परंतु उसकी अपनी समस्याएं हैं। कम क्षेत्रफल में अधिक लोगों के रहने से उस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ जाता है, जो प्रकारांतर से पूरे जनजीवन के लिए हानिप्रद होता है।

पांच अक्टूबर, 1945 को जवाहरलाल नेहरू को लिखे अपने एक पत्र में महात्मा गांधी ने लिखा था, “मैं यह मानता हूँ कि अगर हिन्दुस्तान को कल देहातों में ही रहना होगा, झोपड़ियों में, महलों में नहीं। कई अरब आदमी शहरों और महलों में सुख से और शांति से कभी रह नहीं सकते, न एक-दूसरों का खून करके – मायने हिंसा से, न झूठ से – यानी असत्य से। सिवाय इस जोड़ी के (यानी सत्य और अहिंसा) मनुष्य जाति का नाश ही है, उसमें मुझे जरा-सा भी शक नहीं है। उस सत्य और अहिंसा का दर्शन केवल देहातों की सादगी में ही कर सकते हैं। वह सादगी चर्खा में और चर्खा में जो चीज भरी है उसी पर निर्भर है। मुझे कोई डर नहीं है कि दुनिया उल्टी ओर ही जा रही दिखती है। यों तो पतंगा जब अपने नाश की ओर जाता है तब सबसे ज्यादा चक्कर खाता है और चक्कर खाते-खाते जल जाता है। हो सकता है कि हिन्दुस्तान इस पतंगे के चक्कर में से न बच सके। मेरा फर्ज है कि आखिर दम तक उसमें से उसे और उसके मारफत जगत को बचाने की कोशिश करूं। मेरे कहने का निचोड यह है कि मनुष्य जीवन के लिए जितनी जरूरत की चीज है, उस पर निजी काबू रहना ही चाहिए – अगर न रहे तो व्यक्ति बच ही नहीं सकता है।”

इसके बाद उन्होंने गांवों की अपनी कल्पना बताते हुए लिखा, “मेरे देहात आज मेरी कल्पना में ही हैं। आखिर में तो हर एक मनुष्य अपनी कल्पना की दुनिया में ही रहता है। इस काल्पनिक देहात में देहाती जड़ नहीं होगा – शुद्ध चैतन्य होगा। वह गंदगी में, अंधेरे कमरे में जानवर की जिन्दगी बसर नहीं करेगा, मर्द और औरत दोनों आजादी से रहेंगे और सारे जगत के साथ मुकाबला करने को तैयार रहेंगे। वहां न हैजा होगा, न मरकी (प्लेग) होगी, न चेचक होंगे। कोई आलस्य में रह नहीं सकता है, न कोई ऐश-आराम में रहेगा। सबको शारीरिक मेहनत करनी होगी। इतनी चीज होते हुए मैं ऐसी बहुत-सी चीज का ख्याल करा सकता हूँ जो बड़े पैमाने पर बनेगी। शायद रेलवे भी होगी, डाकघर, तारघर भी होंगे।”

महात्मा गांधी चाहते थे कि जवाहरलाल उनकी इस बात को समझें और उस पर अमल करें। स्वाधीनता के बाद देश का विकास गांवों को केंद्र मान कर किया जाए। खेती और गोपालन को जोड़ा जाए और उसे अर्थ व्यवस्था की धुरी बनाया जाए। परंतु जवाहरलाल गांधी के एकदम उलटी सोच रखते थे। उन्होंने गांधी के उस पत्र के उत्तर में लिखा, “आमतौर पर माना जाता है कि गांवों में रहने वाले लोग बुध्दिमत्ता और सांस्कृतिक तौर पर पिछड़े हुए होते हैं और एक पिछड़े हुए वातावरण में कोई प्रगति नहीं हो सकती। बल्कि संकुचित विचारों वाले लोगों के झूठे व हिंसक होने की संभावना ज्यादा रहती है।

इसके अलावा, हमें अपने कुछ लक्ष्य भी तय करने हैं, मसलन, खाद्य सुरक्षा, कपड़े, आवास, शिक्षा, स्वच्छता, वगैरह। ये वे न्यूनतम लक्ष्य हैं जो किसी भी देश या व्यक्ति के लिए अनिवार्य हैं। इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए हमें यह देखना है कि हम कितनी तेजी से उन्हें हासिल कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, यातायात के आधुनिक साधनों व दूसरी आधुनिक गतिविधियों का विकास और उनकी निरंतर प्रगति भी मुझे अपरिहार्य लगते हैं। इसके अलावा, मुझे कोई और रास्ता नहीं दिखता। भारी उद्योग भी आज की आवश्यकता है और क्या यह सब विशुद्ध ग्रामीण परिवेष में संभव है? व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि भारी और हल्के उद्योगों का यथासंभव विकेन्द्रीकरण होना चाहिए और बिजली का नेटवर्क बन जाने के बाद यह संभव भी है। देश में अगर दो तरह की अर्थव्यवस्था काम करेंगी तो या तो दोनों के बीच द्वंद्व होगा या एक, दूसरे पर हावी हो जाएगी।

लाखों-करोड़ों लोगों के लिए महल बनाने का सवाल नहीं है। लेकिन इसका भी कोई कारण नहीं है कि उन सभी को ऐसे सुविधाजनक व आधुनिक घर मिल सकें जहां वे एक अच्छा संस्कारी जीवन जी सकें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कई भारी-भरकम शहरों में बहुत सी बुराइयां घर कर गई हैं। इनकी निंदा की जानी चाहिए। शायद हमें एक सीमा से अधिक शहरों के विकास पर रोक लगानी होगी, लेकिन साथ ही गांव वालों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना होगा कि वे शहरों की संस्कृति में खुद को ढाल सकें।”

महात्मा गांधी के कंधों पर चढ़ कर जवाहरलाल देश के पहले प्रधानमंत्री बने और उन्होंने वही किया जो ऊपर लिखे पत्र में उन्होंने कहा था। विकास के नाम पर गांवों को समाप्त करने का तीव्रतम प्रयास किया गया। उन्हें शहरों के अनुकूल ढलने के लिए विवश किया गया। परंतु साठ वर्षों में हम इसका परिणाम देख चुके हैं। जवाहरलाल ने जो लक्ष्य बताए थे – खाद्य सुरक्षा, कपड़े, आवास, शिक्षा, स्वच्छता आदि उनमें से एक भी पूरा नहीं हो पाया है। उलटे हम उन सभी मामलों में और पिछड़ गए हैं। सवाल है कि क्या मोदी देश के लिए एक और जवाहरलाल साबित होंगे। आखिर वे भी तो स्मार्ट शहरों की ही बात कर रहे हैं, स्मार्ट गांवों की नहीं।

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मनु और स्त्रियों के अधिकार

Posted by bhartiyapaksha on दिसम्बर 2, 2014

स्त्री विमर्श आधुनिक विद्वानों का सबसे प्रमुख शगल है। विषय कोई सा भी हो स्त्रियों का मुद्दा उसमें जोड़ ही दिया जाता है। राजनीति से लेकर सेना तक और शिक्षा से लेकर व्यवसाय तक स्त्रियों को प्रमुखता देने, उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की बात की जाती है। ये बातें सकारात्मक और रचनात्मक हैं, इसलिए इनका स्वागत किया जाना चाहिए, परंतु इन बातों को करने के साथ-साथ एक हीनता का भाव भी भरा जाता है कि प्राचीन भारत में स्त्रियों की स्थिति काफी खराब थी और भारतीय शास्त्र विशेषकर मनुस्मृति स्त्रियों के अधिकारों और स्वतंत्रता के बड़े हननकर्ता रहे हैं। कहा और माना जाता है कि प्राचीन भारत में स्त्रियों को शिक्षा तक का अधिकार नहीं था। पितृसत्तात्मक समाज होने के कारण स्त्रियों को पुरूषों के आश्रय में रहना पड़ता था। परंतु यदि गंभीरता से भारतीय शास्त्रों का आड़ोलन किया जाए तो स्थिति इसके ठीक विपरीत नजर आती है। यदि हम वेदों की बात अभी छोड़ दें तो भी मनुस्मृति जैसे स्त्रीविरोधी माने जाने वाले ग्रंथों में स्त्रियों के लिए ऐसे विधान किए गए हैं, जो आज भी उन्हें प्राप्त नहीं हैं या फिर जिनके लिए उन्हें न्यायालय में जाना पड़ रहा है।

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मनुस्मृति के बारे में सबसे पहले दो बातें जानना आवश्यक है। पहली बात तो यह है कि मनुस्मृति में आचरण-व्यवहार और अधिकारों व दंडविधानों की चर्चा अलग-अलग की गई है। उन्हें उनके संदर्भों में देखने से ही सही चित्र सामने आ सकेगा। दूसरी बात यह है कि मनुस्मृति में समय-समय पर लोगों ने काफी बड़े परिमाण पर प्रक्षेप किए हैं। प्रक्षेप यानी कि मनमर्जी के श्लोक बना कर डाले गए हैं जो वास्तव में मनु के नहीं हैं और जो अधिकांश मामलों में मनु के विधानों के विरोध में भी हैं। मनु स्मृति में प्रक्षिप्तों की बात तो कुल्लूक भट्ट प्रभृति मनु के पुराने भाष्यकार भी स्वीकार करते हैं और उन श्लोकों का प्रक्षिप्त होना प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार सहित अनेक विद्वानों ने भली भांति सिध्द किया है। इन प्रक्षेपों को छोड़ कर ही यहां मनु के विधानों की चर्चा की जाएगी।

सबसे पहले यह जानना महत्वपूर्ण है कि मनु ने सर्वत्र स्त्रियों को काफी सम्मान दिया है और स्त्री के प्रसन्न रहने में ही परिवार और कुल की सुख-समृद्धि बताई है। उनका एक प्रसिद्ध वाक्य है – जहां स्त्रियों का सत्कार और सम्मान होता है, वहां श्रेष्ठ लोगों व देवताओं का वास होता है। इसके आगे वे कहते हैं कि जिस समाज में स्त्रियां शोक व चिंताग्रस्त होती हैं, वह समाज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहां स्त्रियां निष्चिंत और सुखी रहती हैं, वह समाज सदैव विकास करता रहता है। क्या यही कारण नहीं है कि आज हमारे समाज का पतन ही हो रहा है, उत्थान नहीं। धन संपदा के बढ़ने पर भी परिवार भाव, सामाजिक दायित्वबोध और मानवीय मूल्यों में लगातार गिरावट ही आ रही है।

मनु ने शिक्षा का स्त्री-पुरूष के लिए अलग-अलग विधान नहीं किया है। शिक्षा के लिए उन्होंने केवल उपनयन संस्कार की चर्चा की है और उसमें वर्णानुसार संस्कार कराए जाने की बात कही है। यानी कि जो जिस वर्ण में जाने का इच्छुक हो, वह उसके अनुसार उपनयन कराए। वहां कहीं भी यह नहीं लिखा कि शूद्र या स्त्री का उपनयन संस्कार नहीं किया जाए। इसके विपरीत वहां इनकी कोई चर्चा ही नहीं है जिससे यह सिद्ध होता है कि मनु किसी को भी शिक्षा से वंचित नहीं करते हैं। वर्णानुसार संस्कार कराने में भी मनु ने लिखा है कि जो जिस वर्ण में जाने का इच्छुक हो उसके अनुसार उपनयन करवाए। इसका अर्थ साफ है कि मनु जन्म से किसी को ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्य नहीं मानते हैं। यहां पर एक क्षेपक भी मिलता है जो स्त्रियों के लिए मंत्रहीन उपनयन संस्कार का वर्णन करता है और पतिसेवा को ही गुरूकुल में रहने के समान बताता है। यह विधान कई कारणों से क्षेपक सिद्ध होता है। एक तो यह उपनयन के विधान के पूर्ण होने के बाद केशांत आदि का वर्णन हो जाने के बाद आया है और दूसरे यह वेदानुकूल भी नहीं है। तीसरे, इसके अलावा कहीं भी मनु में स्त्रियों और पुरूषों के लिए ब्रह्मचर्याश्रम के अलग-अलग कर्तव्य नहीं बताया गया है। साफ है कि मध्यकाल में किसी ने इसे मिलाया है। आगे विवाह के प्रकरण में हम देखेंगे कि हमेशा मनु कन्या के योग्य वर की चर्चा करते हैं, वर के योग्य कन्या की नहीं। इससे भी यह सिद्ध होता है कि कन्या यानी कि स्त्रियों का शिक्षण होता था और मनु स्त्री शिक्षा के बड़े समर्थक थे। Gargi-Vachaknavi

शिक्षा पूरी करने के बाद विवाह के प्रकरण में यदि हम मनु की व्यवस्था को देखें तो बड़ी ही आश्चर्यजनक बात सामने आती है। मनु ने आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा की है। ये प्रकार स्त्री अधिकारों की रक्षा करते हुए बनाए गए हैं। इन आठ प्रकारों को उन्होंने दो भागों में बांटा है – उत्तम और निकृष्ट। चार उत्तम विवाह हैं – ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्य। इनमें से भी सबसे श्रेष्ठ प्रकार है ब्राह्म विवाह। इसका वर्णन करते हुए मनु कहते हैं कि जिस किसी विद्वान व सुशील पुरूष को स्त्री ने स्वयं पसंद और प्रसन्न किया हो, वस्त्राभूषण से अलंकृत करके उसका विवाह उस युवक के साथ कर देना ही ब्राह्म विवाह है। इस प्रकार यह विवाह स्पष्ट रूप से प्रेम विवाह है। इसकी पहली शर्त यही है कि स्त्री और पुरूष एक दूसरे को पसंद करते हों। यहां वर्ण, जाति, शिक्षा, व्यवसाय और संपदा किसी भी प्रकार के भेद की चर्चा नहीं है। साफ है कि मनु केवल स्त्री-पुरूष की परस्पर प्रसन्नता को ही सर्वाधिक महत्व देते हैं। यह विधान आज समाज को इसलिए भी बताए जाने की आवश्यकता है क्योंकि झूठे प्रमादवश लोग प्रेम विवाह करने पर युवक-युवतियों का बहिष्कार से लेकर हत्या कर देने तक का जघन्य अपराध कर रहे हैं। यदि उन्हें पता हो कि यह तो हमारे शास्त्रकारों का विधान है तो संभवतः वे इस महापातक से बच जाएं।

विवाह के अन्य प्रकार भी स्त्रियों के अधिकारों को सुरक्षित करते हैं। दैव विवाह सामूहिक विवाह जैसा ही है और उसमें भी बिना माता-पिता के दबाव के किया जाता है। इसमें भी स्त्री की इच्छा प्रमुख है। आर्ष विवाह में विधान है कि वर यदि किसी कन्या को पसंद करता हो तो वह एक जोड़ी गाय या बैल लेकर कन्या के पिता के पास जाए और तब कन्या का पिता उनका विवाह करवा दे। इसका तात्पर्य केवल वर की आर्थिक सामर्थ्य की जांच करना है। प्राचीन काल में और कमोबेश आज भी कृषि का प्रमुख आधार गाय और बैल ही हैं। जो एक-दो जोड़ी गाय या बैल अतिरिक्त रख सकता हो, वह अपेक्षाकृत समृद्ध ही माना जाएगा। प्राजापत्य विवाह में कन्या और वर के माता-पिता विवाह का निर्णय लेते हैं। इसमें स्त्री-पुरूष की इच्छा गौण है, परंतु यह चार उत्तम विवाहों में सबसे अंतिम प्रकार का विवाह है जिसका अर्थ है कि पहले तीनों प्रकार के विवाह की स्थिति न होने पर इस चौथे प्रकार से विवाह किया जाए। दुर्भाग्यवश आज समाज में यह चौथे प्रकार का ही विवाह सर्वाधिक स्वीकृत है। शेष विवाहों को हेय दृष्टि से देखा जाता है जबकि मनु इसको ही सबसे न्यून श्रेणी का विवाह मानते हैं। आज मनु के इन विधानों से समाज को अवगत कराए जाने की महती आवश्यकता है।

मनु ने जो चार निकृष्ट विवाह बताए हैं, वे भी एक प्रकार से आपातस्थिति में स्त्री के साथ की गई ज्यादतियों के दुष्परिणामों से उसकी रक्षा के लिए हैं। गंधर्व विवाह तो आज के लिव इन संबंध के समान है। मनु ने इसे भी विवाह की संज्ञा दी है यानी कि लिव इन में रहने पर भी स्त्री को विवाहित की भांति सारे अधिकार मिलेंगे। शेष तीन अपहरण, बलात्कार और नशा आदि खिला कर धोखे से किए गए दुष्कर्मों के कारण स्त्री को सामाजिक अपमान न झेलना पड़े, इसके लिए ये तीन निंदनीय विवाहों का विधान मनु ने किया है। यह साफ है कि मनु इन सभी में स्त्री की इच्छा का प्रधानता देते हैं। यह उन्होंने विवाह के पहले ही प्रकार में स्पष्ट कर दिया है। आगे नवें अध्याय में स्त्री-पुरूष संबंधों में राज्य नियमों की चर्चा करते हुए इसका और विस्तार किया गया है।

नवां अध्याय स्त्री-पुरूष संबंधों में राज्य यानी कानून की व्यवस्था से संबंधित है। इस अध्याय के प्रारंभ में ही मनु यह बताते हैं कि स्त्रियां ही परिवार, कुल व समाज के सुख का आधार हैं और इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। परंतु वे यह भी बताते हैं कि किसी भी प्रकार की जबरदस्ती या दबाव से स्त्रियों की रक्षा संभव नहीं है। मनु इससे आगे बढ़कर कहते हैं कि विश्वसनीय पुरूषों पिता, पति, भाई चाचा, मामा, आदि की निगरानी में घर में रोक कर रखी हुई स्त्री भी सुरक्षित नहीं होती, बल्कि जो अपनी रक्षा स्वयं करती हैं, वही सुरक्षित रहती हैं। मनु ने जो यह बात कही है, आज वही बात हमारी पुलिस और सरकारें भी कह रही हैं। घर में या फिर अपने संबंधी पुरूषों के संरक्षण में रहने मात्र से स्त्री की सुरक्षा को अनिश्चित कह कर मनु ने घरेलू हिंसा की समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया है और स्त्रियों को पुरूष पर अवलंबित रहने से सावधान भी किया है। मनु यह मानते हैं कि स्त्रियों के प्रति सम्मान और स्नेह के भाव को बढ़ाकर ही उनकी रक्षा की जा सकती है। वे अलग-अलग अध्यायों में स्त्रियों को प्रसन्न और संतुष्ट रखने की चर्चा करते हैं। कहीं भी बलपूर्वक उनसे कुछ मनवाने या फिर कोई बात थोपने की चर्चा नहीं है।KO03-Rama

इस अध्याय में स्त्री के स्वयं से वर चुनने यानी कि प्रेम विवाह को कानूनी वैधता देते हुए मनु कहते हैं यदि योग्य वर न मिले तो चाहे जीवन भर कुंवारी रहे, परंतु कन्या का विवाह गुणहीन व अयोग्य वर से न करे। इसके बाद मनु कहते हैं कि विवाह योग्य होने के पश्चात् कन्या अपने लिए वर का चयन कर सकती है। अभिभावकों द्वारा योग्य वर न चुन पाने की अवस्था में यदि स्त्री अपने लिए स्वयं वर का चुनाव करती है तो इसमें कोई पाप यानी कि दोष नहीं है। इस प्रकार हम पाते हैं कि मनु सर्वत्र स्त्री की स्वतंत्रता का भरपूर सम्मान करते हैं और उसे प्राथमिकता देते हैं। मनु ने विधवा विवाह को भी इस अध्याय में मान्यता दी है। वे कहते हैं कि यदि स्त्री के वाग्दान हो जाने के बाद उसके पति की मृत्यु हो जाए तो उसका दूसरा विवाह कर दिया जाना चाहिए। हालांकि मनु ने इस विधान में पति के छोटे भाई से विवाह की चर्चा की है, परंतु इससे इतना तो स्पष्ट है कि मनु विधवा स्त्री के दूसरे विवाह को अमान्य नहीं करते हैं।

इसी अध्याय में मनु ने स्त्रियों के लिए नियोग करने के अधिकार की भी चर्चा की है। नियोग यानी कि स्त्री को यह अधिकार होता था कि पति के अभाव में वह किसी अन्य पुरूष से संतान उत्पन्न कर सकती थी। नियोग का विधान यह बताता है कि प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रियों को किस हद तक स्वाधीनता दी गई थी। आज एक ओर जहां पुरूषों को यह छूट दी जाती है कि संतान न होने पर वे दूसरा विवाह कर लें, मनु ने स्त्रियों को यह छूट दी है कि यदि पति से संतान न हो रही हो तो वह दूसरे से संतान उत्पन्न कर ले। इस संतान पर किसका अधिकार होगा, इस पर मनु ने काफी चर्चा की है और व्यवस्था दी है कि सामान्यतः संतान पर स्त्री का ही अधिकार होगा, परंतु यदि दोनों ने मिल कर तय किया हो तो पुरूष का भी अधिकार हो सकता है। इस विधान में आज की सरोगेट माँ की व्यवस्था को भी देखा जा सकता है। विवाह की ही भांति नियोग की भी सार्वजनिक घोषणा होती थी। किससे नियोग करना है, इसमें स्त्री अपने बड़ों से मार्गदर्शन ले सकती थी। जिससे नियोग किया जा रहा है, संतान होने के बाद, उससे संबंध समाप्त करने होते थे। इससे साफ है कि नियोग करने वाली स्त्री की भी पूरी प्रतिष्ठा होती थी।

मनु स्त्रियों को आर्थिक अधिकार भी देते हैं। आमतौर पर समझा जाता है कि मनु स्त्री को हमेशा पुरूष पर आश्रित रहने वाली बात ही कहते हैं। इसके लिए एक श्लोक भी बताया जाता है कि बचपन में स्त्री पिता के आश्रय, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के आश्रय रहती है। परंतु मनु इतने संकुचित नहीं हैं। मनु ने स्त्रियों को वे सारे अधिकार दिए, जो आज हम उसे देना चाहते हैं। परंतु मनु ही नहीं, सभी प्राचीन भारतीय विद्वानों का मानना था कि स्त्री को अर्थोपार्जन न करना पड़े तो अच्छा। उस पर परिवार को संभालने और संचालन करने का बड़ा दायित्व रहता है। यदि वह अर्थोपार्जन में जुट जाएगी तो परिवार ठीक से नहीं चल पाएंगे। इसलिए सामान्य स्थिति में यही श्रेयस्कर समझा गया कि स्त्रियां अर्थोपार्जन की चिंता से मुक्त रहें। परंतु आपात स्थिति में उन्हें अर्थोपार्जन करने से मना नहीं किया गया है। मनु कहते हैं कि यदि पति किसी कार्यवश परदेश जाए तो स्त्री की आजीविका का पूरा प्रबंध करके जाए। परंतु यदि वह ऐसा नहीं करता है तो अनिंदित शिल्प कार्यों से वह अपनी आजीविका का प्रबंध स्वयं करे। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यवस्था है। इसके बाद मनु ने स्त्री को पति के परदेश जाने की अवस्था में नियोग करने का भी विधान किया है। वे कहते हैं – यदि पति धर्म के कार्य से विदेश गया हो तो आठ वर्ष, यदि विद्यार्जन या यश प्राप्ति के लिए गया हो तो छह वर्ष और यदि केवल पैसे कमाने के लिए गया हो तो तीन वर्ष तक उसकी प्रतीक्षा करे। उसके बाद वह नियोग करके संतान कर सकती है। हालांकि मूल श्लोक में नियोग शब्द वर्णित नहीं है, इसलिए इस विधान में नियोग के अलावा दूसरा विवाह करने की भी व्यवस्था मानी जा सकती है।

इस प्रकार हम पाते हैं कि मनु स्मृति में स्त्रियों के अधिकारों को पूरा-पूरा स्थान दिया गया है। मनु स्त्रियों की प्रसन्नता पर ही पूरे समाज के विकास को निर्भर मानते हैं। वे साफ-साफ शब्दों में कहते हैं कि जहां स्त्रियों का सम्मान और सत्कार होता है, वहीं दिव्यता आती है। हालांकि मनु में इन सकारात्मक विधानों के साथ ही इनके विरोधी विधान भी मिला दिए गए हैं, परंतु इन विधानों के आलोक में यदि हम मनु स्मृति को पढ़ेंगे तो इन प्रक्षेपों को समझ पाएंगे। कहा जा सकता है कि यदि मनु के वास्तविक विचारों को प्रक्षेपों से और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो कर समझने का प्रयास किया जाए तो समाज में न केवल स्त्रियों को उनका उचित स्थान मिल सकेगा, बल्कि हम यह भी गर्वपूर्वक कह पाएंगे कि प्राचीन भारत का समाज एक अति उदार और विकसित समाज था।

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महात्मा गांधी: असफलताओं पर गौरवान्वित होता देश

Posted by bhartiyapaksha on अक्टूबर 7, 2014

महात्मा गांधी, बीसवीं सदी के महानतम नायकों में से एक हैं। विख्यात वैज्ञानिक आईंसटाइन का कहना था कि जिन्होंने महात्मा गांधी को देखा नहीं है, वे बाद में विश्वास नहीं कर पाएंगे कि ऐसा कोई मनुष्य हुआ भी था। बचपन के मोहनदास से महात्मा गांधी तक की यह यात्रा रहस्यों से भरी हुई है। इस यात्रा के अनेक मोड़ हैं और अनेक पड़ाव जिनकी भांति-भांति प्रकार से व्याख्या की जाती है और प्रेरणा तथा विवाद दोनों ही खड़े किए जाते हैं। गांधी के जीवन के आयाम इतने सारे हैं और वे इतने रहस्यात्मक हैं कि उन्हें कुछेक शब्दों में बांधना संभव नहीं है।

बहरहाल, यदि ध्यान से देखा जाए तो महात्मा गांधी के संपूर्ण जीवन को तीन आयामों में बांटा जा सकता है। सबसे पहला आयाम है समाजसुधारक गांधी, दूसरा है राजनीतिक गांधी और तीसरा है आध्यात्मिक गांधी। उनके ये तीनों ही आयाम परस्पर काफी जुड़े हुए हैं और ये तीनों ही आयाम प्रयोगों से भरे हैं। उनके इन प्रयोगों ने ही एक नया दर्शन विकसित कर दिया है गांधीवादी दर्शन। प्रयोगधर्मी गांधी के ये प्रयोग कितने सफल रहे, इस पर ही इस गांधीवादी दर्शन की भी सफलता निर्भर करती है।

गांधी जी को कुछ गुण विरासत से मिले थे। उनके दादा और पिता दोनों ही एक रियासत के दीवन थे परंतु दोनों ने ही अपने रियासतदारों के अन्याय का विरोध किया था। इसलिए अन्याय के खिलाफ खड़े होने का गुण उनको विरासत से मिला था। इसलिए पीड़ित या शोषित के साथ खड़ा होना उनका सहज स्वभाव था। उनके इस स्वभाव ने ही उन्हें समाजसुधारक बनाया। एक समाजसुधारक के तौर पर गांधी के प्रयोगों को काफी हद तक सफल कहा जा सकता है। चाहे अछूतोद्धार की बात हो या फिर स्त्रियों के सशक्तिकरण की, गांधी के विचार और प्रयोग दोनों ही काफी प्रभावी रहे। हालांकि आज के दलित विचारक गांधी के विचारों के विरोधी हैं, परंतु इसका एक बड़ा कारण गांधी के समाजसुधारक विचारों का भारत की मिट्टी से जुड़ा होना है। गांधी ने अंत्योदय की बात कही और इसके लिए ट्रस्टीशिप लाने की बात कही। जब समाज का समृद्ध वर्ग स्वयं को अपनी संपत्ति का ट्रस्टी मान लेगा तो उसका उपयोग समाज के पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए करेगा, यही गांधी जी की सोच थी और यही उनका समाजवाद भी था। यह विचार शुद्ध रूप से भारतीय विचार है और विदेशों में पनपे उस समाजवाद से बिल्कुल भिन्न है जो समाज के समृद्ध वर्ग की संपत्ति को राज्य द्वारा हड़प लिए जाने की वकालत करता है।

गांधी जी समाज को मजबूत बनाने और राज्य पर उसकी निर्भरता को कम रखने के समर्थक थे। गांधी गांवआधारित विकास का सपना देखते थे। इसलिए उन्होंने ग्राम स्वराज का नारा दिया था। उन्होंने समाजसुधार और ग्राम विकास के प्रतीक चरखा, खादी और स्वदेशी को राजनीतिक हथियार के रूप में भी उपयोग किया। गांधी का मानना था कि एक स्वस्थ, स्वावलंबी और स्वाभिमानी समाज कभी भी गुलाम नहीं रहेगा और इसलिए वे अंग्रेजों से मुक्ति के लिए समाज को बलवान बनाए जाने पर जोर देते थे। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उनके नेतृत्व में राजनीति करने वाली कांग्रेस कभी भी न तो उनके इन विचारों को समझ पाई और न ही उसने कभी समझने का प्रयास ही किया। गांधी के समाजसुधार कार्यक्रमों से कांग्रेस के अलग-थलग रहने के बावजूद गांधी के प्रयोग अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे।

गांधी  जी का राजनीतिक जीवन जितना प्रचारित किया जाता है, उतना सफल नहीं कहा जा सकता। यह सही है कि माना जाता है कि देश को स्वाधीनता गांधी जी ने ही दिलाई। परंतु स्वाधीनता दिलाने के अलावा गांधी राजनीतिक दृष्टि से हर मोर्चे पर बुरी तरह असफल रहे थे। गांधी जी विभाजन नहीं चाहते थे, परंतु वह हुआ। गांधी जी चाहते थे कि देश में अंग्रेजी तंत्र समाप्त हो जाए, वह और जोर-शोर से लागू हो गया। गांधी जी चाहते थे कि अंग्रेज इस देश में भले ही रहें, परंतु अंग्रेजियत चली जाए, हुआ इसके ठीक विपरीत। अंग्रेज तो चले गए, परंतु अंग्रेजियत बुरी तरह हावी हो गई। गांधी जी चाहते थे कि देश की राजनीति धर्माधारित हो परंतु वह धर्मनिरपेक्ष हो गई। गांधी जी देश में रामराज्य चाहते थे परंतु आज राम का नाम लेना भी पाप हो गया है। गांधी जी देश में पंचायती राज्य प्रणाली चाहते थे, परंतु पंचायती राज्य व्यवस्था आज तक ठीक से लागू नहीं की जा रहा है। गांधी जी मार्क्सप्रेरित समाजवाद के घोर विरोधी थे, परंतु देश में वही समाजवाद लाद दिया गया। सवाल है ऐसा क्यों हुआ?

गांधी जी का सबसे प्रमुख राजनीतिक प्रयोग था सत्याग्रह। सत्याग्रह आंदोलनों को काफी महिमामंडित किया जाता है। परंतु देखा जाए तो गांधी जी के लगभग आंदोलन निष्प्रभावी रहे हैं। गांधी जी का पहला राष्ट्रीय आंदोलन खिलाफत आंदोलन था। खिलाफत वास्तव में अंग्रेजी शब्द था खैलिफट यानी कि खलीफाशाही। यह आंदोलन तुर्की में खलीफा को पुनः स्थापित करने के लिए चलाया गया था। परंतु देश की जनता समझती थी कि खिलाफत का अर्थ अंग्रेजों की खिलाफत यानी कि विरोध है। परंतु इस आंदोलन का परिणाम क्या हुआ? तुर्की में कमाल पाशा की सत्ता बनी रही। भारत में उसका कोई परिणाम होना नहीं था। सरकारी सुधार 1935 में किए गए जो कि 1925 से चल रहे क्रांतिकारियों के हिंसक आंदोलनों का परिणाम थे। नमक आंदोलन यानी कि दांडी मार्च को जितना प्रचारित किया गया है, वह उतने प्रचार के लायक नहीं था। उस आंदोलन एक मामूली से नमक कर के विरोध में था। वह कर अंग्रेज सरकार ने हटा लिया और आंदोलन सफल हो गया। परंतु इससे अंग्रेज सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। गांधी जी का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण आंदोलन है 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन। इसका परिणाम भी शून्य ही रहा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि गांधी इन आंदोलनों को अहिंसक रखना चाहते थे। खिलाफत आंदोलन को उन्होंने चौरा-चौरी में हुई हिंसा की घटना के कारण ही बंद कर दिया था। परंतु 1942 के आंदोलन में सर्वाधिक हिंसा हुई। इस आंदोलन में 250 से अधिक रेलवे स्टेशन तोड़े गए, 550 डाकघरों पर आक्रमण किया गया, 50 डाकघर जला दिए गए। 70 पुलिस स्टेशन जलाए गए। इसके बाद भी 1942 के आंदोलन के समाप्त होने पर क्या प्राप्त हुआ? इस आंदोलन के बाद नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन और अंग्रेजों पर आक्रमण तथा 1946 में नौसेना विद्रोह ये दो हिंसक आंदोलन थे जिनके कारण 1947 में अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का फैसला लिया। इस प्रकार राजनीतिक गांधी उतने सफल नहीं कहे जा सकते जितने कि प्रचारित किए जाते हैं।

देश और विदेशों में भी गांधी जी का प्रभाव बढ़ने में उनके राजनीतिक जीवन की बजाय उनके सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन का अधिक भूमिका थी। आध्यात्मिक गांधी यानी कि न्यूनतम कपड़ों में सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले, उपवास और अनशन करने वाले गांधी अधिक प्रभावी थे, बनिस्पत कि राजनीतिक प्रस्ताव और कार्यक्रम बनाने वाले गांधी से। तत्कालीन सभी महत्वपूर्ण नेता चाहे वह सरदार पटेल रहे हों या फिर नेहरूद्वय, मदनमोहन मालवीय रहे हों या फिर कन्हैयालाल मुंशी, जयप्रकाश रहे हों या सुभाष चंद्र बोस, सभी गांधी जी के त्यागमय जीवन के आगे नतमस्तक रहे हैं। वे उनके राजनीतिक विचारों के उतने समर्थक नहीं रहे हैं जितने कि उनके तपस्वी जीवन के। परंतु आज तक किसी ने आध्यात्मिक दृष्टि से गांधी का मूल्यांकन करने की कोशिश नहीं की।

यह सही है कि समय समय पर गांधी के कुछेक आध्यात्मिक प्रयोगों की आलोचना या समालोचना होती रही, परंतु वे सभी आलोचनाएं केवल उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों तक सीमित थीं। देखा जाए तो गांधी जी जीवन भर तीन चीजों पर प्रयोग करते रहे। पहला था सत्य, दूसरी थी अहिंसा और तीसरा था ब्रह्मचर्य। इसके अलावा पालन उन्होंने कई व्रतों का किया जैसे कि अपरिग्रह, शौच आदि। ध्यान से देखा जाए तो ये सभी अष्टांग योग मार्ग के पहले दो अंग यम और नियमों का हिस्सा हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि गांधी जी जीवन भर योग साधना के प्रारंभिक दो चरणों का ही अभ्यास करते रहे। वे उससे आगे कभी नहीं बढ़े। दूसरी बात यह है कि गांधी जी कभी भी यह नहीं कह पाए कि इन तीनों पर उनका ठीक-ठाक अधिकार हो गया है। बल्कि वर्तमान में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उनसे पता चलता है कि कम से कम ब्रह्मचर्य को लेकर उनका मन काफी डांवाडोल रहा करता था। देखा जाए तो गांधी जी अपने कथनानुसार ही उनकी युवावस्था काफी वासनामय रही थी। उनके अंदर कामभाव इतना प्रबल था कि पिता के मृयुशैय्या पर होने भी वे कस्तूरबा के पास संसर्ग के लिए चले गए थे जो कि उस समय कुछ महीनों की गर्भवती थीं। इसी बीच उनके पिता की मृत्यु हो गई और दूसरी ओर संभवतः इसी कारण गर्भस्थ शिशु का भी देहांत हो गया था। इतनी वासनामय जीवन जीने वाले गांधी जी ने जब 1906 में ब्रह्मचर्य का व्रत लिया तो इसके पीछे वासना से उनकी विरक्ति नहीं थी। इसका कारण केवल आंदोलनों में निर्बाध भागेदारी का लोभ था। इसलिए स्त्रियों के प्रति उनके मन में सदैव तीव्र आकर्षण बना रहा। यही कारण भी था कि लगभग पचास वर्ष की आयु में रवींद्रनाथ ठाकुर की भांजी सरला देवी के प्रति उनका आकर्षण इतना बढ़ गया था कि वे उससे विवाह करने चल पड़े थे। उनके अनुयायियों और पुत्रों के हस्तक्षेप के बाद विवाह नहीं किया परंतु उन्हें अपनी आध्यात्मिक पत्नी घोषित कर दिया।

गांधी जी के आध्यात्मिक विकार उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों में सबसे अधिक परिलक्षित होती है। उनके ये विकार  मीराबेन के प्रसंग में, निर्वस्त्र लड़कियों के साथ निर्वस्त्र सोने में, स्नानागार में सुशीला नैयर के साहचर्य आदि प्रसंगों में व्यक्त हुई है। वे महिलाओं को लिखे अपने पत्रों को अकसर प्रेम पत्र बताते थे। वे महिलाओं को अकसर लिखते थे कि आज सोते समय तुम्हारी बहुत याद आएगी। इस रस को वे कभी छोड़ नहीं पाए। गांधी जी ने खुद स्वीकार किया है कि ब्रह्मचर्य का व्रत लेने के बाद चार औरतों ने उन्हें स्त्री के रूप में विचलित किया। इतना ही नहीं तो उन्हें चौथेपन में भी स्वप्नदोष होता रहा।

कुछ यही हाल सत्य और अहिंसा के प्रयोगों का भी था। यदि गांधी जी सत्य के अपने प्रयोग पर डटे होते तो देश विभाजन के समय उन्होंने देश को गलत विश्वास नहीं दिलाया होता। उन्हें पता था कि उनकी बातें नहीं सुनी जा रही हैं, इसके बावजूद वे लोगों को भरोसा दिला रहे थे कि पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा। अहिंसा का मामला भी कुछ कुछ ऐसा ही है। गांधी जी अंत तक अहिंसा के बारे में संभ्रम की अवस्था में रहे। उनके कार्यों से सदैव हिंसक समुदायों को बढ़ावा मिला। देश में सर्वाधिक बड़े दंगे उनके अहिंसक आंदोलनों के दौरान हुए। गांधी जी के तीनों आध्यात्मिक प्रयोग प्रचारोन्मुख रहे हैं। उनका प्रचार तो बहुत किया गया, परंतु उन्हें सफलता नहीं के बराबर मिली।

गांधी जी के बारे में कहा जाता है कि ही वाज ए मैन ऑफ एक्शन यानी कि वे बोलने से अधिक करने पर विश्वास रखते थे। परंतु उनके राजनीतिक जीवन की असफलता यही कही जाएगी कि वे जिन विचारों को जीवन भर बोलते और लिखते रहे, उसके ठीक विरोधी विचारों के समर्थकों को देश में स्थापित करते रहे। उनके जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि सर्वथा उलटे विचारों का होने के बावजूद गांधी जी ने जवाहरलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी क्यों चुना? क्यों गांधी जी समय-समय पर बहुमत और कई बार सर्वसहमति का निरादर करके भी नेहरू को कांग्रेस और देश पर थोपते रहे? नेताजी सुभाष से तो हिंसा के प्रश्न पर उनके मतभेद थे, परंतु सरदार पटेल तो उन्हीं के शिष्य थे, फिर बार-बार गांधी पटेल की कीमत पर नेहरू को आगे क्यों बढ़ाते रहे? यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर किसी भी गांधीवादी के पास नहीं है। देश में आज सरकार के कागज के नोटों पर तो गांधी के चित्र हैं परंतु सरकार की नीतियों से गांधी जी पूरी तरह गायब हैं। जवाहरलाल नेहरू जी ने 1945 में साफ-साफ कह दिया था कि वे गांधी जी की ग्राम स्वराज की संकल्पना से बिल्कुल सहमत नहीं हैं और कांग्रेस में उस पर कभी भी विचार नहीं किया गया। नेहरू जी ने गांधी जी के सारे प्रश्नों को सिरे से खारिज कर दिया था और ऐसा नहीं है कि 1945 में नेहरू पहली बार ऐसा बोल रहे थे। इससे पहले वर्ष 1928 से ही वे गांधी जी की नीतियों से अपनी असहमति व्यक्त करते रहे हैं।

महात्मा गांधी के जीवन का सम्पूर्ण मूल्यांकन किसी एक आलेख में तो संभव नहीं है, परंतु यदि हम उपरोक्त तीन आयामों की कसौटी पर कसें तो महात्मा गांधी बहुत सफल नजर नहीं आते। इसके बावजूद यह मानने में भी किसी को कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि महात्मा गांधी की स्वीकार्यता पिछले दो शताब्दी के महापुरूषों में सर्वाधिक है। समझने की बात यह है कि गांधी जी जिन विषयों पर सफल रहे हैं, आज उनके अनुयायी, उन विषयों को छोड़ कर उन विषयों पर ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं जिन पर गांधी जी बुरी तरह असफल रहे हैं। सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ाने के लिए आज गांधी जी का नाम सबसे अधिक लिया जाता है परंतु कोई यह विचार करने के लिए तैयार नहीं होता कि यदि गांधी जी के किए सांप्रदायिक सद्भाव यानी कि हिंदू-मुस्लिम एकता बढ़ी होती तो जिस बंगाल का प्रशासनिक विभाजन मजहबी आधार पर 1905 में अंग्रेज नहीं कर पाए थे, उसी बंगाल का मजहबी आधार पर देश-विभाजन 1947 में कैसे हो गया? आखिर इन 42 वर्षों में हिंदू-मुस्लिम एकता कमजोर कैसे पड़ गई? इसके लिए केवल अंग्रेजों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए जिस प्रश्न पर गांधी जी घोर असफल रहे हैं, केवल उन्हीं मुद्दों पर उनका नाम लेना किसी गंभीर राजनीतिक साजिश की ओर संकेत करता है।

महात्मा गांधी जिन मुद्दों पर सर्वाधिक सफल हैं, आज उन विषयों को सर्वाधिक स्मरण किये जाने की आवश्यकता है। ग्रामआधारित शासन व अर्थ व्यवस्था, सत्ता का विकेंद्रण, शासन की बजाय समाजोन्मुख व्यवस्थाएं और सबल, स्वाभिमानी व सशक्त समाज की रचना के उनके सफल प्रयोगों पर आज चर्चा किए जाने की अधिक आवश्यकता है बजाय कि हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए किए गए विफल प्रयासों के।

 

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हिंदुत्व पर घमासान

Posted by bhartiyapaksha on जुलाई 18, 2014

हिंदुत्व एक बार फिर विवादों में है। इस बार यह विवाद राजनीतिक नहीं है। यह बौद्धिक विवाद है। हिंदुत्व पर अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका वेडी डोनिगर ने एक पुस्तक लिखी है और इस पर ही विवाद खड़ा हो गया है। वेंडी डोनिगर की पुस्तक “दि हिंदू, एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ पर भारत में शिक्षा और पाठ्यक्रम पर काम करने वाली एक संस्था ‘शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति’ ने सवाल खड़े किए और इसके विरोध में देश भर में प्रदर्शन भी किए। उनका आरोप था कि पुस्तक में वेंडी डोनिगर ने जानबूझकर हिंदुओं और उनके धर्मग्रंथो व प्रतीकों को बदनाम करने के लिए गलत तथ्य प्रस्तुत किए हैं और हिंदू प्रतीकों की मनमानी व अपमानजनक व्याख्यायें की हैं। बाद में वे पुस्तक और उसके प्रकाशक पेंग्विन इंडिया के विरूद्ध न्यायालय में गए और प्रकाशक ने समझौता करते हुए पुस्तक को वापस लेने की घोषणा कर दी। न्यायालय में इस आशय का शपथ पत्र भी दाखिल कर दिया गया। हैरत की बात यह है कि इसके बाद देश में वेंडी के समर्थन में काफी लोग खड़े हो गए।

क्या हैं आरोप?
शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति के राष्ट्रीय संयोजक दीनानाथ बत्रा का आरोप है कि वेंडी डोनिगर की यह पुस्तक ‘सेक्स और कामुकता’ पर आधारित है। वे कहते हैं, “किताब के मुख्य पृष्ठ पर छपी तस्वीर तो आपत्तिजनक है ही, साथ ही किताब में देवी देवताओं और महापुरुषों के बारे में भी ओछी टिप्पणियां की गई हैं। पूरे समाज की भावनाओं को इससे ठेस पहुंचती है।” समिति के सह संयोजक अतुल कोठारी पुस्तक के आपत्तिजनक अंशों की पूरी सूची देते हुए कहते हैं, “वेंडी डोनिगर का उद्देश्य ही ठीक नहीं है। वे स्वयं ही स्वीकार करती हैं कि यह पुस्तक उन्होंने एक सभा में उन पर अंडा फेंके जाने की प्रतिक्रिया में लिखी है। इस पुस्तक को पढ़ने से प्रतीत होता है कि वेंडी केवल हिंदुओं ही नहीं, बल्कि पूरे भारत को नीचा दिखाना चाहती है। इसलिए इसमें हिंदू देवताओं और भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए अपमानजनक बातें कही गई हैं।” समिति का आरोप है कि जानबूझ कर पुस्तक में कश्मीर को भारत से अलग दिखाया गया है। कोठारी आगे एक लंबी सूची देते हैं जिसमें बताया गया है कि किस प्रकार वेंडी ने इस पुस्तक में भारत के आदर्श महापुरूषों और स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान किया है।

यह बात सही है कि वेंडी की पुस्तक को यदि आप पढ़ें तो वह एक अत्यंत ही छिछली और सतही नजर आती है जो अकादमिक तो कतई नहीं है और जिसमें इतिहास जैसा भी कुछ नहीं है। सबसे पहले वेंडी लिखती हैं कि वे संस्कृत और वैदिक व पौराणिक साहित्य जैसे उपलब्ध स्रोतों के आधार पर यह इतिहास नहीं लिख रहीं हैं। वे इनके समानांतर रहे साहित्य के आधार पर यह पुस्तक लिख रही हैं। परंतु क्या वह समानांतर साहित्य उपलब्ध है? नहीं। फिर उनका आधार वेंडी ने कैसे लिया? वेंडी लिखती हैं कि वे यह मान कर चल रही हैं कि जो भी प्रतीक या व्याख्यायें या घटनाएं संस्कृत व वैदिक साहित्य में वर्णित हैं वे किसी न किसी स्थानीय व समकालीन समानांतर साहित्य या घटना की प्रतिक्रिया में लिखी गई हैं। वह साहित्य या घटना क्या रही होगी, इसकी कल्पना करके यह सारा वृतांत उन्होंने लिखा है। जैसे कि यदि कहीं यह बताया गया है कि मांस खाना उचित नहीं है तो इसका सीधा अर्थ वेंडी ने यह निकाला है कि उन दिनों खुल कर मांसाहार किया जाता था।

यदि आप वेंडी की इस पुस्तक के अध्यायों के चयन को देखेंगे तो इससे भी वेंडी की मानसिकता का पता चल जाएगा। कई अध्याय उन्होंने काम वासना और दलित व स्त्रियों के प्रति हिंसा को केंद्र में रख कर बनाए हैं। वेंडी की एक और बात हैरान करती है, वे कामसूत्र जिसे कि वात्स्यायन द्वारा रचित बताया जाता है, को भारतीय दर्शनों में रखती हैं। वे वैदिक साहित्य के सभी प्रतीकों और आदर्शों की व्याख्या में कामसूत्र का सहारा लेती हैं। वेंडी लिखती हैं कि उन्होंने इस पुस्तक को लिखने में वैदिक साहित्य केवल उन हिस्सों पर ध्यान दिया है जिनमें यौनाचार के बारे में कुछ लिखा है। वे मानती है कि इससे भारत से बाहर के वे लोग जो हिंदुत्व को केवल एक संकुचित जाति व्यवस्था के रूप में देखते हैं, इसे एक उदार और खुले विचारों के रूप में देख पाएंगे।
कामसूत्र वेंडी पर इतना हावी है कि वे राजा के लिए बताए गए कर्तव्यों तक की कामसूत्र में वर्णित कामुक प्रेमी के कामों से तुलना करती हैं। परंतु भारतीय दर्शन का एक साधारण विद्यार्थी भी बता सकता है कि कामसूत्र किसी भी दृष्टिकोण से भारतीय दर्शन का हिस्सा नहीं हैं और न ही प्राचीन भारतीय शास्त्र इसका कहीं उल्लेख करते हैं। इसलिए कामसूत्रों के आधार पर वैदिक सिद्धांतों को समझने के प्रयास को अकादमिक तो नहीं ही कहा जा सकता है। इसे पढ़ते हुए वेंडी डोनिगर की अल्पज्ञता, नासमझी, छिछलापन और सतहीपने को आप देख पाएंगे, जोकि उन्हें यूरो-अमेरीकी अभिजात्य मानस से मिला है। यूरो अमेरिकी अभिजात्य मानस की विशेषता है कि वह अपने साथ घटी घटनाओं से ही पूरी दुनिया को समझना चाहता है। तो जो अमेरिका और इंग्लैंड में हुआ, वही भारत में भी हुआ होगा।

परंतु तमाम अज्ञानता के बाद भी वेंडी ने अनेक तथ्यों को स्वीकार किया है जो आश्चर्यजनक हैं। पहली बात जो उन्होंने स्वीकार की है, वह है कि ग्रीस से भारतीयों ने काफी कुछ लिया परंतु समलैंगिकता नहीं ली। वे चकित भी हैं कि ऐसा क्यों हुआ? ऐसे और भी अनेक बातें हैं जो इस पुस्तक से निकाली जा सकती हैं और जिसे भारत के बारे में फैलाए गए भ्रमों के निवारण के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके अलावा भारतीय शास्त्रों का सामान्य परिचय भी रखने वाला विद्यार्थी भी वेंडी के विश्लेषण की निरर्थकता को समझ लेगा।

विरोध का विरोध
बहरहाल, चूंकि शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति के लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैं, वेंडी डोनिगर के पक्ष में देश का एक तबका उठ खड़ा हुआ। जैसे ही आज से चार साल पहले समिति ने वेंडी का विरोध करना शुरू किया, एक तबका वेंडी के समर्थन में उतर आया। दुख की बात यह थी कि वे वेंडी की पुस्तक का उसकी गुणवत्ता के कारण समर्थन नहीं कर रहे थे, वे केवल समिति के विरोध करने का विरोध करने के लिए वेंडी का समर्थन कर रहे थे। इसके लिए यह तबका अब भारत के कानूनों को ही कोसने में जुट गया है क्योंकि वेंडी की पुस्तक के खिलाफ कानूनी मामला काफी मजबूत है। स्वयं वेडी ने कहा है कि भारत के कानून अत्यंत क्रूर हैं और यह दीवानी नहीं, फ़ौजदारी धाराओं में किया गया मुक़दमा है और उसके नतीजे शारीरिक तौर पर प्रकाशक और लेखक के लिए ख़तरनाक हो सकते हैं।

मतलब साफ है कि यदि कानून हमारे अनुसार फैसले सुनाए तो कानून ही सर्वोपरि है और हमारे विरोध में फेसला आ जाए तो कानून ही गलत है। कानून और संविधान की ऐसी मनमानी ताबेदारी करने वाले इस बौद्धिक जमात ने वेंडी की पुस्तक की गंभीरता और गुणवत्ता की समीक्षा किए बिना पुरस्कृत करना भी शुरू कर दिया। इसे आश्चर्यजनक ही माना जाएगा कि दो वर्ष पहले पत्रकारिता के लिए दिए जाने वाले रामनाथ गोयनका पुरस्कार से वेंडी को भी सम्मानित कर दिया गया। वह भी तब जब वेंडी के विरोध में चार वर्षों से प्रदर्शन किए जा रहे थे और पुस्तक की तथ्यात्मक मंगलतियों और लेखिका की नीयत की समीक्षा किए बिना। यहां यह जानना दिलचस्प है कि अमेरिका जहां कि लेखिका रहने वाली है, में लेखिका वेंडी डोनिगर को एक सम्मान दिया जाना था, परंतु उसे इस विरोध प्रदर्शन के कारण रोक दिया गया।

पांचजन्य के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार और इतिहासविद् देवेंद्र स्वरूप वेंडी के समर्थकों पर सवाल खड़ा करते हुए लिखते हैं, ‘पेंगुविन पर गालियां बरसा रहे बुद्धिजीवियों में बड़ी संख्या उन मार्क्सवादियों की है जिन्होंने प.बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा बंगलादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन की पुस्तकों पर प्रतिबंध लगा दिया था। केवल इस आधार पर इन पुस्तकों से मुस्लिम भावनाओं को आघात पहुंचता है। मुस्लिम भावनाओं की रक्षा के लिए ही वहां की कम्युनिस्ट सरकार ने बंगलादेश में मजहबी कट्टरवादियों के उत्पीडि़त तसलीमा को प.बंगाल में शरण नहीं लेने दिया, जिसके कारण उसे दर-दर भटकना पड़ा।’ इसी क्रम में देवेंद्र स्वरूप सलमान रूश्दी का भी उल्लेख करते हैं जो निर्वासन का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

फतवा बनाम विरोध
देखा जाए तो तसलीमा नसरीन व सलमान रूश्दी और वेंडी डोनिगर अंतरराष्ट्रीय ख्याति के लेखक हैं और इनमें एक समानता और एक अंतर है। समानता यह है कि इन तीनों की पुस्तकों का विरोध किया गया। अंतर यह है कि तसलीमा नसरीन और सलमान रूश्दी की पुस्तकों का विरोध मुस्लिम कट्टरपंथियों ने किया था और उन्हें जान से मार दिए जाने की धमकी भी दी हुई है। परिणामस्वरूप दोनों ही अपने-अपने देशों से निर्वासित हैं। परंतु इन लेखकों के विरोध में कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई और कानूनन उनकी पुस्तकें सही होने के कारण पूरी दुनिया में खरीदी-बेची जाती हैं। साथ ही पूरी दुनिया में उनका सम्मान भी बढ़ा है। परंतु भारत में इन दोनों ही लेखकों का प्रवेश कानून वैध होने के बावजूद मुस्लिम कट्टरपंथियों के विरोध के कारण संभव नहीं है। केवल दो वर्ष पहले 2012 में सलमान रूश्दी को जयपुर साहित्य महोत्सव में आना रद्द करना पड़ा था। दूसरी ओर वेंडी डोनिगर की पुस्तक का विरोध हिंदू संगठनों ने किया। उन पर मुकदमा दायर किया गया। इस पर उनकी पुस्तक को प्रकाशक ने वापस ले लिया। अब वह पुस्तक कानूनन बाजार में नहीं बिकेगी। वेंडी डोनिगर को जान का तो कोई खतरा नहीं है, परंतु उनका सम्मान घट गया है। उनको अमेरिका एक पुरस्कार दिया जाना था जो अब नहीं दिया जा रहा है और उनकी विद्वता संदेह के घेरे में आ गई है।

इसलिए भारत में वेंडी डोनिगर का जो विरोध किया गया है, उसकी तुलना मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा किए गए तसलीमा नसरीन और सलमान रूश्दी के विरोध से नहीं की जा सकती। इस विरोध के विरोध में जो भी बुद्धिजीवी तालीबानीकरण या फासीवादी जैसे आरोप लगा रहे हैं, उसे सही नहीं ठहराया जा सकता, परंतु क्या किसी पुस्तक का विरोध करने का एकमात्र तरीका उसका प्रसार बंद करवा देना भर ही है? जैसा कि प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने कहा कि अगर किसी को कोई किताब पसंद नहीं आती है तो उसका जवाब है एक और किताब। न कि उस पर प्रतिबंध, या क़ानूनी कार्रवाई या मार पिटाई की धमकी। यदि हम ध्यान दें तो पाएंगे कि वेंडी डोनिगर पर जिन गलत तथ्यों को प्रस्तुत करने का आरोप है, उनमें से वहुत सारे तथ्यों का उल्लेख भारत में ही कई लेखक अक्सर करते रहते हैं। उदाहरण के लिए महात्मा गांधी के कमउम्र लड़कियों के साथ सोने की बात है। इस पर विदेश के साथ-साथ देश में भी इतना कुछ लिखा गया कि प्रसिद्ध गांधीवादी और जनसत्ता के संपादक रहे स्व. प्रभाष जोशी ने बड़े ही दुख से एक आलेख लिखा था – यह सच्चरित्रों का गांव, गांधी तुम लौट जाओ।

इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद के गोमांस के पक्ष में बोले जाने के विषय पर भी काफी विवाद है। एक समय वह विवाद इतना गहरा गया था कि स्वयं स्वामी विवेकानंद ने उससे काफी क्षुब्ध होकर अपने एक पत्र में इसका प्रतिवाद लिखा था। भारत में ही रामायण के कई प्रकार मिलते हैं और जिनमें कई ऐसी बातें लिखी हैं जो आम जनमानस को काफी आपत्तिजनक प्रतीत हो सकती हैं। इसी प्रकार शिवलिंग को लेकर सभी प्रकार की व्याख्याएं भारत में ही मिल जाती हैं, उसके लिए किसी वेंडी डोनिगर को पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। उदाहरण के लिए वेदों की महीधर ने काफी अश्लील व्याख्या की है। इसी प्रकार तंत्र ग्रंथों और कई पुराणों में भी काफी अश्लील बातें लिखी हैं। फिर विरोध केवल वेंडी डोनिगर का ही क्यों? क्या उन ग्रंथों का भी विरोध नहीं किया जाना चाहिए? इन प्रश्नों के उत्तर में शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति के सह संयोजक अतुल कोठारी कहते हैं, ‘उन ग्रंथों का समाज में कोई प्रयोग नहीं हो रहा है। जैसे अपने यहां जो रामायण धारावाहिक बनाया गया तो वह रामायण के उन विकृत संस्करणों पर नहीं बनी। वह वाल्मीकी रामायण और रामचरितमानस के आधार पर ही बनाई गई। वे विकृत अर्थ और संस्करण भारत में मान्य नहीं हैं और यदि कोई उसके आधार पर विकृत व्याख्या करने की या उन्हें पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रयास करता है तो उसका भी हम विरोध करते हैं और करेंगे।’
बहरहाल, सभी विद्वान इस मत के नहीं हैं। वेदों के प्रसिद्ध विद्वान सुबोध कुमार कहते हैं, ‘भारत की संस्कृति और परंपराएं दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति और परंपरा है। आज दुनिया के वैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करने लगे हैं कि हिमयुग से अप्रभावित रहने के कारण भारत की संस्कृति हजारों-लाखों वर्षों से अक्षुण्ण चली आ रही है। इसलिए मनुष्य जो भी अच्छा-बुरा कर सकता है, उन सबका उदाहरण यहां मिल जाएगा। अगर आपकी रूचि केवल गंदगी, अश्लीलता, कामुकता आदि में हो तो उसकी सामग्री भी खूब मिल जाएगी। आप कई पुस्तकें लिख सकते हैं और वह खूब बिकेगी भी।’ सुबोध कुमार आगे मिस कैथरीन मेयो की पुस्तक मदर इंडिया का उल्लेख करते हुए बताते हैं, ‘मिस मेयो की पुस्तक तो इतनी अधिक अश्लील थी कि उसके बारे में महात्मा गांधी ने कहा था कि दिस इज ए रिपोर्ट बाई ए ड्रेन इंस्पेक्टर अर्थात् वह पुस्तक किसी गंदी नाली जांचने वाली की है। इसलिए वेंडी डोनिगर की इस पुस्तक की उपेक्षा ही की जानी चाहिए।’

इंडोलोजी का भ्रमजाल
यहां यह जानना भी रोचक होगा कि वेंडी डोनिगर यहूदी मूल की एक अमरीकी इंडोलॉजिस्ट हैं। इंडोलॉजिस्ट का अर्थ है- भारतविद्। लेकिन इस शब्द का प्रयोग अकादमिक दृष्टि से कम और राजनीतिक दृष्टि से ज्यादा किया जाता है। यह एक तथ्य है कि भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान अंग्रेज सरकार को राज करने के लिए ऐसे पढ़े-लिखे लोगों की जरूरत हुई, जो भारत, हिन्दू परम्पराओं, हिन्दू रिवाजों, संस्कृत भाषा और यहां के इतिहास का ज्ञान रखें और इसकी अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियों और अभिजात्य मानस के अनुकूल व्याख्या कर सकें। उन्होंने भारत को एक औपनिवेशिक और नस्लभेदी दृष्टि से देखने के विशेषज्ञ तैयार किए और उन्हें ही इंडोलोजिस्ट कहा। वेद, पुराण, हिन्दू प्रतीक, हिन्दू संत, देवी-देवता, परम्पराएं- सभी घृणा और हेयता की दृष्टि के साथ देखे गए, उनकी नई व्याख्याएं की गई, उनका वैकल्पिक इतिहास लिखा गया। वेंडी डोनिगर उसी श्रृंखला की आधुनिक कड़ी है।

इसका विरोध देश में व्यापक रूप से हुआ। आर्य समाज के विद्वानों से लेकर योगी अरविंद, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक जैसे विद्वानों ने इन इंडोलोजिस्टों का पर्याप्त खंडन किया और सही अर्थों को बतलाते हुए हजारों पुस्तकों की रचनाएं की। आज भी ऐसे विद्वानों की कमी नहीं है। उदाहरण के लिए एक विदुषी महिला हैं कमलेश कपूर। कमलेश कपूर अमेरीका में रहती हैं। उन्होंने अमेरीका में भारत और हिंदू धर्म के प्रति फैली अज्ञानता और इन इंडोलोजिस्टों का काम देखा तो उन्होंने एक पुस्तक लिखने की आवश्यकता महसूस की। इस पर उन्होंने दो पुस्तकें लिखीं, हिस्ट्री ऑफ एन्शिएंट इंडिया और हिंदू धर्म – ए टीचिंग गाइड। परंतु उन पुस्तकों को भारत में किसी प्रकाशक ने प्रकाशित नहीं किया। वे उन्हें बाहर ही प्रकाशित करवानी पड़ीं।

यदि रामचंद्र गुहा की बात कि ‘अगर किसी को कोई किताब पसंद नहीं आती है तो उसका जवाब है एक और किताब’ को आगे बढ़ाया जाए तो सवाल खड़ा होता है कि जो ऐसी पुस्तकें लिख रहे हैं, उन पर भारत के बुद्धिजीवियों का यह तबका ध्यान क्यों नहीं दे रहा है? रामनाथ गोयनका पुरस्कार देने के लिए उन्हें वेंडी डोनिगर की बजाय कमलेश कपूर का नाम क्यों नहीं सूझा? आखिर अपने देश के बारे में विकृत चित्रण करने वालों की पुस्तकें ही पाठ्यक्रम में क्यों संस्तुत की जाती हैं? यदि उन्हें अलग दृष्टिकोण के अध्ययन के लिए संस्तुत किया जा रहा है तो जो उनका उत्तर लिख रहे हैं, वे पुस्तकें क्यों उपेक्षित हैं?

कहा जा सकता है कि यदि किसी पुस्तक और लेखक के विरोध का यह तरीका सही नहीं है तो किसी पुस्तक और लेखक के समर्थन का भी यह तरीका ठीक नहीं है। समर्थन व विरोध के इस खेल में यदि नुकसान हो रहा है तो देश के बौद्धिक जगत के हो रहा है। समर्थन व विरोध के इस खेल से देश में स्वस्थ बौद्धिक वातावरण नहीं बन पा रहा है। समर्थन और विरोध में दिए जाने वाले ऐसे बौद्धिक फतवों कारण कोई बौद्धिक विमर्श खड़ा नहीं हो पा रहा। यदि ये फतवे नहीं होते तो शायद वेंडी डोनिगर की पुस्तक भी यूं ही गुमनामी के अंधेरे में खो जाती जैसे कि मिस मेयो की मदर इंडिया खो गई है।

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गरीबी उन्मूलन, पशुपालन और गाय

Posted by bhartiyapaksha on मई 30, 2014

गरीबी हटाओ का चुनावजिताऊ नारा 1969 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिया था और इस नारे ने इंदिरा गांधी को 1971 के चुनावों में जबरदस्त सफलता भी दिलाई। तब से देश में गरीबी को समाप्त करने के प्रयासों में काफी तेजी आ गई है। परंतु कहावत है कि मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की, कुछ यही हालत गरीबी हटाओ कार्यक्रम की भी हुई। नारे बदलते गए और गरीबी भी बढ़ती गई। आज हालात गरीबी से भुखमरी की ओर बढ़ गए हैं और सरकार को विवश होकर खाद्य सुरक्षा कानून लाना पड़ा है। इससे पहले स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से ही देश में गरीबो को भोजन उपलब्ध कराने के लिए जनवितरण प्रणाली लागू की गई थी। यह प्रणाली भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई और आज इससे गरीबों को भोजन के लिए राशन नहीं मिल पा रहा है। इसकी असफलता को स्वयं सरकार भी स्वीकार चुकी है और इसलिए उसने कैश-ट्रांसफर यानी कि नगदी हस्तांतरण की योजना शुरू कर दिया है।

सरकार ने जनवितरण प्रणाली की असफलता केवल एक मायने में स्वीकार की है और वह है लाभार्थियों तक राशन का न पहुंचना। परंतु इसकी असफलता का एक पहलू और है जिसका अध्ययन नहीं किया गया है। यह पहलू है कि जिन लाभार्थियों तक राशन पहुंच रहा था, क्या उनके आर्थिक स्तर में भी कुछ सुधार आया है? इस दृष्टि से सरकार ने कोई अध्ययन नहीं किया। अंग्रेजी में एक कहावत है द पुअर नीड ए रॉड, नॉट फिश, इसका अर्थ है गरीब को मछली नहीं, बल्कि मछली पकड़ने वाले कांटे की जरूरत होती है जिससे वह स्वयं अपने लिए मछली पकड़ सके। मछली देने का अर्थ है उसे परावलंबी बनाना, जबकि कांटा देने का अर्थ है उसे स्वावलंबी बनाना। सरकार की जितनी भी नीतियां हैं, चाहे वह जनवितरण प्रणाली हो या मिड डे मील हो या फिर खाद्य सुरक्षा हो, सभी गरीबों को परावलंबी बनाने वाली योजनाएं हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि अरबों-खरबों रूपये खर्च करने के बाद भी गरीबी बढ़ ही रही है। साथ ही इन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए लिए जाने वाले कर्जों और करों के कारण देश में मंहगाई और अन्यान्य आर्थिक संकट भी तेजी से बढ़ रहे हैं।

सवाल है कि इसका समाधान क्या है? देखा जाए तो इस स्थिति का समाधान काफी पहले महात्मा गांधी ने बता रखा है। महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज का जो चित्र खींचा है उसमें गरीबी उन्मूलन का सीधा फार्मूला दिया गया है। स्वाधीनता के बाद से लेकर आज तक देश की जनसंख्या का एक बड़ा प्रतिशत गांवों में रहता है और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वह आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है। महात्मा गांधी ने खेती और पशुपालन को जोड़ कर देखने का सुझाव दिया था। उनका मानना था कि खेती और पशुपालन अन्योन्यश्रित हैं। दुर्भाग्यवश देश में जो हरित क्रांति की गई, यूरोपीय तकनीक के अंधानुकरण की नीतियों के कारण उसमें पशुओं की भूमिका न्यूनतम थी। पशुओं से लिए जाने वाले कामों के लिए मशीनें और रसायनों के उपयोग को बढ़ावा दिया गया। इसका लाभ तो मिला परंतु गरीबों को नहीं। इसका लाभ केवल वे किसान उठा पाए जिनके पास काफी जमीनें थी और इस कारण जो पहले से ही काफी संपन्न थे, परंतु इसका उन छोटे और मध्यम वर्ग के किसानों को बिल्कुल भी नहीं मिला जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन थी और जो आर्थिक रूप से भी पिछड़े थे। उलटे बढ़ती मंहगाई और मशीनीकरण व रासायनीकरण के कारण खेती की बढ़ती लागत ने उनकी कमर तोड़ दी और वे कर्ज में डूबते चले गए। इसका ही परिणाम पिछले कुछ वर्षों में किसान आत्महत्याओं के रूप में सामने आया। एग्री सेंशस 2012 के अनुसार 893.50 लाख किसानों में से 749.67 लाख यानी कि 84 प्रतिशत किसान दो हैक्टेयर से कम जोत वाले हैं और इनमें से लगभग आधे 346.95 लाख किसान कर्ज में डूबे हुए हैं(देखें टेबल)।No and Area of Landholdings Indebtness of Indian Farmers समझा जा सकता है कि इतनी छोटी जोत वाले किसानों को यदि कर्ज लेना पड़े तो उसे चुकाना उसके लिए कितना कठिन हो सकता है।

पशुपालन का गरीबी उन्मूलन से संबंध आज संयुक्त राष्ट्र भी समझने लगा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन ने इस पर एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की है। उसके अनुसार खेती में गायों के उपयोग से गांवों की गरीबी दूर की जा सकती है। उसका यह भी मानना है कि गायों से प्रति हेक्टेयर उपज भी बढ़ाई जा सकती है और वह भी बिना जमीन खराब किए। हैरत की बात यह है कि वह गायों के रख-रखाव के लिए भारत की प्राचीन व्यवस्था सामूहिक गोचर भूमि रखे जाने की बात करता है। यह रिपोर्ट बताती है कि गायों से ही किसानों को न केवल अतिरिक्त आय हो सकती है बल्कि यह कृषि के संभावित खतरों को भी कम करती है और उसकी बचत को बढ़ाती है। कुछ वर्ष पूर्व रवांडा ने गाय से गरीबी उन्मूलन का एक सफल प्रयोग किया। वहां की सरकार ने एक योजना के तहत प्रत्येक परिवार को एक गाय दी। वह गाय उसके लिए कम से कम भोजन और थोड़ी बहुत आय का साधन बन जाएगी। इससे उसकी गरीबी दूर होगी। यूनिसेफ और अन्य कई संगठनों की रिपोर्ट है कि इससे वहां की गरीब जनता के जीवन स्तर में काफी सुधार आया। अफ्रीकन स्मॉलहोल्डर फॉरमर्स ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार इस योजना में शामिल 88 प्रतिशत किसानों की आय बढ़ गई और उनकी हालत सुधरी। उनकी खेती अच्छी हुई और दूध से भी आय बढ़ी। दूध से उन्हें पोषण भी प्राप्त हुआ। ऐसा ही एक प्रयोग वियतनाम में भी किया गया था। वहां पांच परिवारों पर एक गाय दी गई थी। इस प्रकार का एक प्रयोग अपने देश में गुजरात में भी किया गया है। वहां जनजातीय क्षेत्र के किसानों को गोशालाओं से निःशुल्क बैल दिये गए। इससे उनकी कृषि लागत घटी और उनकी आय बढ़ी। अब उन किसानों को गाय देने की भी योजना बनाई जा रही है।

इस प्रकार हम पाते हैं कि पशुपालन से गरीबी उन्मूलन पर विश्व में कई प्रयोग हो रहे हैं और वे सफल भी हो रहे हैं। भारत के संदर्भ में यदि हम देखें तो भारत में गायों की संख्या हमेशा से काफी अधिक रही है। गोपालन की परंपरा भारत की पहचान रही है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत गायों की सबसे सघन आबादी वाला देश है(देखें मानचित्र)। गायों के अलावा भैंसे भी हैं जो केवल भारत में ही पाई जाती हैं। गाय और भैंसों के अलावा सुअर और मुर्गीपालन भारत में होता तो है परंतु वह गाय-भैंसों की तुलना में काफी कम है (देखें मानचित्र)। संख्या के अलावा गाय का खेती में काफी महत्व है। गाय से मिलने वाले गोबर व गोमूत्र से खाद और कीटनियंत्रक बनाए जा सकते हैं जो कि किसान की खेती की लागत कम करने में सहायक होते हैं। इस पर अमरावती, महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर ने जीरो बजट खेती का एक फार्मुला दिया है जिसमें खेती करने के लिए किसान को एक पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ता है और उसकी उपज भी सही बनी रहती है। सुभाष पालेकर के अभियान से महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिनाडु के हजारों किसान जुड़े हैं और उन्होंने सफलता के अनेक कीर्तिमान रचे हैं। इसी प्रकार आंध्र प्रदेश में भी बड़े पैमाने पर सफल प्रयोग किया गया है।

गाय, कृषि और खाद्य सुरक्षा

भारत के अधिकांश यानी कि 83 प्रतिशत किसानों के पास केवल एक या दो एकड़ भूमि ही है (देखें टेबल)। मतलब साफ है इतने छोटे खेतों में ट्रैक्टर से खेती असंभव है। इन खेतों में बैलों से ही खेती संभव है। आज यह सिद्ध हो चुका है कि केवल देसी नस्लों की गायों से उत्पन्न बैल ही मेहनती होते हैं। विदेशी बैल भारतीय परिस्थितियों में काम नहीं कर पाते हैं। ऐसे में गाय ही हमारे अन्न उत्पादन की वृद्धि को सुनिश्चित कर सकती है। इसके अतिरिक्त हम बैलों का कटी फसल की ढुलाई, सिंचाई के कामों में, उसके गोबर का खाद और गोमूत्र का कीट नाशक के रूप में उपयोग करते हैं। गोबर की खाद फसल में नाइट्रोजन की मात्रा को संतुलित रखती है। फसलों में नाइट्रोजन की बढ़ी हुई मात्रा से ही कीटों का प्रकोप बढ़ता है। यूरिया आदि रसायन फसलों में नाइट्रोजन की मात्रा आवश्यकता से अधिक बढ़ा देते हैं, परिणामस्वरूप कीटों का प्रकोप भी काफी बढ़ जाता है। इस प्रकार गोबर की खाद स्वाभाविक रूप से कीटों को फसल से दूर रखती है। एक आकलन के अनुसार एक गाय का गोबर 5 एकड़ भूमि को खाद उपलब्ध करा सकता है और उसका मूत्र 100 एकड़ भूमि की फसल को कीटों से बचा सकता है।

बकरी की मींग भी अच्छी खाद होती है। देश में जहां भी बकरी पालन होता है वहां इसकी मींग को भी खेतों में डाला जाता है। देश के कई हिस्सों खासकर मध्य प्रदेश के इलाकों में बकरी पालने वाले समूहों को लोग अपने गांव में आमंत्रित करते हैं। वे अपनी बकरियों के साथ गांवों में घूमते हैं। इसके लिए गांव वाले उनके भोजन आदि का प्रबंध करते हैं। इन समूहों की आजीविका का स्रोत ही यही है।

इसके अलावा जुताई के समय बैलों की चाल हल्की होती है। जुताई करते समय गिरनेवाले गोबर और गोमूत्र से भूमि में स्वत: खाद डलती जाती है। गोबर की जैविक खाद, हरी पत्तियों की खाद, प्रकृति के साथ मिलकर भूमि को उपजाऊ बनाते हैं। ये रासायनिक कूड़े की समस्या भी नहीं पैदा करते हैं। खेती प्रयोग किए जाने वाले रसायनों से होने वाली ग्रीनहाउस गैसों की समस्या पर संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसके अनुसार ये रसायन(यूरिया, डीएपी आदि) ग्रीनहाउस प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत हैं। गोबर खाद के प्रयोग से हम इस प्रदूषण से भी बच सकते हैं। इसकी एवज में कार्बन फुटप्रिंट के रूप में देश को अतिरिक्त आय भी हो सकती है।

गाय के खेती में उपयोग से एक बड़ा फायदा पानी की बचत का है। गोबर खाद से की जाने वाली खेती में पानी की आवश्यकता काफी कम होती है – रासायनिक खेती की तुलना में एक चौथाई। इसका सीधा फायदा किसानों को होगा। पानी के लिए उसे बिजली की जरूरत कम पड़ेगी जिससे उसकी खेती की लागत घट जाएगी। इस प्रकार गाय से किसानों को खाद, कीटनाशकों और पानी-बिजली की लागत की सीधी बचत होगी जिससे उसे कम से कम खेती करने के लिए कर्ज लेने की जरूरत नहीं रहेगी और इससे देश में किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याएं रूकेंगी।

इसके अलावा गाय का दूध किसान के लिए एक अतिरिक्त उत्पाद है। गाय अगर कम दूध देने वाली हो तो भी उसके परिवार के लिए वह पर्याप्त दूध दे सकती है। यदि अधिक दूध देने वाली गाय हो तो वह उसके लिए अतिरिक्त आय का साधन हो सकती है। साथ ही दूध एक उत्तम भोजन है। यह अन्न से श्रेष्ठ भोजन है। केवल अन्न का सेवन करने वाला कुपोषण का शिकार हो सकता है परंतु केवल दूध का सेवन करने वाला नहीं।

इस प्रकार गाय लोगों को कम खर्च में अच्छा भोजन देती है। खाद्य सुरक्षा के लिए इसका कोई विकल्प नहीं है। खाद्य सुरक्षा में सबसे महत्वपूर्ण बात है जीरो फूड माइल यानी कि निकटतम दूरी में भोजन की उपलब्धता की। गाय इसे सुनिश्चित करने का एक मात्र विकल्प है। हर घर में गाय हो तो उसे घर में भोजन उपलब्ध है। साथ ही गाय का कृषि में उपयोग स्थानीय स्तर पर कृषि-उत्पाद बढ़ाने में सहायक होगा। इससे किसानों को गांव में ही भोजन के लिए अन्न भी उपलब्ध हो जाएगा।

गाय गांवों में कुटीर उद्योगों को भी बढ़ाने में सहायक होगी। आज गाय के गोबर और गोमूत्र से कई प्रकार के उत्पाद बनाए जा रहे हैं, जो न केवल काफी उपयोगी हैं, बल्कि वे पर्यावरण के अनूकूल भी हैं। अनेक गोशालाओं में इस पर कई प्रयोग हुए हैं। इस समय गाय के गोबर से निम्नलिखित वस्तुएं बनाई जा रही हैं : मच्छररोधी क्वायल, डिस्टेंपर (सादा व आयल), नहाने का साबुन, फेस पाउडर, धूप स्टिक व धूप कांडी, हवन सामग्री, समिधा, पूजन लेप, गोमय कंडे, मुक्ता पाउडर, मुर्तियां, पौधों के लिए गमले, दंत-मंजन, कागज (उत्तम कोटि का), विभिन्न प्रकार के टाइल्स (खपरैल, पानी आग व ध्वनि रोधक तथा रेडिएशन मुक्त), पैकिंग का समान, नालीदार चादरें, जमीन पर बिछाने की मैटिंग, छत पर लगाने के पदार्थ (रूफिंग मैटेरियल), कमरा ठंडा रखने के रखने के खपरैल, बंकर्स के लिए टाइल्स। गोमूत्र से भी अनेकानेक वस्तुएं बनाई जा रहीं हैं : अर्क, फिनाइल (सफेद व काली), नील,हैंडवास,ग्लास क्लीनर, नेत्र ज्योति, कर्ण सुधा, घनवटी, अन्य सुरक्षा, खुरपका मुहपका आदि पशुओं के अन्य रोगों की दवाएं, विभिन्न कीटनियंत्रक (पेस्टीसाइड्स), आफ्टर शेव लोशन, मरहम, बाम इत्यादि। इसके अतिरिक्त गोमूत्र का चिकित्सा में उपयोग तो आज विश्व प्रसिद्ध हो चुका है। इस पर गोसंवर्धन केंद्र, नागपुर ने अमेरिका में कई पेटेंट भी लिए हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि अट्ठारहवीं शताब्दी तक देश में खेती और उद्योगों का जो शानदार समन्वय था और जिसके कारण भारत में इतनी समृद्धि थी कि विदेशी आक्रांता लोभवश यहां आते गए, वह गाय के कारण ही था। आज भी यदि बेवजह यांत्रिकीकरण और रसायनों के उपयोग को सरकार बढ़ावा देना बंद कर दे तो सबसे पहला लाभ तो हमारी अर्थ व्यवस्था में उन एक लाख करोड़ रुपयों का हो सकता है जो कृषि अनुदान के नाम पर बहुराष्ट्रीय खादनिर्माता कंपनियों को दिये जाते हैं। उस एक लाख करोड़ रुपये का अगर एक प्रतिशत भी गोपालन में सहायता के नाम पर सीधे किसानों को दे दिया जाए तो वह स्वावलंबी तो बनेगा ही देश की अर्थ व्यवस्था को भी मजबूत कर देगा।

गाय, ऊर्जा और स्थाई विकास

आज देश की ऊर्जा जरूरतें बढ़ रही हैं और उन जरूरतों को पूरा करने के लिए देश की नदियों, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ देश के स्वाभिमान की भी बलि चढ़ाना पड़ रहा है। यदि गोवंश के रूप में उपलब्ध पशु ऊर्जा को विकसित किया जाए तो इन सबसे बचा जा सकता है। परिवहन के साधन के रूप में आज भी हम बैलों पर निर्भरता का विकल्प नहीं ढूंढ पाए हैं। हालात ऐसे हैं राजधानी दिल्ली में भी बैलगाडिय़ां चलती खूब दिखती हैं। ऐसे में उसे नकार कर अन्य विकल्पों में देश का धन बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं है। भारत के 6 लाख गांवों में से अधिकांश में यातायात योग्य डामरवाली सड़कें नहीं हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में जहाँ घोड़े कदम नहीं रख सकते, बैल आसानी से गाड़ियां खींच सकते हैं। बैलगाड़ियों का संवर्धन किया जाए तो सड़कों के निर्माण और उनके बारंबार होने वाले पुनरूद्धार पर होने वाले खर्च को सीमित किया जा सकता है।

परिवहन के अतिरिक्त गोवंश से प्राप्त गोबर से बनाई गई गैस से बिजली का उत्पादन तो आज काफी प्रसिद्ध हो चुका है। पड़ोसी देश नेपाल में सभी 75 जिलों में गोबर गैस से बिजली बनाई जा रही है और इससे घर-घर में रसोई गैस की समस्या का समाधान किया जा रहा है और बिजली भी उपलब्ध कराई जा रही है। इसके लिए उसे अंतरराष्ट्रीय एशडेन पुरस्कार भी मिला है। नाभिकीय ऊर्जा जैसे खतरनाक साधनों पर दिमाग चलाने की बजाय यदि सरकार गोबर गैस पर काम करे तो इससे गांवों में रोजगार का भी सृजन होगा और बिजली भी मिलेगी। एलपीजी पर देश की निर्भरता को समाप्त करने के लिए गोबर गैस से बढिय़ा और कोई विकल्प नहीं है। इसके अलावा गोबर गैस से ऑटो रिक्शा चलाने का प्रयोग भी सफल रहा है।

कहा जा सकता है कि गाय व गोवंश के साथ-साथ पशुपालन देश की पूरी अर्थ व्यवस्था को सुधार सकते हैं, बशर्ते कि हम सोने की अंडा देने वाली मुर्गी का पेट चीर डालने जैसी मूर्खता करना बंद करें। गाय और पशुपालन ही देश की गरीबी, ऊर्जा संकट और भुखमरी समाप्त कर सकती है।

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2013 in review

Posted by bhartiyapaksha on दिसम्बर 31, 2013

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2013 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

A San Francisco cable car holds 60 people. This blog was viewed about 2,600 times in 2013. If it were a cable car, it would take about 43 trips to carry that many people.

Click here to see the complete report.

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सुशासन और भारतीय चिंतन

Posted by bhartiyapaksha on जुलाई 28, 2013

बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के द्वारा वर्ष 2011 और 2012 में देश में दो प्रमुख आंदोलन चलाए गए। पहली दृष्टि में देखा जाए तो दोनों आंदोलन देश की शासन तंत्र की विफलता के विरूद्ध शुरू हुए थे। हालांकि इस शासन तंत्र की विफलता को देश काफी लंबे समय से अनुभव करता रहा है और इसके विरूद्ध कई बड़े आंदोलन भी खड़े हुए परन्तु दुर्भाग्यवश वे न केवल स्वयं दिशाभ्रम के शिकार हुए, बल्कि उनका वास्तविक कारण और उद्देश्य भी ठीक से नहीं समझा जा सका। उदाहरण के लिए जयप्रकाश नारायण द्वारा संचालित 1977 में चलाए गए आंदोलन को देखें तो बात साफ हो जाएगी। यह आंदोलन भी शुरूआत में शासन में बैठे लोगों के भ्रष्टाचार के विरूद्ध ही था परन्तु यह तात्कालिक मुद्दा गंभीर तब बन गया जब जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। लेकिन समस्या यह थी कि जेपी जिन लोगों के दम पर यह आंदोलन कर रहे थे, उनमें से किसी को भी न तो समस्या की और न ही इस आंदोलन की गंभीरता की समझ थी। वे इस समस्या को केवल और केवल कांग्रेस व इंदिरा गाँधी से जोड़ कर देखते थे और समझते थे कि इन दोनों के हट जाने से या फिर बलपूर्वक इन दोनों को सत्ताच्यूत कर देने से समस्या ठीक हो जाएगी। जेपी तो समस्या के मूल को समझते थे परन्तु दुर्भाग्यवश वे भीष्म मानसिकता से ग्रस्त थे यानी कि शासन में सुधार तो चाहते थे लेकिन स्वयं उसमें शामिल नहीं होने की प्रतिज्ञा किए बैठे थे। इसलिए उनके सामने एक ही उपाय था कि वे दूसरे लोगों को इसके लिए तैयार करें। दूसरे लोग तैयार तो हुए परन्तु उनकी मंशा कुछ और ही थी। इसी प्रकार हम और भी कई आंदोलनों को देख सकते हैं जो पैदा तो हुए परन्तु शासन की विफलता के कारण वे शासन तंत्र पर न तो कोई प्रश्न चिह्न ही खड़ा कर पाए और न ही कोई विकल्प ही प्रस्तुत कर सके।

सवाल है कि फिर समाधान क्या है? क्या लोकपाल और कालेधन की समस्या सुलझ जाने से समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या यह समस्या वाकई इतनी ही छोटी है? ध्यान से देखा जाए तो यह समस्या का एक छोटा अंश भर ही है। समस्या शासन में बैठे लोगों की विफलता का नहीं, बल्कि शासन की ही असफलता का है। यह तो अब साफ हो चुका है कि शासन अपने सभी उद्देश्यों में असफल हो चुका है। जो उद्देश्य उसने घोषित किए थे, उनमें भी और जो उद्देश्य एक शासन तंत्र के होते हैं उनमें भी। वैसे शासन तंत्र के जो उद्देश्य होने चाहिए, इस व्यवस्था ने उसे पहले से ही गौण बना रखा था और रही सही कसर इसके संचालकों के भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी। सवाल है कि एक शासन तंत्र के उद्देश्य क्या होते हैं या फिर क्या होने चाहिए जिन पर खरा न उतरने के कारण इस शासन तंत्र को ही असफल माना जा रहा है? क्या भारत में इससे पहले कोई शासन व्यवस्था रही है जो इससे बेहतर शासन दे सकती हो या फिर देती रही हो? क्या भारत में इससे अधिक सफल और बेहतर शासन प्रणाली को कोई उदाहरण मिलता है? क्या आज के लोकतंत्र का कोई सार्थक विकल्प हमारे पास उपस्थित है?

पहले तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि देश में चल रही संसदीय प्रजातंत्र की व्यवस्था भारत को गुलाम बनाने वाले इंग्लैंड की व्यवस्था की नकल है। दूसरी बात यह जानने की है कि इस संसदीय प्रजातंत्र के बारे में देश के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के विचार क्या थे? यह जानकर हमें हैरानी हो सकती है कि महात्मा गाँधी ने इस व्यवस्था को सिरे से ही खारिज कर दिया था। उनका साफ-साफ मानना था कि यह व्यवस्था एकदम ही बेकार की है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज में वे लिखते हैं, ष्जिसे आप संसद की माता कहते हैं, वह संसद तो बांझ और बेसवा (वेश्या) है। ये दोनों शब्द बहुत कड़े हैं, तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा क्योंकि अब तक उस संसद ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उस पर जोर – दबाव डालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है। और वह बेसवा है क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे उसके पास वह रहती है।
जो सिर्फ डर के कारण ही संसद कुछ काम करती है। जो काम आज किया, वह कल उसे रद्द करना पड़ता है। आज तक एक भी चीज को संसद में ठिकाने लगाया गया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बड़े सवालों की चर्चा जब संसद में चलती है, तब उसके सदस्य पैर फैला कर लेटते हैं या बैठे-बैठे झपकियां लेते हैं। उस संसद में इसके सदस्य इतने जोर से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं।ष् हिन्द स्वराज, पृष्ठ 13-14

भारत में अंग्रेजों की सरकार 1760 में स्थापित हुई थी। हालांकि वो कंपनी की सरकार थी, अंग्रेजों की सरकार नहीं थी, लेकिन छोटे-मोटे कानून उन्होंने उसी समय से बनाना शुरू कर दिया था और उस समय से लेकर 1947 तक अंग्रेजों ने लगभग 34735 कानून बनाये थे। उन्होंने हमें गुलाम बनाने के लिए ये जो व्यवस्थाएं और कानून बनाये थे, दुर्भाग्य से आज भी हमारे देश में सब के सब कानून, सब की सब व्यवस्थाएं वैसे के वैसे ही चल रहीं हैं जैसे अंग्रेजों के समय चला करती थीं।
जब हमारे देश में अंग्रेजों का शासन था तो सभी क्रान्तिकारियों का मानना था कि भारत की गरीबी, भुखमरी और बेकारी तभी ख़त्म होगी जब अंग्रेज यहाँ से जायेंगे और हम अपनी व्यवस्था लायेंगे। उनका संकल्प था कि उन सब तंत्रों को उखाड़ फेकेंगे जिससे गरीबी, बेकारी, भुखमरी पैदा हो रही है। लेकिन हुआ क्या? हमारे देश में आज भी वही व्यवस्था चल रही है जो अंग्रेजों ने गरीबी, बेकारी और भुखमरी पैदा करने के लिए चलाया था।

देश की वर्तमान शासन व्यवस्था की विफलता का एक बड़ा उदाहरण है 1952 से शुरू हुई पंचवार्षिक योजनाएं जो औसतन 10 लाख करोड़ की होती हैं। अभी तक हमारे देश में ग्यारह पंचवार्षिक योजनायें लागू हो चुकी हैं, मतलब अभी तक हमारी सरकार 110 लाख करोड़ रूपये खर्च कर चुकी हैं और गरीबी, बेकारी, भुखमरी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। अंग्रेज जब थे तो ऐसी कोई योजना नहीं थी क्योंकि वो विकास पर कुछ भी खर्च नहीं करते थे और तब हमारी गरीबी नियंत्रण में थी लेकिन जब से हमने पंचवार्षिक योजना शुरू की, हमारी गरीबी भयंकर रूप से बढऩे लगी और बढ़ती ही जा रही है, कहीं रुकने का नाम ही नहीं ले रही है।
वास्तव में आज की शासन व्यवस्था स्वयं को कल्याणकारी राज्य के रूप में घोषित करती है और इस लिए वह शिक्षा और स्वास्थ्य से लेकर व्यापार करना, उत्पादन करना, होटल चलाना और यहां तक कि नालियां बनवाना, सड़कों पर झाड़ू लगवाना जैसे काम भी स्वयं करना चाहती है। इसके लिए उसे सरकारी कर्मचारियों की बड़ी फौज खड़ी करनी पड़ती है और इसके लिए जनता पर करों का भारी भरकम बोझ लादना पड़ता है। इन सारे उपक्रमों के बाद भी सारी चीजें बदहाल ही बनी रहती हैं। करों के बोझ के कारण मंहगाई व गरीबी और बढ़ती जाती है। करों से काम न चलने के कारण सरकार विदेशों से कर्ज लेती रहती है और अंततरू हम आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ते जाते हैं।

यह सारी गड़बड़ केवल एक कारण से हो रही है और वह है राज्य यानी कि शासन व्यवस्था के स्वरूप, उद्देश्यों तथा कर्तव्यों को नहीं समझना। राज्य के स्वरूप, उद्देश्यों तथा कर्तव्यों को समझना हो तो हमें पहले यह समझना पड़ेगा कि दुनिया में शासन व्यवस्था की शुरूआत क्यों और कैसे हुई थी?

राज्य की शुरूआत और उसके कर्तव्य
वैसे तो पाश्चात्य चिंतन में भी राज्य व्यवस्था की शुरूआत की अनेक कल्पनाएं की जाती हैं, परंतु अपने देश में महाभारत में इसका बड़ा ही स्पष्ट वर्णन आता है। महाभारत के शांतिपर्व का एक अत्यंत ही प्रसिद्ध श्लोक है न राज्यं, न वै राजाssसीत्, न दंडो न च दांडिकः। धर्मेणैव प्रजाः सर्वं रक्षन्ति स्म परस्परम्।। इसका अर्थ है प्रारंभ में न तो कोई राजा था, न राज्य, न कोई दंड व्यवस्था थी और न कोई दंड देनेवाला। सभी लोग परस्पर धर्मपूर्वक व्यवहार करते हुए एक दूसरे के हितों की रक्षा किया करते थे।

सामान्यतः समझा जाता है कि यह महाभारतकार ने समाज की आदर्श व्यवस्था का चित्र खीचा है, परंतु वास्तव में यह समाज की प्रारंभिक अवस्था का वर्णन है। प्रारंभ में मानव समाज ऐसा ही था। उसमें लोभ, मद, मोह, मत्सर, ईर्ष्या, चोरी, लूट जैसे अवगुण नहीं थे। अपने परिश्रम से अर्जित संपत्ति से वे संतुष्ट थे क्योंकि वे यजुर्वेद के निर्देश मा गृधः कस्यस्विद्धनम् का पालन करते थे। परंतु महाभारतकार के अनुसार धीरे-धीरे लोगों में लोभ, मद, मोह, मत्सर, ईर्ष्या आदि बढऩे लगे और परिणामस्वरूप समाज में अव्यवस्था फैलने लगी। गम्यागम्य, वाच्य-अवाच्य, भक्ष्य-अभक्ष्य और दोष-अदोष कोई भी बात उनकी दृष्टि में त्याज्य न रही। इस प्रकार मानव समाज में धर्मविपव हो जाने से वेद भी लुप्त होने लगा और वेद का लोप होने से धर्म मर्यादा ही नष्ट हो गयी। इससे देवताओं को बड़ा त्रास हुआ और वे ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्माजी से उन्होंने हाथ जोड़कर कहा भगवन्! मनुष्य लोक में जो सनातन वेद था, उसको लोभ मोह आदि दूषित भावों ने नष्ट कर डाला है, इसमें हमें बडा भय हो रहा है। वेद का नाश होने से धर्म भी नष्ट हो गया है। मनुष्यों ने यज्ञ यागादि सभी शुभकर्म छोड़ दिये हैं इसलिए हम बडे संशय में पड़ गये हैं। आप हमारे लिए जो हितकर हो ऐसा कोई उपाय सोचिये। तब ब्रह्मा ने एक नीतिशास्त्र रचा। उसमें अर्थ, धर्म काम-इन त्रिवर्ग का वर्णन था। वह ग्रन्थ त्रिवर्ग नाम से विख्यात हुआ।

महाभारत में ही इसके बाद बताया गया है कि कालांतर में उसी त्रिवर्ग शास्त्र को सरल करके धर्मशास्त्र की रचना की गई और उसके अनुसार व्यवस्था को लागू करने के लिए एक राजा भी नियुक्त किया गया। इसप्रकार पहला राजा हुआ अनंग। राजा अनंग के बेटे अतिबल को भी राजा बनाया गया जोकि उससे कमजोर प्रशासक सिद्ध हुआ और उसका बेटा वेन बिल्कुल ही विलासी और देवताओं को कष्ट पहुंचाने वाला हो गया। प्रसिद्ध विचारक वैद्य गुरूदत्त अपनी पुस्तक प्रजातंत्र और वर्ण-व्यवस्था में लिखते हैं – वेन तो न केवल सुख भोग करता रहा वरन् अपने अधिकार से देव जनों को कष्ट भी देने लगा। इसके अत्याचार को देखकर तत्कालीन ऋषि एकत्रित हुए और उन्होंने मंत्र पूत कुशों द्वारा (मन्त्रपूतैः कुशैर्जध्नुऋषयो ब्रह्मवादिनः) वेन को मार डाला। उसका अभिप्राय यह कि मन्त्र अर्थात शुभ सम्मति देकर कुशों अर्थात प्रजा जनों को प्ररेणा देकर प्रजा से वेन राजा की हत्या करवा दी। वेन के कई पुत्र थे। उनमें से पृथु को ऋषियों ने राजा बनने के लिए निर्वाचित किय और कुछ शर्तों पर उसे राज्य गद्दी पर बिठा दिया गया। शर्तों में मुख्य यह थीः
1. जिससे नियत धर्म की सिद्धि हो उसको निर्भय होकर करना।
2. प्रिय और अप्रिय का विचार छोड़कर अभिप्राय यह कि अपने और पराये का विचार न करके काम, क्रोध लोभ मोह और मान को दूर हटाकर सब प्राणियों में समभाव रखना।
3. लोक में जो कोई मनुष्य भी धर्म से विचलित हो, उसे परास्त कर सनातन धर्म के विचार से दण्ड देना। सनातन धर्म धृति इत्यादि दस हैं।
इस प्रकार पृथु से उक्त प्रतिज्ञाएँ कराकर अन्त में यह प्रतिज्ञा करायी-
४. मैं मन वाणी और कर्म से वेद की आज्ञा का निरन्तर पालन करुँगा।
जब पुथु ने इन सब बातों को स्वीकार किया तो इसका राज्याभिषेक कर दिया गया। पृथु ने बहुत वर्ष तक राज्य किया।

इस प्रकार हम पाते हैं कि राजा और राज्य व्यवस्था का निर्माण समाज में एक व्यवस्था लागू करने के लिए हुआ था। लोगों में लोभ-मोह-इर्ष्या आदि के कारण होने वाले झगड़ों को समाप्त करने के लिए राजा नियुक्त किया गया था। राजा का काम था विद्वान और निस्स्वार्थी ऋषियों द्वारा समाजहित में बनाए गए धर्म या नियमों के अनुसार समाज के लोगों को चलाना। उसका उल्लंघन करने वाले लोगों को दंडित करना। यही कारण है कि बाद के स्मृतिकारों ने राजा को दंड की संज्ञा दी। यदि आज की भाषा में कहा जाए तो राजा यानी कि सरकार का कार्य है सुरक्षा कानून-व्यवस्था और न्याय। लंबे समय से व्यवस्था परिवर्तन पर काम कर रहे रामानुजगंज के बंजरंग मुनि कहते हैं – राज्य का एक दायित्व होता है और एक कर्तव्य। दायित्व और कर्तव्य में अंतर होता है। दायित्व का पूरा होना आवश्यक है। उससे आप बच नहीं सकते। वह करना ही पड़ेगा, नहीं करने पर उसकी सफाई देनी होगी। कर्तव्य स्वैच्छिक होता है। वह आप कर भी सकते हैं और नहीं भी। राज्य का दायित्व है सुरक्षा और न्याय। इससे वह बच नहीं सकता और इसमें विफल रहने पर उसकी सार्थकता पर ही सवाल खड़े हो जाएंगे। शिक्षा और स्वास्थ्य आदि उसके कर्तव्य हैं। सुरक्षा और न्याय को छोड़ कर यदि आप शिक्षा और स्वास्थ्य में लगते हैं तो इसका मतलब है कि आप अपने दायित्व से भाग रहे हैं। वर्तमान संविधान की यह एक बड़ी कमी है कि उसमें ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। वास्तव में संविधान बनाने वालों को संविधान और मौलिक अधिकारों के बारे में कोई ज्ञान नहीं था।

मनुस्मृति में कहा गया है कि स राजा पुरूषो दंडरू, स नेता शासिता च सरू अर्थात् जो दंड है, वही पुरूष राजा, नेता (न्याय का प्रचारक), और सबका शासनकर्ता है और वही चारों वर्णों व आश्रमों के धर्म का रक्षक व जिम्मेदार है। भारतीय चिंतन में राजा को दंड के रूप में देखा गया है। दुष्टों का नियंत्रित करके सज्जनों को सुख पहुंचाना ही राजा का प्रथम कर्तव्य कहा गया है। छांदग्योपनिषद में राजा अश्वपति की कथा आती है। उसमें राजा अश्वपति अपने राज्य के बारे में एक घोषणा करते हैं। इस घोषणा से राजा के कर्तव्य और जिम्मेदारियां स्पष्ट होती हैं। राजा अश्वपति कहते हैं कि मेरे राज्य में कोई चोर नहीं है, न कंजूस, न मद्यप यानी कि नशा करने वाला, न अग्निहोत्र से हीन और अविद्वान है। कोई व्यभिचारी पुरूष नहीं है तो व्यभिचारिणी स्त्री कहां से होगी? यह एक आदर्श राज्य का वर्णन है। एक आदर्श यानी कि सुशासित राज्य में चोर, कंजूस यानी कि केवल अपने स्वार्थ में लीन, नशा करने वाला, व्यभिचारी, यज्ञ न करने वाला और अविद्वान नहीं होना चाहिए। इसमें चरित्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और संस्कृति आदि सारे आयाम आ गए हैं। आज देश का कोई एक भी कोना ऐसा नहीं है, जहां के प्रशासक ऐसी घोषणा कर सकें।

राजा और राजनीति की भरपूर चर्चा भारतीय शास्त्रों में पाई जाती हैं, परंतु वहां राजा के कर्तव्यों, जिम्मेदारियों, उनके निर्वहन के तरीकों, राजा और उसके सहयोगियों के गुण, स्वभाव व चरित्र आदि की चर्चा है। उसमें कहीं भी राजा को चुने जाने की प्रक्रिया पर चर्चा नहीं पाई जाती। वास्तव में भारतीय ऋषि जानते थे कि चुनने की प्रक्रिया से अधिक महत्वपूर्ण बात है राजा का धर्मानुसार आचरण और यही कारण था कि वे राजा के चरित्र, प्रजा के लिए प्रतिबद्धता और धर्मशास्त्र पर निष्ठा पर अधिक जोर देते थे। साथ ही धर्मशास्त्र की व्यवस्था कभी राजा के अधीन नहीं रही। राजा का काम धर्मशास्त्र यानी कि बनाए गए कानूनों का पालन करवाना था, कानून बनाना नहीं। कानून बनाना ऋषियों यानी कि निस्स्वार्थ विद्वानों का काम था। उसका उल्लंघन करने पर राजा को भी दंडनीय माना गया था। यदि हम आज के लोकतंत्र से इसकी तुलना करें तो आज का शासन तंत्र काफी निरंकुश और कमजोर प्रतीत होगा। आज चुनने की प्रक्रिया पर अधिक जोर है परंतु सांसदों व विधायकों रूपी राजा के चरित्र और कानून के प्रति निष्ठा पर नहीं। आज कानून का पालन करवाने के लिए जिम्मेदार संसद को ही कानून बनाने का भी अधिकार दे दिया गया है, जिससे वह निरंकुश हो गई है।

राजा को निरंकुश होने से रोकने के लिए भारतीय चिंतन में धर्मसभा की व्यवस्था थी। धर्मसभा का काम था समाज के लिए उचित धर्म की व्याख्या करना जिसे हम आज की भाषा में कानून बनाना कह सकते हैं। राजा का काम केवल उसे लागू करना और उसका उल्लंघन करने वालों को दंडित करना मात्र था। इससे राजा के ऊपर धर्मसभा का अंकुश हुआ करता था। इसके अतिरिक्त भारतीय चिंतन और व्यवस्था में विद्वानों की महत्ता सदैव राजा से अधिक मानी गई। इसलिए राजा को ब्राह्मणों यानी कि विद्वानों का संरक्षक घोषित किया गया। अथर्व वेद में तीन प्रकार की सभा और उनके द्वारा शासन के संचालन का वर्णन आता है। ये तीनों सभाएं एक दूसरे के नियमन का कार्य करें, वहां ऐसी अपेक्षा की गई है और तीनों सभाओं पर प्रजा की निगरानी हो, यह भी कहा गया है। मनु राजा के लिए कठोरतम दंड की व्यवस्था करते हैं। मनु कहते हैं कि समान अपराध के लिए राजपुरूष को साधारण मनुष्य की तुलना में हजार गुणा अधिक दंड होना चाहिए। राजपुरूष से मनु का अभिप्राय राजा और उसके सहयोगियों समेत सभी राज कर्मचारियों से है। भीष्म, याज्ञवल्क्य, आचार्य चाणक्य जैसे अन्य भारतीय राजनीतिक विचारकों ने भी अधर्माचरण करने पर राजा व राजपुरूषों के लिए कठोर दंड की व्यवस्था दी है।

भारतीय मनीषियों ने राजधर्म में दंड को सर्वाधिक महत्ता ही है। यही कारण है कि लगभग सभी धर्मशास्त्रों में अपराधों के लिए कठोर दंडों का विधान किया गया है। परंतु इस दंड विधान में कठोरता के साथ-साथ समझदारी का भी पूरा समावेश किया गया है। मनु दंडों का विधान करने में अपराधी की पृष्ठभूमि का भी पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं। वे कहते हैं-
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्विषम्।
षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च।। 8/337
ब्राह्मणस्य चतुरूषष्टिः पूर्णं वाह्यपि शतं भवेत्।
द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि सः।। 8/338
अर्थरू जो कुछ जानकार (आज की भाषा में पढ़ा-लिखा कह सकते हैं) होकर चोरी करे तो उस शूद्र को चोरी से (सामान्य शूद्र को चोरी के लिए दिए जाने वाले दंड से) आठ गुणा अधिक, वैश्य को सोलह गुणा अधिक, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा अधिक और ब्राह्मण को चौंसठ गुणा या सौ गुणा या फिर एक सौ अट्ठाइस गुणा (जितना अधिक विद्वान उतना अधिक दंड) अधिक दंड देना चाहिए।

स्पष्ट है कि मनु वर्णानुसार दंड व्यवस्था तो करते हैं परंतु जो जितना ज्ञानवान वर्ण है उसे उतना अधिक दंड देने का विधान करते हैं। इस समझदारी का यदि आज की व्यवस्था जिसमें अज्ञानता को अपराध का कारण नहीं बताया जा सकता, से तुलना करें तो ध्यान में आता है प्राचीन दंड व्यवस्था में कठोरता होते हुए भी एक प्रकार की मानवीयता है। अज्ञानी को निर्दोष के समान माना गया है और अधिक ज्ञानवान और जिम्मेदार होने को अपराध की गंभीरता से जोड़ा गया है।

इस प्रकार हम पाते हैं कि निरंकुश समझे जाने वाले राजतत्र में भी एसी उदात्त और तर्क सगंत व्यवस्थाएं रही हैं जो हमारे आज के लोकतंत्र में भी नहीं हैं। इसलिए अपने लोकतंत्र पर अनावश्यक अभिमान को त्याग कर भारतीय राजनीतिक परंपरा के इन सिद्धांतों को अपनी व्यवस्था में शामिल करना ही वर्तमान राजनीतिक संकट का एकमात्र समाधान है।

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पर्यावरण, पारिस्थितिकी और विकास

Posted by bhartiyapaksha on मई 29, 2013

आज किसी भी चीज का मापदंड है विकास। राजनीति से लेकर प्रशासन तक का केवल एक ही मुद्दा है विकास। विकास किसी भी कीमत पर। इस विकास को नापने का एक पैमाना भी बनाया गया है और वह है समृद्धि। व्यक्ति का विकास मतलब वयक्ति की समृद्धि और देश का विकास मतलब देश की समृद्धि। समृद्धि का भी अर्थ निश्चित और सीमित कर दिया गया है। पैसों और संसाधनों का अधिकाधिक प्रवाह ही समृद्धि का अर्थ है। पैसे भी संसाधनों से ही आते हैं। इसलिए कुल मिला कर अधिकाधिक संसाधन चाहिए। इस संसाधनों के संचयन की होड़ पूरी दुनिया में लगी हुई है। इसके लिए हम किसी भी चीज की बलि चढ़ाने के लिए तैयार हैं, चढ़ा भी रहे हैं। चूंकि संसाधन हमें प्रकृति से ही मिलते हैं, इसलिए बलि भी प्रकृति की ही चढ़ाई जा रही है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि हमारी समृद्धि तो बढ़ रही है परंतु वास्तविक तौर पर हम गरीब हो रहे हैं। यह गरीबी पर्यावरण और पारिस्थितिकी की है। हमारी जैव विविधता खतरे में है, हमारा पेयजल खतरे में है, हमारी साफ हवा और उपजाऊ जमीन खतरे में है। यही कारण है कि आज हमारे सामने कई ऐसे सवाल खड़े हो गए हैं, जिनके बारे में कल्पना तक भी नहीं की गई थी।

उदाहरण के लिए देश की राजधानी दिल्ली को देखा जा सकता है। दिल्ली देश का एक सर्वाधिक विकसित शहर माना जाता है। सभी प्रकार की सुख-सुविधाएं और पर्याप्त से अधिक समृद्धि है यहां। परंतु यदि पर्यावरण और पारिस्थितिकी की बात करें तो दिल्ली से गरीब शायद ही कोई और शहर होगा। हालांकि दिल्ली गर्व के साथ देश का सबसे अधिक हरिययाली वाला मेट्रो शहर होने का दावा करती है, परंतु इसके बावजूद यह गौरैया जैसे एक पक्षी को बचा नहीं पा रही। कोयल की कूक दिल्लीवासियों के लिए एक स्वप्न भर है। विकास के सवालों पर पशु-पक्षियों की बलि तो चढ़ानी ही पड़ेगी, इस मानसिकता को अगर स्वीकार भी कर लिया जाए तो भी दिल्ली की चिंताएं काफी भयावह हैं। देश की एक प्रमुख नदी यमुना के किनारे बसे होने के बावजूद दिल्ली के पास अपना पीने का पानी नहीं बचा है। विकास की असीम लालसाओं की वेदी पर उसने अपने नदी-जल और भूजल की भेंट चढ़ा दी है और अब वह दूसरे राज्यों के पानी पर डाका डाल रही है। उसकी प्यास निरंतर बढ़ती ही जा रही है। यदि हम आंकड़ों की बात करें तो दिल्ली को कुल 939 एमजीडी पानी की आवश्यकता पड़ती है जिसका आधे से अधिक उसे दूसरे राज्यों यानि कि भाखड़ा नांगल, गंगनहर और टिहरी से प्राप्त होता है। यमुना उसकी आवश्यकता का केवल 30 प्रतिशत की ही पूर्ति कर पाती है। यहां यह उल्लेखनीय है कि दिल्ली में पानी की कुल खपत का 75 प्रतिशत घरेलू उपयोग में आता है और केवल 20 प्रतिशत औद्योगिक उपयोग में। सवाल उठता है कि दिल्ली में पानी की इतनी आवश्यकता है तो क्या दिल्लीवासियों ने पानी का उपयोग करने में सावधानी बरतनी शुरू कर दी है। उत्तर है नहीं।

ऐसा नहीं है कि यह स्थिति केवल दिल्ली की हो। झारखंड का एक प्रमुख शहर है धनबाद। धनबाद शहर की आबादी तीन लाख है,लेकिन मात्र पचास हजार लोग ही मैथन के पानी का उपयोग कर पा रहे हैं, ढाई लाख लोग सार्वजनिक नल और पानी पर निर्भर है। जिले में जलापूर्ति का मुख्य स्त्रोत मैथन डैम, तोपचांची झील और दामोदर नदी है। गर्मी में तीनों का जलस्तर घट जाता है। धनबाद शहर में पानी पिलाने की जिम्मेवारी पेयजल एवं स्व’छता विभाग और कोलियरी क्षेत्रों में यह काम खनिज क्षेत्र विकास प्राधिकार ((माडा)) के जिम्मे है। शहर में प्रतिदिन 80 लाख गैलन पानी की जरूरत है, लेकिन विभाग की ओर से 40 लाख गैलन पानी की आपूर्ति की जा रही है। इसी तरह झरिया क्षेत्र में अभी माडा की ओर से 30 लाख गैलन आपूर्ति की जा रही है, जबकि जरूरत 125 लाख गैलन की जरूरत है। परंतु समस्या का भयावह पक्ष यह है कि धनबाद का भूजल स्तर पिछले 15 सालों में बुरी तरह नीचे गिरा है और इसके कारण यहां के कई इलाकों के लगभग सभी कुंए और हैंडपंप सूख गए हैं। इस भूजल स्तर के गिरने का प्रमुख कारण है विकास के नाम पर तालाबों का बलिदान। ऐसे में सवाल यह है कि क्या वास्तव में हम समृद्ध हो रहे हैं?
वास्तव में यह सवाल स्वयं को विकसित और विकासशील कहने वाले उन सभी देशों से है, जो प्रकृति से खिलवाड़ और उसके विनाश को ही विकास का पर्याय माने बैठे हैं। जो विकास का अर्थ औद्योगीकरण समझते हैं और औद्योगीकरण का अर्थ प्रकृति व पर्यावरण विनाशक बड़े-बड़े कल कारखाने, जो विकास का अर्थ शहरों से लेते हैं और गांव जिनके लिए पिछड़ेपन और जहालत की निशानी हैं,जिनके लिए विकास का अर्थ बिजली सड़क पानी तक ही सीमित है, चाहे वह किसी भी कीमत पर हासिल किया गया हो।

विकास का तात्पर्य समझे बिना इस बात को ठीक से नहीं समझा जा सकता है। अपने देश में इन्हें विकास का मानक कभी भी नहीं माना गया। अपने देश में जिसे विकास माना गया, उसमें न केवल कार्बन का उत्सर्जन नहीं बढ़ता था, बल्कि प्रकृति के साथ एक तादात्म्य भी स्थापित होता था। इन्टर गवर्नमेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की एक रिपोर्ट के अनुसार आज हो रहे जलवायु परिवर्तन के लिए हमारी खानपान सहित जीवनशैली भी जिम्मेदार है और उसमें परिवर्तन लाए बिना हम इस समस्या का सामना नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए मांसाहार है। एक किलो मक्का के उत्पादन में 900 लीटर पानी लगता है परन्तु गाय या भैंस के 1 किलो मांस के उत्पादन में 15500 लीटर पानी की जरूरत होती है। आज पशुधन को मांस के नजरिये से ज्यादा और कृषि, पर्यावरण और आजीविका के नजरिये से कम देखा जाता है। दुनियाभर के अनाज उत्पादन का एक तिहाई का उपयोग मांस के लिये जानवर पालने में होता है। एक व्यक्ति एक हेक्टेयर खेती की जमीन से सब्जियां, फल और अनाज उगाकर 30 लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था कर सकता है किन्तु अगर इसी का उपयोग अण्डे, मांस, जानवर के लिये किया जाता है तो केवल 5 से 10 लोगों का ही पेट भर सकेगा। इससे साफ है कि मांसाहार दुनिया की पारिस्थितिकी के लिए एक बड़ा खतरा है। विकास का यह बाजारकेंद्रित प्रारूप तात्कालिक तौर पर पारिस्थितिकी और दूरगामी तौर पर मनुष्य जाति के लिए ही एक बड़ा खतरा है। यह स्पष्ट है कि पारिस्थितिकी में संतुलन नहीं रहने पर मानव का अस्तित्व भी खतरे में आ जाएगा।

भारत में विकास का जो प्रारूप विकसित हुआ, उसमें मनुष्य के साथ-साथ प्रत्येक जीव व जड़ प्रकृति की आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया था। मनुष्य के केवल भौतिक पक्ष की ही चिंता करने की बजाय उसके सामाजिक, मानसिक और आत्मिक पक्षों की भी चिंता की गई थी। केवल मनुष्य को सुख-सुविधाओं से लैस करने की कभी कोई योजना अपने यहां नहीं बनाई गई। इसलिए अपने देश में एक मुहावरा प्रचलित हुआ – उत्तम खेती, मध्यम बान; निकृष्ट चाकरी भीख निदान। इसका अर्थ बहुत साफ है। नौकरी करने को अपने देश में कभी महत्ता नहीं दी गई। पशु, भूमि और मनुष्य और इसप्रकार पूरी प्रकृति मात्र का पोषण करने वाली खेती को सर्वोत्तम माना गया। खेती की इस भारतीय व्यवस्था में पशु सहायक हुआ करते थे, बोझ नहीं। इसलिए किसान अपने पशु को मांस के लिए कभी भी उपयोग में नहीं लाता था। रोचक बात यह है कि गाय जैसे दूधारू पशुओं को व्यवसाय हेतु नहीं पाला जाता था। दूध एक अतिरिक्त उत्पाद था, मुख्य नहीं। मुख्य उत्पाद तो गोबर और गोमूत्र ही माने जाते थे। इसलिए भारत में पशुपालन हो या खेती, दोनों जीवन जीने की कला बने, उद्योग नहीं। समस्या ही तब शुरू होती है जब हम किसी भी चीज को उद्योग का दर्जा दे देते हैं, बड़े पैमाने पर उसका उत्पादन करने और किसी एक स्थान पर उसका संग्रह करने की कोशिश करते हैं।
आज तो जीवन के हरेक आयाम को बाजार और उद्योग से जोड़ दिया गया है। दूध का उत्पादन उद्योग हो गया है, मांस का उत्पादन उद्योग हो गया है। यहां तक कि एक निहायत ही व्यक्तिगत विषय श्रृंगार भी फैशन उद्योग बन गया है और आज खेती को भी उद्योग की श्रेणी में लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। समस्या इस औद्योगीकरण से ही शुरू होती है। किसी भी चीज का उत्पादन बुरा नहीं है,बुरा है उसका काफी बड़े पैमाने पर उत्पादन करना। उदाहरण के लिए दूध का उत्पादन है। व्यक्तिगत स्तर पर या छोटे-मोटे समूह द्वारा दूध का उत्पादन तो सदियों से हो रहा है, परंतु कभी कोई समस्या नहीं आई। लेकिन आज दूध का उत्पादन डेयरी इंडस्ट्री यानी कि दूध उद्योग बन गया है। परिणामस्वरूप भारत में तो नहीं परंतु अमेरिका जैसे देशों में गायों के विशाल स्तर पर रख-रखाव के कारण ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। यह उत्सर्जन इतना अधिक हो रहा है कि उस पर संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गनाइजेशन को रिपोर्ट निकालनी पड़ती है और उस पर अपने देश में बहस होने लगती है। परंतु ध्यान देने की बात यह है कि उस रिपोर्ट से भी यह साफ पता चलता है कि गायों से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन उतना नहीं होता है जितना कि बड़ी-बड़ी गोशालाओं के संचालन के लिए की जा रही चारे की खेती में प्रयुक्त रासायनिक खादों से होता है। इससे साफ होता है कि दूध व गाय कोई समस्या नहीं है, समस्या है दूध व मांस उद्योग।

इसलिए हम कह सकते हैं कि भारत में विकसित जीवन जीने की कला को अपनाने और उसके अनुसार विकास के मापदंडों को तय किए बिना पर्यावरण और पारिस्थितिकी की समस्या नहीं सुलझ सकती। जब हम ग्राम आधारित विकास के प्रारूप की बात करते हैं तो सबसे पहले इसे प्रगतिविरोधी कहा जाता है, फिर इसे अव्यवहारिक ठहराया जाता है और अंत में उसे मूर्खता ठहराकर खारिज कर दिया जाता है। परंतु सोचने की बात यह है कि जो कुछ हम दिल्ली में कर रहे हैं, क्या उसे पूरे देश में लागू किया जा सकता है?क्या पूरे देश को आप कंकरीट के जंगल में बदल सकते हैं, यदि बदल देंगे तो क्या जीवन संभव होगा? दिल्ली में यदि आप मोबाइल,एसी और कंप्यूटर के बिना नहीं रह सकते हैं, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि गावों में भी लोगों को ऐसा ही हो जाना चाहिए। वास्तव में दिल्ली जैसे शहरों को विकास का विकृत स्वरूप माना जाना चाहिए और इससे सीख लेते हुए देश के अन्य शहरों को इससे बचाने की कोशिश की जानी चाहिए।
पारिस्थितिकी के टिकाऊ बने रहने और परिणामस्वरूप मानव के सुखी रहने के लिए कुछेक बिंदुओं पर ध्यान दिया जाना नितांत आवश्यक है। पहली बात है पानी की। शहर का पानी का अपना स्रोत हो, जिसकी रक्षा शहर के लोगों की जिम्मेदारी हो। दूसरी बात है शहर की जैव विविधता की सुरक्षा का जिम्मा भी शहर के लोगों की ही हो न कि सरकारों की। इसके लिए शहरों में वार्ड स्तर पर समितियां बनाई जानी चाहिए। राजस्थान के दूदू जिले के एक छोटे से गांव लापोरिया में खुला चिड़ियाघर के सफल प्रयोग के आधार पर कुछ नए प्रयोग किए जा सकते हैं। पशुओं के साथ जीने का जो प्रशिक्षण भारत के परंपरागत शिक्षण में था, उसे आज की शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाया जाना चाहिए। जैसे, रसोई की पहली रोटी गाय के लिए निकालना, कुत्तों को रोटी देना, पक्षियों को दाना देना आदि। टाउनशिप के विकास में जैव विविधता की रक्षा को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। गाड़ियों के पार्किंग व्यवस्था के अलावा केले, पीपल और वट वृक्ष की उपस्थिति और गायों, कुत्तों, पक्षियों के रहने की व्यवस्था उसका अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। हरेक टाउनशिप के साथ एक गोशाला होने को अनिवार्य किया जा सकता है। उस गोशाला की जिम्मेदारी उस टाउनशिप की होनी चाहिए। इससे उस टाउनशिप को दूध भी मिलेगा और पशु-पक्षियों के प्रति देखने का लोगों का नजरिया भी बदलेगा। गोवर गैस से टाउनशिप के लोगों की ऊर्जा आपूर्ति भी होगी। इससे गांवों के विकास के प्रति भी लोगों की दृष्टि बदलेगी और गांवों को नष्ट करने की प्रक्रिया पर विराम लग सकेगा। प्रत्येक शहर के अनाज की न भी संभव हो तो भी उसके सब्जियों और फलों की खपत के लिए जीरो फूड माइल का सिद्धांत प्रयोग किया जाना चाहिए। यानि कि एक-दो किलोमीटर के दायरे में ही इनका उत्पादन क्षेत्र हो। इसके लिए किचन गार्डनिंग को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। प्रयास अनाज-उत्पादन को भी शहरों के पास लाए जाने की होनी चाहिए। केवल उपभोग करने की मानसिकता को रोकने के लिए उत्पादन को शहरों के साथ जोड़ना परमावश्यक है। पशुओं के संरक्षण में स्थानीय नस्लों को बढ़ावा दिया जाना और सामुदायिक जिम्मेदारी सबसे अधिक जरूरी है।
इस प्रकार के और भी उपाय हो सकते हैं, जिन्हें आज हम अव्यावहारिक माने बैठे हैं। परंतु पारिस्थितिकीय असंतुलन से जो खतरे पैदा हो रहे हैं, उसके मद्देनजर अब हमें अपने नजरिए में बदलाव लाने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। यदि हमने ऐसा नहीं किया तो इससे पारिस्थितिकी तंत्र ही नहीं हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। आखिर हम भी तो इस पारिस्थितिकी तंत्र का ही एक हिस्सा हैं।

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